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ईशादि नौ उपनिषद्

Ishadi Nau Upanishad

ऋषिगण द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

३४६

ईशादि नौ उपनिषद्

[ वल्ली १ ]

एवम्=इसी प्रकार; माम्=मेरे पास; सर्वतः=सब ओरसे; ब्रह्मचारिणः=ब्रह्मचारीलोग; आयन्तु=आयें; स्वाहा=स्वाहा (इस उद्देश्यसे यह आहुति है); प्रतिवेशः=(तू) सबका विश्राम स्थान; अस्मि=है; मा=मेरे लिये; प्रभाहि=अपनेको प्रकाशित कर; मा=मुझे; प्रपद्यस्व=प्राप्त हो जा।

व्याख्या— ‘जिस प्रकार समस्त जल-प्रवाह नीचेकी ओर बहते हुए समुद्रमें मिल जाते हैं तथा जिस प्रकार महीने दिनोंका अन्त करनेवाले संवत्सररूप कालमें जा रहे हैं, हे विधाता! उसी प्रकार मेरे पास सब ओरसे ब्रह्मचारीलोग आयें और मैं उनको विद्याभ्यास कराकर तथा कल्याणका उपदेश देकर अपने कर्तव्यका एवं आपकी आज्ञाका पालन करता रहूँ।’ इस उद्देश्यसे मनोच्चारण करके ‘स्वाहा’ शब्दके साथ छठी आहुति अग्रिममें डालनी चाहिये। ‘हे परमात्मन्। आप सबके विश्राम-स्थान हैं, अब मेरे लिये अपने दिव्य स्वरूपको प्रकाशित कर दीजिये और मुझे प्राप्त हो जाइये’ इस उद्देश्यसे मनोच्चारणपूर्वक ‘स्वाहा’ शब्दके साथ सातवीं आहुति अग्रिममें डाले।

इस प्रकार इस चौथे अनुवाकमें इस लोक और परलोककी उन्नतिका उपाय परमात्माकी प्रार्थना और उसके साथ-साथ हवनको बताया गया है। प्रकरण बड़ा ही सुन्दर और श्रेयस्कर है। अपना कल्याण चाहनेवाले मनुष्योंको इसमें बताये हुए प्रकारसे अपने लिये जिस अंशकी आवश्यकता प्रतीत हो, उस अंशके अनुसार अनुष्ठान आरम्भ कर देना चाहिये।

॥ चतुर्थ अनुवाक समाप्त ॥ ४ ॥

पञ्चम अनुवाक

भूर्भुवः सुवरिति वा एतास्तिस्त्रो व्याहतयः। तासामु ह स्मैतां चतुर्थीं माहाचमस्यः प्रवेदयते। मह इति। तद्ब्रह्म। स आत्मा। अज्ञान्यन्या देवताः। भूरिति वा अयं लोकः। भुव इत्यन्तरिक्षम्। सुवरित्यसौ लोकः। मह इत्यादित्यः। आदित्येन वाव सर्वे लोका महीयन्ते।

अनु० ५ ]

तैत्तिरीयोपनिषद्

३४७

भूः=भूः; भुवः=भुवः; सुवः=स्वः; इति=इस प्रकार; एताः=ये; वै=प्रसिद्ध; तिस्रः=तीन; व्याहतयः=व्याहतियाँ हैं; तासाम् उ=उन तीनोंकी अपेक्षासे; चतुर्थीम्=जो चौथी व्याहति; महः इति='मह' इस नामसे; ह=प्रसिद्ध है; एताम्=इसको; माहाचमस्यः=माहाचमसके पुत्रने; प्रवेदयते स्म=सबसे पहले जाना था; तत्=वह चौथी व्याहति ही; ब्रह्म=ब्रह्म है; सः=वह; आत्मा=(ऊपर कही हुई व्याहतियोंका) आत्मा है; अन्धाः=अन्ध; देवताः=सब देवता; अङ्गनिः=(उसके) अङ्ग हैं; भूः='भूः'; इति=यह व्याहति; वै=ही; अयम् लोकः=यह पृथ्वीलोक है; भुवः='भुवः'; इति=यह; अन्तरिक्षम्=अन्तरिक्ष-लोक है; सुवः='स्वः'; इति=यह; असौ लोकः=वह प्रसिद्ध स्वर्गलोक है; महः='महः'; इति=यह; आदित्यः=आदित्य—सूर्य है; आदित्येन=(क्योंकि) आदित्यसे; वावः=ही; सर्वे=समस्त; लोकाः=लोक; महीयन्ते=महिमान्वित होते हैं।

व्याख्या —इस पञ्चम अनुवाकमें भूः, भुवः, स्वः और महः—इन चारों व्याहतियोंकी उपासनाका रहस्य बताकर उसके फलका वर्णन किया गया है। पहले तो इसमें यह बात कही गयी है कि भूः, भुवः और स्वः—ये तीन व्याहतियाँ तो प्रसिद्ध हैं; परंतु इनके अतिरिक्त जो चौथी व्याहति 'महः' है, इसकी उपासनाका रहस्य सबसे पहले माहाचमसके पुत्रने जाना था। भाव यह है कि इन चारों व्याहतियोंको चार प्रकारसे प्रयोग करके उपासना करनेकी विधि, जो आगे बतायी गयी है, तभीसे प्रचलित हुई है। इसके बाद उन चार व्याहतियोंमें किस प्रकारकी भावना करके उपासना करनी चाहिये, यह समझाया गया है। इन चारों व्याहतियोंमें 'महः' यह चौथी व्याहति सर्वप्रधान है। अतः उपास्य देवोंमें 'महः' व्याहतिको ब्रह्मका स्वरूप समझना चाहिये—यह भाव समझानेके लिये कहा गया है कि वह चौथी व्याहति 'महः' ब्रह्मका नाम होनेसे ब्रह्म ही है; क्योंकि ब्रह्म सबके आत्मा हैं, सर्वरूप हैं और अन्य सब देवता उनके अङ्ग हैं; अतः जिस किसी भी देवताकी इन व्याहतियोंके द्वारा उपासना की जाय, उसमें इस बातको नहीं भूलना चाहिये कि यह सर्वरूप परमेश्वरकी ही उपासना है। सब देवता उन्हींके अङ्ग होनेसे अन्य देवोंकी उपासना भी उन्हींकी उपासना है।

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ईशादि नौ उपनिषद्

[ वल्ली १ ]

(गीता ९।२३-२४) उसके पश्चात् इन व्याहितियोंमें लोकोंका चिन्तन करनेकी विधि इस प्रकार बतायी गयी है—‘भूः’ यह तो मानो पृथ्वीलोक है, ‘भुवः’ यह अन्तरिक्षलोक है, ‘स्वः’ यह सुप्रसिद्ध स्वर्गलोक है और ‘महः’ यह सूर्य है; क्योंकि सूर्यसे ही सब लोक महिमान्वित हो रहे हैं। तात्पर्य यह कि भूः भुवः, स्वः—ये तीनों व्याहितियाँ तो उन परमेश्वरके विराट् शरीररूप इस स्थूल ब्रह्माण्डको बतानेवाली—अर्थात् परमेश्वरके अङ्गोंके नाम हैं तथा ‘महः’ यह चौथी व्याहिति इस विराट् शरीरको प्रकाशित करनेवाले उसके आत्मारूप परमेश्वरको बतानेवाली है। ‘महः’ यह सूर्यका नाम है, सूर्यके भी आत्मा हैं परमेश्वर; अतः सूर्यरूपसे सब लोकोंको वे ही प्रकाशित करते हैं। इसलिये यहाँ सूर्यके उपलक्षणसे इस विराट् शरीरको प्रकाशित करनेवाले इसके आत्मारूप परमेश्वरकी ही उपासनाका लक्ष्य कराया गया है।

