ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 359, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ेंअनु० ८]
तैत्तिरीयोपनिषद्
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अष्टम अनुवाक
ओमिति ब्रह्म। ओमितीडः सर्वम्। ओमित्येतदनुकृतिर्ह स्म वा अघ्यो श्रावयेत्याश्रावयन्ति। ओमिति सामानि गायन्ति। ओः शोमिति। शस्त्राणि शः सन्ति। ओमित्यध्वर्युः प्रतिगंरं प्रतिगृणाति। ओमिति ब्रह्मा प्रसौति। ओमित्यग्निहोत्रमनुजानाति। ओमिति ब्राह्मणः प्रवक्ष्यन्नाह ब्रह्मोपाज्वानीति। ब्रह्मैवोपाज्जोति।
ओम्=‘ओम्’; इति=यह; ब्रह्म=ब्रह्म है; ओम्=‘ओम्’; इति=ही; इदम्=यह प्रत्यक्ष दिखायी देनेवाला; सर्वम्=समस्त जगत् है; ओम्=‘ओम्’; इति=इस प्रकारका; एतत्=यह अक्षर; ह=ही; वै=निःसंदेह; अनुकृतिः=अनुकृति (अनुमोदन) है; स्म=यह बात प्रसिद्ध है; अपि=इसके सिवा; ओ=हे आचार्य; श्रावय=मुझे सुनाइये; इति=यों कहनेपर; आश्रावयन्ति=(‘ओम्’ यों कहकर शिष्यको) उपदेश सुनाते हैं; ओम्=‘ओम्’ (बहुत अच्छा); इति=इस प्रकार (स्वीकृति देकर); [सामगाः]=सामगायक विद्वान्; सामानि=सामवेद-मन्त्रोंको; गायन्ति=गाते हैं; ओम् शोम्=‘ओम् शोम्’; इति=यों कहकर ही; शस्त्राणि=शस्त्रोंको अर्थात् मन्त्रोंको; शंसन्ति=पढ़ते हैं; ओम्=‘ओम्’; इति=यों कहकर; अध्वर्युः=अध्वर्यु नामक ऋत्विक्; प्रतिगंरं प्रतिगृणाति=प्रतिगंर मन्त्रका उच्चारण करता है; ओम्=‘ओम्’; इति=यों कहकर; ब्रह्मा=ब्रह्मा (चौथा ऋत्विक्); प्रसौति=अनुमति देता है; ओम्=‘ओम्’; इति=यह कहकर; अग्निहोत्रम् अनुजानाति=अग्निहोत्र करनेकी आज्ञा देता है; प्रवक्ष्यन्=अध्ययन करनेके लिये उद्यत; ब्राह्मणः=ब्राह्मण; ओम् इति=पहले ओम्का उच्चारण करके; आह=कहता है; ब्रह्म=(मैं) वेदको; उपाज्वानि इति=प्राप्त करूँ; ब्रह्म=(फिर वह) वेदको; एव=निश्चय ही; उपाज्जोति=प्राप्त करता है।
व्याख्या—इस अनुवाकमें ‘ॐ’ इस परमेश्वरके नामके प्रति मनुष्यकी श्रद्धा और रुचि उत्पन्न करनेके लिये ‘ॐ’ कारकी महिमाका वर्णन किया गया है। भाव यह है कि ‘ॐ’ यह परब्रह्म परमात्माका नाम होनेसे साक्षात् ब्रह्म ही