भारतकोश
ईशादि नौ उपनिषद्

ईशादि नौ उपनिषद्

Ishadi Nau Upanishad

ऋषिगण द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

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ईशादि नौ उपनिषद्

[ वल्ली १ ]

एवम्=इसी प्रकार; माम्=मेरे पास; सर्वतः=सब ओरसे; ब्रह्मचारिणः=ब्रह्मचारीलोग; आयन्तु=आयें; स्वाहा=स्वाहा (इस उद्देश्यसे यह आहुति है); प्रतिवेशः=(तू) सबका विश्राम स्थान; अस्मि=है; मा=मेरे लिये; प्रभाहि=अपनेको प्रकाशित कर; मा=मुझे; प्रपद्यस्व=प्राप्त हो जा।

व्याख्या— ‘जिस प्रकार समस्त जल-प्रवाह नीचेकी ओर बहते हुए समुद्रमें मिल जाते हैं तथा जिस प्रकार महीने दिनोंका अन्त करनेवाले संवत्सररूप कालमें जा रहे हैं, हे विधाता! उसी प्रकार मेरे पास सब ओरसे ब्रह्मचारीलोग आयें और मैं उनको विद्याभ्यास कराकर तथा कल्याणका उपदेश देकर अपने कर्तव्यका एवं आपकी आज्ञाका पालन करता रहूँ।’ इस उद्देश्यसे मनोच्चारण करके ‘स्वाहा’ शब्दके साथ छठी आहुति अग्रिममें डालनी चाहिये। ‘हे परमात्मन्। आप सबके विश्राम-स्थान हैं, अब मेरे लिये अपने दिव्य स्वरूपको प्रकाशित कर दीजिये और मुझे प्राप्त हो जाइये’ इस उद्देश्यसे मनोच्चारणपूर्वक ‘स्वाहा’ शब्दके साथ सातवीं आहुति अग्रिममें डाले।

इस प्रकार इस चौथे अनुवाकमें इस लोक और परलोककी उन्नतिका उपाय परमात्माकी प्रार्थना और उसके साथ-साथ हवनको बताया गया है। प्रकरण बड़ा ही सुन्दर और श्रेयस्कर है। अपना कल्याण चाहनेवाले मनुष्योंको इसमें बताये हुए प्रकारसे अपने लिये जिस अंशकी आवश्यकता प्रतीत हो, उस अंशके अनुसार अनुष्ठान आरम्भ कर देना चाहिये।

॥ चतुर्थ अनुवाक समाप्त ॥ ४ ॥

पञ्चम अनुवाक

भूर्भुवः सुवरिति वा एतास्तिस्त्रो व्याहतयः। तासामु ह स्मैतां चतुर्थीं माहाचमस्यः प्रवेदयते। मह इति। तद्ब्रह्म। स आत्मा। अज्ञान्यन्या देवताः। भूरिति वा अयं लोकः। भुव इत्यन्तरिक्षम्। सुवरित्यसौ लोकः। मह इत्यादित्यः। आदित्येन वाव सर्वे लोका महीयन्ते।