भूरिति वा अग्निः। भुव इति वायुः। सुवरित्यादित्यः। मह इति चन्द्रमाः। चन्द्रमसा वाव सर्वाणि ज्योतीः५ षि महीयन्ते। भूरिति वा ऋचः। भुव इति सामानि। सुवरिति यजूः५ षि। मह इति ब्रह्म। ब्रह्मणा वाव सर्वे वेदा महीयन्ते।

भूः=‘भूः’; इति=यह व्याहिति; वै=ही; अग्निः=अग्नि है; भुवः=‘भुवः’; इति=यह; वायुः=वायु है; सुवः=‘स्वः’; इति=यह; आदित्यः=आदित्य है; महः=‘महः’; इति=यह; चन्द्रमाः=चन्द्रमा है; (क्योंकि) चन्द्रमसा=चन्द्रमासे; वाव=ही; सर्वाणि=समस्त; ज्योतीषि=ज्योतियाँ; महीयन्ते=महिमावाली होती हैं; भूः=‘भूः’; इति=यह व्याहिति; वै=ही; ऋचः=ऋग्वेद है; भुवः=‘भुवः’; इति=यह; सामानि=सामवेद है; सुवः=‘स्वः’; इति=यह; यजूषि=यजुर्वेद है; महः=‘महः’; इति=यह; ब्रह्म=ब्रह्म है; (क्योंकि) ब्रह्मणा=ब्रह्मसे; वाव=ही; सर्वे=समस्त; वेदाः=वेद; महीयन्ते=महिमावान् होते हैं।

व्याख्या —इसी प्रकार फिर ज्योतियोंमें इन व्याहितियोंद्वारा परमेश्वरकी उपासनाका प्रकार बताया गया है। भाव यह है कि ‘भूः’ यह व्याहिति अग्निका

अनु० ५ ]

तैत्तिरीयोपनिषद्

३४९

नाम होनेसे मानो अग्नि ही है। अग्निदेवता वाणीका अधिष्ठाता है और वाणी भी प्रत्येक विषयको व्यक्त करके प्रकाशित करनेवाली होनेसे ज्योति है; अतः वह भी ज्योतियोंकी उपासनामें मानो ‘भूः’ है। ‘भुवः’ यह वायु है। वायुदेवता त्वक्-इन्द्रियका अधिष्ठाता है और त्वक्-इन्द्रिय स्पर्शको प्रकाशित करनेवाली ज्योति है; अतः ज्योतिविषयक उपासनामें वायु और त्वचाको ‘भुवः’ रूप समझना चाहिये। ‘स्वः’ यह सूर्य है। सूर्य चक्षु-इन्द्रियका अधिष्ठातृ देवता है, चक्षु-इन्द्रिय भी सूर्यकी सहायतासे रूपको प्रकाशित करनेवाली ज्योति है; अतः ज्योतिविषयक उपासनामें सूर्य और चक्षु-इन्द्रियको ‘स्वः’ व्याहृतिस्वरूप समझना चाहिये। ‘महः’ यह चौथी व्याहृति ही मानो चन्द्रमा है, चन्द्रमा मनका अधिष्ठातृ देवता है। मनकी सहायतासे मनके साथ रहनेपर ही समस्त इन्द्रियाँ अपने-अपने विषयको प्रकाशित कर सकती हैं, मनके बिना नहीं कर सकतीं; अतः सब ज्योतियोंमें प्रधान चन्द्रमा और मनको ही ‘महः’ व्याहृतिरूप समझना चाहिये; क्योंकि चन्द्रमासे अर्थात् मनसे ही समस्त ज्योतिरूप इन्द्रियाँ महिमान्वित होती हैं। इस प्रकार मनके रूपमें परमेश्वरकी उपासना करनेकी विधि समझायी गयी है। फिर इसी भाँति वेदोंके विषयमें व्याहृतियोंके प्रयोगद्वारा परमेश्वरकी उपासनाका प्रकार बताया गया है। भाव यह है कि ‘भूः’ यह ऋग्वेद है, ‘भुवः’ यह सामवेद है, ‘स्वः’ यह यजुर्वेद है और ‘महः’ यह ब्रह्म है; क्योंकि ब्रह्मसे ही समस्त वेद महिमायुक्त होते हैं। तात्पर्य यह कि सम्पूर्ण वेदोंमें वर्णित समस्त ज्ञान परब्रह्म परमेश्वरसे ही प्रकट और उन्हींसे व्याप्त है तथा उन परमेश्वरके तत्त्वका इन वेदोंमें वर्णन है, इसीलिये इनकी महिमा है। इस प्रकार वेदोंमें इन व्याहृतियोंका प्रयोग करके उपासना करनी चाहिये।

भूरिति वै प्राणः। भुव इत्यपानः। सुवरिति व्यानः। मह इत्यन्नम्। अत्रेन वाव सर्वे प्राणा महीयन्ते। ता वा एताश्चतस्रश्चतुर्धा। चतस्रश्चतस्रो व्याहतयः। ता यो वेद। स वेद ब्रह्म। सर्वेऽस्मै देवा बलिमावहन्ति।

३५०

ईशादि नौ उपनिषद्

[ वल्ली १ ]

भूः='भूः'; इति=यह व्याहृति; वै=ही; प्राणः=प्राण है; भुवः='भुवः'; इति=यह; अपानः=अपान है; सुवः='स्वः'; इति=यह; व्यानः=व्यान है; महः='महः'; इति=यह; अत्रम्=अत्र है; (क्योंकि) अत्रेन=अत्रसे; वावः=ही; सर्वे=समस्त; प्राणाः=प्राण; महीयन्ते=महिमायुक्त होते हैं; ताः=वे; वै=ही; एताः=ये; चतस्त्रः=चारों व्याहृतियाँ; चतुर्धा=चार प्रकारकी हैं; (अतएव) चतस्त्रः चतस्त्रः=एक-एकके चार-चार भेद होनेसे कुल सोलह; व्याहृतयः=व्याहृतियाँ हैं; ताः=उनको; यः=जो; वेद=तत्त्वसे जानता है; सः=वह; ब्रह्म=ब्रह्मको; वेद=जानता है; अस्मै=इस ब्रह्मवेताके लिये; सर्वे=समस्त; देवाः=देवता; बलिम्=भेंट; आवहन्ति=समर्पण करते हैं।

व्याख्या —उसके बाद प्राणोंके विषयमें इन व्याहृतियोंका प्रयोग करके उपासनाका प्रकार समझाया गया है। भाव यह है कि 'भूः' यही मानो प्राण है, 'भुवः' यह अपान है, 'स्वः' यह व्यान है। इस प्रकार जगद्वापी समस्त प्राण ही मानो ये तीनों व्याहृतियाँ हैं और अत्र 'महः' रूप चतुर्थ व्याहृति है; क्योंकि जिस प्रकार व्याहृतियोंमें 'महः' प्रधान है, उसी प्रकार समस्त प्राणोंका पोषण करके उनकी महिमाको बनाये रखने और बढ़ानेके कारण उनकी अपेक्षा अत्र प्रधान है; अतः प्राणोंके अन्तर््यामी परमेश्वरकी अत्रके रूपमें उपासना करनी चाहिये।

इस तरह चारों व्याहृतियोंको चार प्रकारसे प्रयुक्त करके उपासना करने-की रीति बताकर फिर उसे समझकर उपासना करनेका फल बताया गया है। भाव यह कि चार प्रकारसे प्रयुक्त इन चारों व्याहृतियोंकी उपासनाके भेदको जो कोई जान लेता है, अर्थात् समझकर उसके अनुसार परब्रह्म परमात्माकी उपासना करता है, वह ब्रह्मको जान लेता है और समस्त देव उसको भेंट समर्पण करते हैं—उसे परमेश्वरका प्यारा समझकर उसका आदर-सत्कार करते हैं।

॥ पञ्चम अनुवाक समाप्त ॥ ५ ॥

अनु० ६ ]

तैत्तिरीयोपनिषद्

३५१

षष्ठ अनुवाक

स य एषोऽन्तर्हृदय आकाशः। तस्मिन्नयं पुरुषो मनोमयः। अमृतो हिरण्मयः।

सः=वह (पहले बताया हुआ); यः=जो; एषः=यह; अन्तर्हृदये=हृदयके भीतर; आकाशः=आकाश है; तस्मिन्=उसमें; अयम्=यह; हिरण्मयः=विशुद्ध प्रकाशस्वरूप; अमृतः=अविनाशी; मनोमयः=मनोमय; पुरुषः=पुरुष (परमेश्वर) रहता है।

व्याख्या—इस अनुवाकमें चार बातें कही गयी हैं, उनका पूर्व अनुवाकमें बतलाये हुए उपदेशसे अलग-अलग सम्बन्ध है और उस उपदेशकी पूर्तिके लिये ही यह आरम्भ किया गया है, ऐसा अनुमान होता है।

पूर्व अनुवाकमें मनके अधिष्ठातृ-देवता चन्द्रमाको इन्द्रियोंके अधिष्ठातृ-देवताओंका प्रकाशक बताया गया है और उसकी ब्रह्मरूपसे उपासना करनेकी युक्ति समझायी गयी है; वे मनोमय परब्रह्म—सबके अन्तर्यामी पुरुष कहाँ हैं; उनकी उपलब्धि कहाँ होती है—यह बात इस अनुवाकके पहले अंशमें समझायी गयी है। अनुवाकके इस अंशका अभिप्राय यह है कि पहले बतलाया हुआ जो यह हृदयके भीतर अद्भुतमात्र परिमाणवाला आकाश है, उसीमें ये विशुद्ध प्रकाशस्वरूप अविनाशी मनोमय अन्तर्यामी परम पुरुष परमेश्वर विराजमान हैं; वहीं उनका साक्षात्कार हो जाता है, उन्हें पानेके लिये कहीं दूसरी जगह नहीं जाना पड़ता।

अन्तरेण तालुके। य एष स्तन इवावलम्बते। सेन्द्रयोनिः। यत्रासौ केशान्तो विवर्तते। व्यपोह्य शीर्षकपाले। भूरित्यग्नौ प्रतितिष्ठति। भुव इति वायौ। सुवरित्यादित्ये। मह इति ब्रह्मणि।

अन्तरेण तालुके=दोनों तालुओंके बीचमें; यः=जो; एषः=यह; स्तनः=इव=स्तनके सदृश; अवलम्बते=लटक रहा है; [तम् अपि अन्तरेण]=उसके भी भीतर; यत्र=जहाँ; असौ=वह; केशान्तः=केशोंका मूलस्थान (ब्रह्मरन्ध्र); विवर्तते=स्थित है;

३५२

ईशादि नौ उपनिषद्

[ वल्ली १ ]

(वहाँ) शीर्षकपाले=सिरके दोनों कपालोंको; व्यपोह्य=भेदन करके; [ विनिःसृता या ]=निकली हुई जो सुषुम्णा नाड़ी है; सा=वह; इन्द्रयोनिः=इन्द्रयोनि (परमात्माकी प्राप्तिका द्वार) है; (अन्तकालमें साधक) भूः इति='भूः' इस व्याहृतिके अर्थरूप; अग्नी=अग्निमें; प्रतितिष्ठति=प्रतिष्ठित होता है; भुवः इति='भुवः' इस व्याहृतिके अर्थरूप; वायो=वायुदेवतामें स्थित होता है; (फिर) सुवः इति='स्वः' इस व्याहृतिके अर्थरूप; आदित्ये=सूर्यमें स्थित होता है; (उसके बाद) महः इति='महः' इस व्याहृतिके अर्थस्वरूप; ब्रह्मणि=ब्रह्ममें स्थित होता है।

व्याख्या —उन परब्रह्म परमेश्वरको अपने हृदयमें प्रत्यक्ष देखनेवाला महापुरुष इस शरीरका त्याग करके जब जाता है, तब किस प्रकार किस मार्गसे बाहर निकलकर किस क्रमसे भूः, भुवः और स्वः रूप समस्त लोकोंमें परिपूर्ण सबके आत्मरूप परमेश्वरमें स्थित होता है—यह बात इस अनुवाकके दूसरे अंशमें समझायी गयी है। भाव यह है कि मनुष्योंके मुखमें तालुओंके बीचोबीच जो एक थनके आकारका मांस-पिण्ड लटकता है, जिसे बोलचालकी भाषामें 'घाँटी' कहते हैं, उसके आगे केशोंका मूलस्थान ब्रह्मरन्ध्र है; वहाँ हृदय-देशसे निकलकर घाँटीके भीतरसे होती हुई दोनों कपोलोंको भेदकर गयी हुई जो सुषुम्णा नामसे प्रसिद्ध नाड़ी है, वही उन इन्द्र नामसे कहे जानेवाले परमेश्वरकी प्राप्तिका द्वार है। अन्तकालमें वह महापुरुष उस मार्गसे शरीरके बाहर निकलकर 'भूः' इस नामसे अभिहित अग्निमें स्थित होता है। गीतामें भी यही बात कही गयी है कि ब्रह्मवेत्ता जब ब्रह्मलोकमें जाता है, तब वह सर्वप्रथम ज्योतिर्मय अग्निके अभिमानी देवताके अधिकारमें आता है (गीता ८।२४)। उसके बाद वायुमें स्थित होता है। अर्थात् पृथ्वीसे लेकर सूर्यलोकतक समस्त आकाशमें जिसका अधिकार है, जो सर्वत्र विचरनेवाली वायुका अभिमानी देवता है और जो 'भुवः' नामसे पञ्चम अनुवाकमें कहा गया है, उसीके अधिकारमें वह आता है। वह देवता उसे 'स्वः' इस नामसे कहे हुए सूर्यलोकमें पहुँचा देता है, वहाँसे फिर वह 'महः' इस नामसे कहे हुए 'ब्रह्म' में स्थित हो जाता है।

अनु० ६ ]

तैत्तिरीयोपनिषद्

३५३

आज्नेति स्वाराज्यम् । आज्नेति मनसस्पतिम् । वाक्यतिश्वशुष्यतिः । श्रोत्रपतिर्विज्ञानपतिः । एतन्ततो भवति ।

स्वाराज्यम्—(वह) स्वराज्यको; आज्नेति=प्राप्त कर लेता है; मनसस्पतिम्=मनके स्वामीको; आज्नेति=पा लेता है; वाक्यतिः [ भवति ]=वाणीका स्वामी हो जाता है; चशुष्यतिः=नेत्रोंका स्वामी; श्रोत्रपतिः=कानोंका स्वामी; (और) विज्ञानपतिः=विज्ञानका स्वामी हो जाता है; ततः=उस पहले बताये हुए साधनसे; एतत्=यह फल; भवति=होता है ।

व्याख्या—वह ब्रह्मलोकमें प्रतिष्ठित महापुरुष कैसा हो जाता है—यह बात इस अनुवाकके तीसरे अंशमें बतलायी गयी है। अनुवाकके इस अंशका अभिप्राय यह है कि वह स्वराट् बन जाता है। अर्थात् उसपर प्रकृतिका अधिकार नहीं रहता, अपितु वह स्वयं ही प्रकृतिका अधिष्ठाता बन जाता है; क्योंकि वह मनके अर्थात् समस्त अन्तःकरणसमुदायके स्वामी परमात्माको प्राप्त कर लेता है, इसलिये वह वाणी, चक्षु, श्रोत्र आदि समस्त इन्द्रियों और उनके देवताओंका तथा विज्ञानस्वरूप बुद्धिका भी स्वामी हो जाता है। अर्थात् ये सब उसके अधीन हो जाते हैं। उस पहले बताये हुए साधनसे यह उपर्युक्त फल मिलता है।

आकाशशरीरं ब्रह्म । सत्यात्म प्राणारामं मनआनन्दम् । शान्तिसमृद्धममृतम् । इति प्राचीनयोग्योपास्त्व ।

ब्रह्म=वह ब्रह्म; आकाशशरीरम्=आकाशके सदृश शरीरवाला; सत्यात्म=सतारूप; प्राणारामम्=इन्द्रियादि समस्त प्राणोंको विश्राम देनेवाला; मनआनन्दम्=मनको आनन्द देनेवाला; शान्तिसमृद्धम्=शान्तिसे सम्पन्न; (तथा) अमृतम्=अविनाशी है; इति=यों मानकर; प्राचीनयोग्य=हे प्राचीनयोग्य!; उपास्त्व=तू उसकी उपासना कर ।

व्याख्या—वे प्राप्तव्य ब्रह्म कैसे हैं, उनका किस प्रकार चिन्तन और ध्यान करना चाहिये—यह बात इस अनुवाकके चौथे अंशमें बतायी गयी है। अभिप्राय यह है कि वे ब्रह्म आकाशके सदृश निराकार, सर्वव्यापी और अतिशय सूक्ष्म शरीरवाले हैं। एकमात्र सतारूप हैं। समस्त इन्द्रियोंको विश्राम

३५४

ईशादि नौ उपनिषद्

[ वल्ली १ ]

देनेवाले और मनके लिये परम आनन्ददायक हैं। अखण्ड शान्तिके भण्डार हैं और सर्वथा अविनाशी हैं। परम विश्वासके साथ यों मानकर साधकको उनकी प्राप्तिके लिये उनके चिन्तन और ध्यानमें तत्परताके साथ लग जाना चाहिये, यह भाव दिखलानेके लिये अन्तमें श्रुतिकी वाणीमें ऋषि अपने शिष्यसे कहते हैं—‘हे प्राचीनयोग्य!* तू उन ब्रह्मका स्वरूप इस प्रकारका मानकर उनकी उपासना कर।’

॥ षष्ठ अनुवाक समाप्त ॥ ६ ॥

सप्तम अनुवाक

पृथिव्यन्तरिक्षं द्यौर्दिशोऽवान्तरदिशः। अग्निर्वायुरादित्यश्चन्द्रमा नक्षत्राणि। आप ओषधयो वनस्पतय आकाश आत्मा। इत्यधिभूतम्। अथाध्यात्मम्। प्राणो व्यानोऽपान उदानः समानः। चक्षुः श्रोत्रं मनो वाक् त्वक्। चर्म माः संस्त्रावारिस्थ मज्जा। एतदधिविधाय ऋषिर्वोचत्। पादुक्ते वा इदः सर्वम्। पादुक्तेनैव पादुक्तः स्युणोतीति।

पृथिवी=पृथ्वीलोक; अन्तरिक्षम्=अन्तरिक्षलोक; द्यौः=स्वर्गलोक; दिशः=दिशाएँ; अवान्तरदिशः=अवान्तर दिशाएँ—दिशाओंके बीचके कोण (यह पाँच लोकोंकी पड़्क्ति है); अग्निः=अग्नि; वायुः=वायु; आदित्यः=सूर्य; चन्द्रमाः=चन्द्रमा; नक्षत्राणि=(तथा) समस्त नक्षत्र (यह पाँच ज्योतिः-समुदायकी पड़्क्ति है); आपः=जल; ओषधयः=ओषधियाँ; वनस्पतयः=वनस्पतियाँ; आकाशः=आकाश; आत्मा=(तथा) इनका संघातस्वरूप अन्नमय स्थूलशरीर (ये पाँचों मिलकर स्थूल पदार्थोंकी पड़्क्ति है); इति=यह; अधिभूतम्=आधिभौतिक दृष्टिसे वर्णन हुआ; अथ=अब; अध्यात्मम्=आध्यात्मिक दृष्टिसे बतलाते हैं; प्राणः=प्राण; व्यानः=व्यान;

  • पहलेसे ही जिसमें ब्रह्मप्राप्तिकी योग्यता हो, वह 'प्राचीनयोग्य' है। अथवा यह शिष्यका नाम है।

अनु० ७ ]

तैत्तिरीयोपनिषद्

३५५

अपानः=अपान; उदानः=उदान; (और) समानः=समान (यह पाँचों प्राणोंकी पड़क्ति है); चक्षुः=नेत्र; श्रोत्रम्=कान; मनः=मन; वाक्=वाणी; (और) त्वक्=त्वचा; (यह पाँचों करणोंकी पड़क्ति है); चर्म=चर्म; मांसम्=मांस; स्नावा=नाड़ी; अस्थि=हड्डी; (और) मज्जा=मज्जा (यह पाँच शरीरगत धातुओंकी पड़क्ति है); एतत्=यह (इस प्रकार); अधिविधाय=सम्यक् कल्पना करके; ऋषिः=ऋषिने; अवोचत्=कहा; इदम्=यह; सर्वम्=सब; वै=निश्चय ही; पाङ्क्तम्=पाङ्क्त है;* पाङ्क्तेन एव पाङ्क्तम्=(साधक) इस आध्यात्मिक पाङ्क्तसे ही बाह्य पाङ्क्तको और बाह्यसे अध्यात्म पाङ्क्तको; स्मृणोति इति=पूर्ण करता है।

व्याख्या—इस अनुवाकके दो भाग हैं। पहले भागमें मुख्य-मुख्य आधिभौतिक पदार्थोंको लोक, ज्योति और स्थूल पदार्थ—इन तीन पड़क्तियोंमें विभक्त करके उनका वर्णन किया है और दूसरे भागमें मुख्य-मुख्य आध्यात्मिक (शरीरस्थित) पदार्थोंको प्राण, कारण और धातु—इन तीन पड़क्तियोंमें विभक्त करके उनका वर्णन किया है। अन्तमें उनका उपयोग करनेकी युक्ति बतायी गयी है।

भाव यह है कि पृथ्वीलोक, अन्तरिक्षलोक, स्वर्गलोक, पूर्व-पश्चिम आदि दिशाएँ और आग्रेय, नैऋत्य आदि अवान्तर दिशाएँ—इस प्रकार यह लोकोंकी आधिभौतिक पड़क्ति है। अग्नि, वायु, सूर्य, चन्द्रमा और नक्षत्र—इस प्रकार यह ज्योतियोंकी आधिभौतिक पड़क्ति है तथा जल, ओषधियाँ, वनस्पति, आकाश और पाञ्चभौतिक स्थूल शरीर—इस प्रकार यह स्थूल जड पदार्थोंकी आधिभौतिक पड़क्ति है। यह सब मिलकर आधिभौतिक पाङ्क्त अर्थात् भौतिक पड़क्तियोंका समूह है। इसी प्रकार यह आगे बताया हुआ आध्यात्मिक शरीरके भीतर रहनेवाला पाङ्क्त है। इसमें प्राण, व्यान, अपान, उदान और समान—इस प्रकार यह प्राणोंकी पड़क्ति है। नेत्र, कान, मन, वाणी और त्वचा—इस प्रकार यह करण-समुदायकी पड़क्ति है; तथा चर्म, मांस, नाड़ी, हड्डी और मज्जा—इस प्रकार यह शरीरगत धातुओंकी पड़क्ति है। इस प्रकार प्रधान-प्रधान आधिभौतिक

  • पड़क्तियोंके समूहको ही 'पाङ्क्त' कहते हैं।

३५६

ईशादि नौ उपनिषद्

[ वल्ली १ ]

और आध्यात्मिक पदार्थोंकी त्रिविध पङ्क्तियाँ बनाकर वर्णन करना यहाँ उपलक्षणरूपमें है, अतः शेष पदार्थोंको भी इनके अन्तर्गत समझ लेना चाहिये। इस प्रकार वर्णन करनेके बाद श्रुति कहती है कि ये पङ्क्तियोंमें विभक्त करके बताये हुए पदार्थ सब-के-सब पङ्क्तियोंके समुदाय हैं। इनका आपसमें घनिष्ठ सम्बन्ध है। इस रहस्यको समझकर अर्थात् किस आधिभौतिक पदार्थके साथ किस आध्यात्मिक पदार्थका क्या सम्बन्ध है, इस बातको भलीभाँति समझकर मनुष्य आध्यात्मिक शक्तिसे भौतिक पदार्थोंका विकास कर लेता है और भौतिक पदार्थोंसे आध्यात्मिक शक्तियोंकी उत्पत्ति कर लेता है।

पहली आधिभौतिक लोकसम्बन्धी पङ्क्तिसे चौथी प्राण-समुदायरूप आध्यात्मिक पङ्क्तिका सम्बन्ध है; क्योंकि एक लोकसे दूसरे लोकको सम्बद्ध करनेमें प्राणोंकी ही प्रधानता है—यह बात संहिता-प्रकरणमें पहले बता आये हैं। दूसरी ज्योतिविषयक आधिभौतिक पङ्क्तिसे पाँचवीं करण-समुदायरूप आध्यात्मिक पङ्क्तिका सम्बन्ध है; क्योंकि वे आधिभौतिक ज्योतियाँ इन आध्यात्मिक ज्योतियोंकी सहायक हैं, यह बात शास्त्रोंमें जगह-जगह बतायी गयी है। इसी प्रकार तीसरी जो स्थूल पदार्थोंकी आधिभौतिक पङ्क्ति है, उसका छठी शरीरगत धातुओंकी आध्यात्मिक पङ्क्तिसे सम्बन्ध है; क्योंकि ओषधि और वनस्पतिरूप अन्नसे ही मांस-मज्जा आदिकी पुष्टि और वृद्धि होती है, यह प्रत्यक्ष है। इस प्रकार प्रत्येक स्थूल और सूक्ष्म तत्त्वको भलीभाँति समझकर उनका उपयोग करनेसे मनुष्य सब प्रकारकी सांसारिक उत्पत्ति कर सकता है, यही इस वर्णनका भाव मालूम होता है।

॥ सप्तम अनुवाक समाप्त ॥ ७ ॥

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अनु० ८]

तैत्तिरीयोपनिषद्

३५७

अष्टम अनुवाक

ओमिति ब्रह्म। ओमितीडः सर्वम्। ओमित्येतदनुकृतिर्ह स्म वा अघ्यो श्रावयेत्याश्रावयन्ति। ओमिति सामानि गायन्ति। ओः शोमिति। शस्त्राणि शः सन्ति। ओमित्यध्वर्युः प्रतिगंरं प्रतिगृणाति। ओमिति ब्रह्मा प्रसौति। ओमित्यग्निहोत्रमनुजानाति। ओमिति ब्राह्मणः प्रवक्ष्यन्नाह ब्रह्मोपाज्वानीति। ब्रह्मैवोपाज्जोति।

ओम्=‘ओम्’; इति=यह; ब्रह्म=ब्रह्म है; ओम्=‘ओम्’; इति=ही; इदम्=यह प्रत्यक्ष दिखायी देनेवाला; सर्वम्=समस्त जगत् है; ओम्=‘ओम्’; इति=इस प्रकारका; एतत्=यह अक्षर; ह=ही; वै=निःसंदेह; अनुकृतिः=अनुकृति (अनुमोदन) है; स्म=यह बात प्रसिद्ध है; अपि=इसके सिवा; ओ=हे आचार्य; श्रावय=मुझे सुनाइये; इति=यों कहनेपर; आश्रावयन्ति=(‘ओम्’ यों कहकर शिष्यको) उपदेश सुनाते हैं; ओम्=‘ओम्’ (बहुत अच्छा); इति=इस प्रकार (स्वीकृति देकर); [सामगाः]=सामगायक विद्वान्; सामानि=सामवेद-मन्त्रोंको; गायन्ति=गाते हैं; ओम् शोम्=‘ओम् शोम्’; इति=यों कहकर ही; शस्त्राणि=शस्त्रोंको अर्थात् मन्त्रोंको; शंसन्ति=पढ़ते हैं; ओम्=‘ओम्’; इति=यों कहकर; अध्वर्युः=अध्वर्यु नामक ऋत्विक्; प्रतिगंरं प्रतिगृणाति=प्रतिगंर मन्त्रका उच्चारण करता है; ओम्=‘ओम्’; इति=यों कहकर; ब्रह्मा=ब्रह्मा (चौथा ऋत्विक्); प्रसौति=अनुमति देता है; ओम्=‘ओम्’; इति=यह कहकर; अग्निहोत्रम् अनुजानाति=अग्निहोत्र करनेकी आज्ञा देता है; प्रवक्ष्यन्=अध्ययन करनेके लिये उद्यत; ब्राह्मणः=ब्राह्मण; ओम् इति=पहले ओम्का उच्चारण करके; आह=कहता है; ब्रह्म=(मैं) वेदको; उपाज्वानि इति=प्राप्त करूँ; ब्रह्म=(फिर वह) वेदको; एव=निश्चय ही; उपाज्जोति=प्राप्त करता है।

व्याख्या—इस अनुवाकमें ‘ॐ’ इस परमेश्वरके नामके प्रति मनुष्यकी श्रद्धा और रुचि उत्पन्न करनेके लिये ‘ॐ’ कारकी महिमाका वर्णन किया गया है। भाव यह है कि ‘ॐ’ यह परब्रह्म परमात्माका नाम होनेसे साक्षात् ब्रह्म ही

३५८

ईशादि नौ उपनिषद्

[ वल्ली १ ]

है; क्योंकि भगवान्का नाम भी भगवत्स्वरूप ही होता है। यह प्रत्यक्ष दिखायी देनेवाला समस्त जगत् 'ॐ' अर्थात् उस ब्रह्मका ही स्थूलरूप है। 'ॐ' यह अनुकृति अर्थात् अनुमोदनका सूचक है। अर्थात् जब किसीकी बातका अनुमोदन करना होता है, तब श्रेष्ठ पुरुष परमेश्वरके नामस्वरूप इस 'ॐ' कारका उच्चारण करके संकेतसे उसका अनुमोदन कर दिया करते हैं, दूसरे व्यर्थ शब्द नहीं बोलते—यह बात प्रसिद्ध है। जब शिष्य अपने गुरुसे तथा श्रोता किसी व्याख्यानदातासे उपदेश सुनानेके लिये प्रार्थना करता है, तब गुरु और वक्ता भी 'ॐ' इस प्रकार कहकर ही उपदेश सुनाना आरम्भ करते हैं। सामवेदका गान करनेवाले भी 'ॐ' इस प्रकार पहले परमेश्वरके नामका भलीभाँति गान करके उसके बाद सामवेदका गान किया करते हैं। यज्ञकर्ममें शस्त्र-शंसनरूप कर्म करनेवाले शास्ता नामक ऋत्विक् 'ओम् शोम्' इस प्रकार कहकर ही शस्त्रोंका अर्थात् तद्विषयक मन्त्रोंका पाठ करते हैं। यज्ञकर्म करानेवाला अध्वर्यु नामक ऋत्विक् भी 'ॐ' इस परमेश्वरके नामका उच्चारण करके ही प्रतिगर-मन्त्रका उच्चारण करता है। ब्रह्मा (चौथा ऋत्विक्) भी 'ॐ' इस प्रकार परमात्माके नामका उच्चारण करके यज्ञकर्म करनेके लिये अनुमति देता है तथा 'ॐ' यों कहकर ही अग्निहोत्र करनेकी आज्ञा देता है। अध्ययन करनेके लिये उद्यत ब्राह्मण ब्रह्मचारी भी 'ॐ' इस प्रकार परमेश्वरके नामका पहले उच्चारण करके कहता है कि 'मैं वेदको भली प्रकार पढ़ सकूँ।' अर्थात् ॐकार जिसका नाम है, उस परमेश्वरसे ॐकारके उच्चारणपूर्वक यह प्रार्थना करता है कि 'मैं वेदको—वैदिक ज्ञानको प्राप्त कर लूँ—ऐसी बुद्धि दीजिये।' इसके फलस्वरूप वह वेदको निःसंदेह प्राप्त कर लेता है। इस प्रकार इस मन्त्रमें ॐ कारकी महिमाका वर्णन है।

॥ अष्टम अनुवाक समाप्त ॥ ८ ॥

अनु० ९ ]

तैत्तिरीयोपनिषद्

३५९

नवम अनुवाक

ऋतं च स्वाध्यायप्रवचने च। सत्यं च स्वाध्यायप्रवचने च। तपश्च स्वाध्यायप्रवचने च। दमश्च स्वाध्यायप्रवचने च। शमश्च स्वाध्यायप्रवचने च। अग्रयश्च स्वाध्यायप्रवचने च। अग्निहोत्रं च स्वाध्यायप्रवचने च। अतिथयश्च स्वाध्यायप्रवचने च। मानुषं च स्वाध्यायप्रवचने च। प्रजा च स्वाध्यायप्रवचने च। प्रजनश्च स्वाध्यायप्रवचने च। प्रजातिश्च स्वाध्यायप्रवचने च। सत्यमिति सत्यवचा राथीतरः। तप इति तपोनित्यः पौरुशिष्टिः। स्वाध्याय- प्रवचने एवेति नाको मौद्रल्यः। तद्धि तपस्तद्धि तपः।

ऋतम्=यथायोग्य सदाचारका पालन; च=और; स्वाध्यायप्रवचने च=शास्त्रका पढ़ना-पढ़ाना भी (यह सब अवश्य करना चाहिये); सत्यम्=सत्यभाषण; च=और; स्वाध्यायप्रवचने च=वेदोंका पढ़ना-पढ़ाना भी (साथ-साथ करना चाहिये); तपः=तपश्चर्या; च=और; स्वाध्यायप्रवचने च=वेदोंका पढ़ना-पढ़ाना भी (साथ-साथ करना चाहिये); दमः=इन्द्रियोंका दमन; च=और; स्वाध्यायप्रवचने च=वेदोंका पढ़ना-पढ़ाना भी (साथ-साथ करना चाहिये); शमः=मनका निग्रह; च=और; स्वाध्यायप्रवचने च=वेदोंका पढ़ना-पढ़ाना भी (साथ-साथ करना चाहिये); अग्रयः=अग्रियोंका चयन; च=और; स्वाध्यायप्रवचने च=वेदोंका पढ़ना-पढ़ाना भी (साथ-साथ करना चाहिये); अग्निहोत्रम्=अग्निहोत्र; च=और; स्वाध्यायप्रवचने च=वेदोंका पढ़ना-पढ़ाना भी (साथ-साथ करना चाहिये); अतिथयः=अतिथियोंकी सेवा; च=और; स्वाध्यायप्रवचने च=वेदोंका पढ़ना-पढ़ाना भी (साथ-साथ करना चाहिये); मानुषम्=मनुष्योचित लौकिक व्यवहार; च=और; स्वाध्यायप्रवचने च=वेदोंका पढ़ना-पढ़ाना भी (साथ-साथ करना चाहिये); प्रजा=गर्भाधानसंस्काररूप कर्म; च=और; स्वाध्यायप्रवचने च=वेदोंका पढ़ना-पढ़ाना भी (साथ-साथ करना चाहिये); प्रजनः=शास्त्रविधिके अनुसार

३६०

ईशादि नौ उपनिषद्

[ वल्ली १ ]

स्त्रीसहवास; च=और; स्वाध्यायप्रवचने च=वेदोंका पढ़ना-पढ़ाना भी (साथ-साथ करना चाहिये); प्रजाति:=कुटुम्बवृद्धिका कर्म; च=और; स्वाध्यायप्रवचने च=शास्त्रका पढ़ना-पढ़ाना भी (साथ-साथ करना चाहिये;); सत्यम्=सत्य ही इनमें श्रेष्ठ है; इति=यों; राथीतरः=राथीतरका पुत्र; सत्यवचाः=सत्यवचा ऋषि कहते हैं; तपः=तप ही सर्वश्रेष्ठ है; इति=यों; पौरुशिष्ठिः=पुरुषिष्ठका पुत्र; तपोनित्यः=तपोनित्य नामक ऋषि कहते हैं; स्वाध्यायप्रवचने एव=वेदका पढ़ना-पढ़ाना ही सर्वश्रेष्ठ है; इति=यों; मौद्रल्यः=मुद्रगलके पुत्र; नाकः='नाक' मुनि कहते हैं; हि=क्योंकि; तत्=वही; तपः=तप है; तत् हि=वही; तपः=तप है।

व्याख्या —इस अनुवाकमें यह बात समझायी गयी है कि अध्ययन और अध्यापन करनेवालोंको अध्ययन-अध्यापनके साथ-साथ शास्त्रोंमें बताये हुए मार्गपर स्वयं चलना भी चाहिये। यही बात उपदेशक और उपदेश सुननेवालोंके विषयमें भी समझनी चाहिये। अभिप्राय यह है कि अध्ययन और अध्यापन दोनों बहुत ही उपयोगी हैं, शास्त्रोंके अध्ययनसे ही मनुष्यको अपने कर्तव्यका तथा उसकी विधि और फलका ज्ञान होता है; अतः इसे करते हुए ही उसके साथ-साथ यथायोग्य सदाचारका पालन, सत्यभाषण, स्वधर्म पालनके लिये बड़े-से-बड़ा कष्ट सहना, इन्द्रियोंको वशमें रखना, मनको वशमें रखना, अग्निहोत्रके लिये अग्निको प्रदीप्त करना, फिर उसमें हवन करना, अतिथिको यथायोग्य सेवा करना, सबके साथ सुन्दर मनुष्योचित लौकिक व्यवहार करना, शास्त्रविधिके अनुसार गर्भाधान करना और ऋतुकालमें नियमितरूपसे स्त्री-सहवास करना तथा कुटुम्बको बढ़ानेका उपाय करना—इस प्रकार इन सभी श्रेष्ठ कर्मोंका अनुष्ठान करते रहना चाहिये। अध्यापक तथा उपदेशकके लिये तो इन सब कर्तव्योंका समुचित पालन और भी आवश्यक है; क्योंकि उनके आदर्शका अनुकरण उनके छात्र तथा श्रोता ग्रहण करते हैं। रथीतरके पुत्र सत्यवचा नामक ऋषिका कहना है कि 'इन सब कर्मोंमें सत्य ही सर्वश्रेष्ठ है; क्योंकि प्रत्येक कर्म सत्यभाषण और सत्यभावपूर्वक किये जानेपर ही यथार्थरूपसे सम्पन्न होता है।' पुरुषिष्ठपुत्र तपोनित्य नामक ऋषिका कहना है कि 'तपश्चर्या ही सर्वश्रेष्ठ

अनु० १० ]

तैत्तिरीयोपनिषद्

३६१

है; क्योंकि तपसे ही सत्यभाषण आदि समस्त धर्मोंके पालन करनेकी और उनमें दृढ़तापूर्वक स्थित रहनेकी शक्ति आती है।' मुदलके पुत्र नाक नामक मुनिका कहना है कि 'वेद और धर्मशास्त्रोंका पठन-पाठन ही सर्वश्रेष्ठ है; क्योंकि वही तप है, वही तप है अर्थात् इन्होंने तप आदि समस्त धर्मोंका ज्ञान होता है।' इन सभी ऋषियोंका कहना यथार्थ है। उनके कथनको उद्धृत करके यह भाव दिखाया गया है कि प्रत्येक कर्ममें इन तीनोंकी प्रधानता रहनी चाहिये। जो कुछ कर्म किया जाय, वह पठन-पाठनसे उपलब्ध शास्त्रज्ञानके अनुकूल होना चाहिये। कितने ही विघ्न क्यों न उपस्थित हों, अपने कर्तव्यपालनरूप तपमें सदा दृढ़ रहना चाहिये और प्रत्येक क्रियामें सत्यभाव और सत्यभाषणपर विशेष ध्यान देना चाहिये।

॥ नवम अनुवाक समाप्त ॥ १ ॥

दशम अनुवाक

अहं वृक्षस्य रेरिवा। कीर्तिः पृष्ठं गिरेरिव। ऊर्ध्वपवित्रो वाजिनीव स्वमृतमस्मि। द्रविणः सवर्चसम्। सुमेधा अमृतोक्षितः। इति त्रिशङ्कोर्वेदानुवचनम्।

अहम्=मैं; वृक्षस्य=संसारवृक्षका; रेरिवा=उच्छेद करनेवाला हूँ; [ मम ] कीर्तिः= मेरी कीर्ति; गिरेः=पर्वतके; पृष्ठम् इव=शिखरकी भाँति उन्नत है; वाजिनि=अज्ञोत्पादक शक्तिसे युक्त सूर्यमें; स्वमृतम् इव=जैसे उत्तम अमृत है, उसी प्रकार मैं भी; ऊर्ध्वपवित्रः अस्मि=अतिशय पवित्र अमृतस्वरूप हूँ; (तथा मैं) सवर्चसम्=प्रकाशयुक्त; द्रविणम्=धनका भण्डार हूँ; अमृतोक्षितः=(परमानन्दमय) अमृतसे अभिषिक्त (तथा); सुमेधाः=श्रेष्ठ बुद्धिवाला हूँ; इति=इस प्रकार (यह); त्रिशङ्कोः=त्रिशङ्कु ऋषिका; वेदानुवचनम्=अनुभव किया हुआ वैदिक प्रवचन है।

व्याख्या—त्रिशङ्कु नामक ऋषिने परमात्माको प्राप्त होकर जो अपना अनुभव व्यक्त किया था, उसे ही इस अनुवाकमें उद्धृत किया गया है। त्रिशङ्कुके

३६२

ईशादि नौ उपनिषद्

[ वल्ली १ ]

वचनानुसार अपने अन्तःकरणमें भावना करना भी परमात्माकी प्राप्तिका साधन है, यही बतानेके लिये इस अनुवाकका आरम्भ हुआ है। श्रुतिका भावार्थ यह है कि मैं प्रवाहरूपमें अनादिकालसे चले आते हुए इस जन्म-मृत्युरूप संसारवृक्षका उच्छेद करनेवाला हूँ। यह मेरा अन्तिम जन्म है। इसके बाद मेरा पुनः जन्म नहीं होनेका। मेरी कीर्ति पर्वत-शिखरकी भाँति उन्नत एवं विशाल है। अत्रोत्पादक शक्तिसे युक्त सूर्यमें जैसे उत्तम अमृतका निवास है, उसी प्रकार मैं भी विशुद्ध रोग-दोष आदिसे सर्वथा मुक्त हूँ, अमृतस्वरूप हूँ। इसके सिवा मैं प्रकाशयुक्त धनका भण्डार हूँ, परमानन्दरूप अमृतमें निमग्न और श्रेष्ठ धारणायुक्त बुद्धिसे सम्पन्न हूँ। इस प्रकार यह त्रिशङ्कु ऋषिका वेदानुवचन है अर्थात् ज्ञानप्राप्तिके बाद व्यक्त किया हुआ आत्माका उद्गार है।

मनुष्य जिस प्रकारकी भावना करता है, वैसा ही बन जाता है, उसके संकल्पमें यह अपूर्व—आश्चर्यजनक शक्ति है। अतः जो मनुष्य अपनेमें उपर्युक्त भावनाका अभ्यास करेगा वह निश्चय वैसा ही बन जायगा। परंतु इस साधनमें पूर्ण सावधानीकी आवश्यकता है। यदि भावनाके अनुसार गुण न आकर अभिमान आ गया तो पतन भी हो सकता है। यदि इस वेदानुवचनके रहस्यको ठीक समझकर इसकी भावना की जाय तो अभिमानकी आशङ्का भी नहीं की जा सकती।

॥ दशम अनुवाक समाप्त ॥ १० ॥

एकादश अनुवाक

वेदमनूच्याचार्योऽन्तेवासिनमनुशास्ति। सत्यं वद। धर्मं चर। स्वाध्यायान्मा प्रमदः। आचार्याय प्रियं धनमाह्वय प्रजातन्तु मा व्यवच्छेत्सीः। सत्यान्न प्रमदितव्यम्। धर्मान्न प्रमदितव्यम्। कुशलान्न प्रमदितव्यम्। भूतै न प्रमदितव्यम्। स्वाध्यायप्रवचनाभ्यां न प्रमदितव्यम्। देवपितृकार्याभ्यां न प्रमदितव्यम्।

अनु० ११ ]

तैत्तिरीयोपनिषद्

३६३

वेदम् अनुच्य=वेदका भलीभाँति अध्ययन कराकर; आचार्यः=आचार्य; अन्तेवासिनम्=अपने आश्रममें रहनेवाले ब्रह्मचारी विद्यार्थीको; अनुशास्ति=शिक्षा देता है; सत्यम् वद=तुम सत्य बोलो; धर्मम् चर=धर्मका आचरण करो; स्वाध्यायात्=स्वाध्यायसे; मा प्रमदः=कभी न चूको; आचार्याय=आचार्यके लिये; प्रियम् धनम्=दक्षिणाके रूपमें वाञ्छित धन; आह्वय=लाकर (दो; फिर उनकी आज्ञासे गृहस्थ-आश्रममें प्रवेश करके); प्रजातन्तुम्=संतान-परम्पराको (चालू रखो, उसका); मा व्यवच्छेत्सीः=उच्छेद न करना; सत्यात्=(तुमको) सत्यसे; न प्रमदितव्यम्=कभी नहीं डिगना चाहिये; धर्मात्=धर्मसे; न=नहीं; प्रमदितव्यम्=डिगना चाहिये; कुशलात्=शुभ कर्मोंसे; न प्रमदितव्यम्=कभी नहीं चूकना चाहिये; भूत्ये=उन्नतिके साधनोंसे; न प्रमदितव्यम्=कभी नहीं चूकना चाहिये; स्वाध्यायप्रवचनाभ्याम्=वेदोंके पढ़ने और पढ़ानेमें; न प्रमदितव्यम्=कभी भूल नहीं करनी चाहिये; देवपितृकार्याभ्याम्=देवकार्यसे और पितृकार्यसे; न प्रमदितव्यम्=कभी नहीं चूकना चाहिये।

व्याख्या—गृहस्थको अपना जीवन कैसा बनाना चाहिये, यह बात समझानेके लिये इस अनुवाकका आरम्भ किया गया है। आचार्य शिष्यको वेदका भलीभाँति अध्ययन कराकर समावर्तन-संस्कारके समय गृहस्थाश्रममें प्रवेश करके गृहस्थ-धर्मका पालन करनेकी शिक्षा देते हैं—पुत्र! तुम सदा सत्य-भाषण करना, आपत्ति पड़नेपर भी झूठका कदापि आश्रय न लेना, अपने वर्ण-आश्रमके अनुकूल शास्त्र-सम्मत धर्मका अनुष्ठान करना, स्वाध्यायसे अर्थात् वेदोंके अभ्यास, संध्यावन्दन, गायत्रीजप और भगवद्भाम-गुणकीर्तन आदि नित्यकर्ममें कभी भी प्रमाद न करना—अर्थात् न तो कभी उन्हें अनादरपूर्वक करना और न आलस्यवश उनका त्याग ही करना। गुरुके लिये दक्षिणाके रूपमें उनकी रुचिके अनुरूप धन लाकर प्रेमपूर्वक देना; फिर उनकी आज्ञासे गृहस्थाश्रममें प्रवेश करके स्वधर्मका पालन करते हुए संतान-परम्पराको सुरक्षित रखना—उसका लोप न करना। अर्थात् शास्त्रविधिके अनुसार विवाहित धर्मपत्नीके साथ ऋतुकालमें नियमित सहवास करके संतानोत्पत्तिका कार्य

३६४

ईशादि नौ उपनिषद्

[ वल्ली १ ]

अनासक्तिपूर्वक करना। तुमको कभी भी सत्यसे नहीं चूकना चाहिये अर्थात् हँसी-दिल्लगी या व्यर्थकी बातोंमें वाणीकी शक्तिको न तो नष्ट करना चाहिये और न परिहास आदिके बहाने कभी झूठ ही बोलना चाहिये। इसी प्रकार धर्मपालनमें भी भूल नहीं करनी चाहिये अर्थात् कोई बहाना बनाकर या आलस्यवश कभी धर्मकी अवहेलना नहीं करनी चाहिये। लौकिक और शास्त्रीय—जितने भी कर्तव्यरूपसे प्राप्त शुभ कर्म हैं, उनका कभी त्याग या उपेक्षा नहीं करनी चाहिये, अपितु यथायोग्य उनका अनुष्ठान करते रहना चाहिये। धन-सम्पत्तिको बढ़ानेवाले लौकिक उन्नतिके साधनोंके प्रति भी उदासीन नहीं होना चाहिये। इसके लिये भी वर्णाश्रमानुकूल चेष्टा करनी चाहिये। पढ़ने और पढ़ानेका जो मुख्य नियम है, उसकी कभी अवहेलना या आलस्यपूर्वक त्याग नहीं करना चाहिये। इसी प्रकार अग्निहोत्र और यज्ञादिके अनुष्ठानरूप देवकार्य तथा श्राद्ध-तर्पण आदि पितृकार्यके सम्पादनमें भी आलस्य या अवहेलनापूर्वक प्रमाद नहीं करना चाहिये।

मातृदेवो भव। पितृदेवो भव। आचार्यदेवो भव। अतिथिदेवो भव। यान्यनवद्यानि कर्माणि। तानि सेवितव्यानि। नो इतराणि। यान्यस्माकं सुचरितानि। तानि त्वयोपास्यानि। नो इतराणि। ये के चासमच्छ्रेयाः सो ब्राह्मणाः। तेषां त्वयाऽऽसनेन प्रश्रंसितव्यम्। श्रद्धया देयम्। अश्रद्धयादेयम्। श्रिया देयम्। ह्रिया देयम्। भिया देयम्। संविदा देयम्।

मातृदेवः भव =तुम मातामें देवबुद्धि करनेवाले बनो; पितृदेवः भव =पिताको देवरूप समझनेवाले होओ; आचार्यदेवः भव =आचार्यको देवरूप समझनेवाले बनो; अतिथिदेवः भव =अतिथिको देवतुल्य समझनेवाले होओ; यानि =जो-जो; अनवद्यानि =निर्दोष; कर्माणि =कर्म हैं; तानि =उन्होंका; सेवितव्यानि =तुम्हें सेवन करना चाहिये; इतराणि =दूसरे (दोषयुक्त) कर्मोंका; नो =कभी आचरण नहीं करना चाहिये; अस्माकम् =हमारे (आचरणोंमेंसे भी); यानि =जो-जो; सुचरितानि =अच्छे

अनु० ११ ]

तैत्तिरीयोपनिषद्

३६५

आचरण है; तानि=उनका ही; त्वया=तुमको; उपास्यानि=सेवन करना चाहिये; इतराणि=दूसरोंका; नो=कभी नहीं; ये के च=जो कोई भी; असम्त्=हमसे; श्रेयांसः=श्रेष्ठ (गुरुजन एवं); ब्राह्मणाः=ब्राह्मण आर्ये; तेषाम्=उनको; त्वया=तुम्हें; आसनेन=आसन-दान आदिके द्वारा सेवा करके; प्रशंसितव्यम्=विश्राम देना चाहिये; श्रद्धया देयम्=श्रद्धापूर्वक दान देना चाहिये; अश्रद्धया=बिना श्रद्धाके; अदेयम्=नहीं देना चाहिये; श्रिया देयम्=आर्थिक स्थितिके अनुसार देना चाहिये; ह्रिया देयम्=लज्जासे देना चाहिये; भिया देयम्=भयसे भी देना चाहिये (और); संविदा देयम्=(जो कुछ भी दिया जाय, वह सब) विवेकपूर्वक देना चाहिये।

व्याख्या— पुत्र! तुम मातामें देवबुद्धि रखना, पितामें भी देवबुद्धि रखना, आचार्यमें देवबुद्धि रखना तथा अतिथिमें भी देवबुद्धि रखना। आशय यह कि इन चारोंको ईश्वरकी प्रतिमूर्ति समझकर श्रद्धा और भक्तिपूर्वक सदा इनकी आज्ञाका पालन, नमस्कार और सेवा करते रहना; इन्हें सदा अपने विनयपूर्ण व्यवहारसे प्रसन्न रखना। जगत्में जो-जो निर्दीष कर्म हैं, उन्हींका तुम्हें सेवन करना चाहिये। उनसे भिन्न जो दोषयुक्त—निषिद्ध कर्म हैं, उनका कभी भूलकर—स्वप्नमें भी आचरण नहीं करना चाहिये। हमारे—अपने गुरुजनोंके आचार-व्यवहारमें भी जो उत्तम—शास्त्र एवं शिष्ट पुरुषोंद्वारा अनुमोदित आचरण हैं, जिनके विषयमें किसी प्रकारकी शङ्काको स्थान नहीं है, उन्हींका तुम्हें अनुकरण करना चाहिये, उन्हींका सेवन करना चाहिये। जिनके विषयमें जरा-सी भी शङ्का हो, उनका अनुकरण कभी नहीं करना चाहिये। जो कोई भी हमसे श्रेष्ठ—वय, विद्या, तप, आचरण आदिमें बड़े तथा ब्राह्मण आदि पूज्य पुरुष घरपर पधारें, उनको पाद्य, अर्घ्य, आसन आदि प्रदान करके सब प्रकारसे उनका सम्मान तथा यथायोग्य सेवा करनी चाहिये। अपनी शक्तिके अनुसार दान करनेके लिये तुम्हें सदा उदारतापूर्वक तत्पर रहना चाहिये। जो कुछ भी दिया जाय, वह श्रद्धापूर्वक देना चाहिये। अश्रद्धापूर्वक नहीं देना चाहिये; क्योंकि बिना श्रद्धाके किये हुए दान आदि कर्म असत् माने गये हैं (गीता १७। २७)। लज्जापूर्वक देना चाहिये अर्थात् सारा धन भगवान्का है, मैं यदि इसे अपना