ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
अनु० ८]
तैत्तिरीयोपनिषद्
३५७
अष्टम अनुवाक
ओमिति ब्रह्म। ओमितीडः सर्वम्। ओमित्येतदनुकृतिर्ह स्म वा अघ्यो श्रावयेत्याश्रावयन्ति। ओमिति सामानि गायन्ति। ओः शोमिति। शस्त्राणि शः सन्ति। ओमित्यध्वर्युः प्रतिगंरं प्रतिगृणाति। ओमिति ब्रह्मा प्रसौति। ओमित्यग्निहोत्रमनुजानाति। ओमिति ब्राह्मणः प्रवक्ष्यन्नाह ब्रह्मोपाज्वानीति। ब्रह्मैवोपाज्जोति।
ओम्=‘ओम्’; इति=यह; ब्रह्म=ब्रह्म है; ओम्=‘ओम्’; इति=ही; इदम्=यह प्रत्यक्ष दिखायी देनेवाला; सर्वम्=समस्त जगत् है; ओम्=‘ओम्’; इति=इस प्रकारका; एतत्=यह अक्षर; ह=ही; वै=निःसंदेह; अनुकृतिः=अनुकृति (अनुमोदन) है; स्म=यह बात प्रसिद्ध है; अपि=इसके सिवा; ओ=हे आचार्य; श्रावय=मुझे सुनाइये; इति=यों कहनेपर; आश्रावयन्ति=(‘ओम्’ यों कहकर शिष्यको) उपदेश सुनाते हैं; ओम्=‘ओम्’ (बहुत अच्छा); इति=इस प्रकार (स्वीकृति देकर); [सामगाः]=सामगायक विद्वान्; सामानि=सामवेद-मन्त्रोंको; गायन्ति=गाते हैं; ओम् शोम्=‘ओम् शोम्’; इति=यों कहकर ही; शस्त्राणि=शस्त्रोंको अर्थात् मन्त्रोंको; शंसन्ति=पढ़ते हैं; ओम्=‘ओम्’; इति=यों कहकर; अध्वर्युः=अध्वर्यु नामक ऋत्विक्; प्रतिगंरं प्रतिगृणाति=प्रतिगंर मन्त्रका उच्चारण करता है; ओम्=‘ओम्’; इति=यों कहकर; ब्रह्मा=ब्रह्मा (चौथा ऋत्विक्); प्रसौति=अनुमति देता है; ओम्=‘ओम्’; इति=यह कहकर; अग्निहोत्रम् अनुजानाति=अग्निहोत्र करनेकी आज्ञा देता है; प्रवक्ष्यन्=अध्ययन करनेके लिये उद्यत; ब्राह्मणः=ब्राह्मण; ओम् इति=पहले ओम्का उच्चारण करके; आह=कहता है; ब्रह्म=(मैं) वेदको; उपाज्वानि इति=प्राप्त करूँ; ब्रह्म=(फिर वह) वेदको; एव=निश्चय ही; उपाज्जोति=प्राप्त करता है।
व्याख्या—इस अनुवाकमें ‘ॐ’ इस परमेश्वरके नामके प्रति मनुष्यकी श्रद्धा और रुचि उत्पन्न करनेके लिये ‘ॐ’ कारकी महिमाका वर्णन किया गया है। भाव यह है कि ‘ॐ’ यह परब्रह्म परमात्माका नाम होनेसे साक्षात् ब्रह्म ही
३५८
ईशादि नौ उपनिषद्
[ वल्ली १ ]
है; क्योंकि भगवान्का नाम भी भगवत्स्वरूप ही होता है। यह प्रत्यक्ष दिखायी देनेवाला समस्त जगत् 'ॐ' अर्थात् उस ब्रह्मका ही स्थूलरूप है। 'ॐ' यह अनुकृति अर्थात् अनुमोदनका सूचक है। अर्थात् जब किसीकी बातका अनुमोदन करना होता है, तब श्रेष्ठ पुरुष परमेश्वरके नामस्वरूप इस 'ॐ' कारका उच्चारण करके संकेतसे उसका अनुमोदन कर दिया करते हैं, दूसरे व्यर्थ शब्द नहीं बोलते—यह बात प्रसिद्ध है। जब शिष्य अपने गुरुसे तथा श्रोता किसी व्याख्यानदातासे उपदेश सुनानेके लिये प्रार्थना करता है, तब गुरु और वक्ता भी 'ॐ' इस प्रकार कहकर ही उपदेश सुनाना आरम्भ करते हैं। सामवेदका गान करनेवाले भी 'ॐ' इस प्रकार पहले परमेश्वरके नामका भलीभाँति गान करके उसके बाद सामवेदका गान किया करते हैं। यज्ञकर्ममें शस्त्र-शंसनरूप कर्म करनेवाले शास्ता नामक ऋत्विक् 'ओम् शोम्' इस प्रकार कहकर ही शस्त्रोंका अर्थात् तद्विषयक मन्त्रोंका पाठ करते हैं। यज्ञकर्म करानेवाला अध्वर्यु नामक ऋत्विक् भी 'ॐ' इस परमेश्वरके नामका उच्चारण करके ही प्रतिगर-मन्त्रका उच्चारण करता है। ब्रह्मा (चौथा ऋत्विक्) भी 'ॐ' इस प्रकार परमात्माके नामका उच्चारण करके यज्ञकर्म करनेके लिये अनुमति देता है तथा 'ॐ' यों कहकर ही अग्निहोत्र करनेकी आज्ञा देता है। अध्ययन करनेके लिये उद्यत ब्राह्मण ब्रह्मचारी भी 'ॐ' इस प्रकार परमेश्वरके नामका पहले उच्चारण करके कहता है कि 'मैं वेदको भली प्रकार पढ़ सकूँ।' अर्थात् ॐकार जिसका नाम है, उस परमेश्वरसे ॐकारके उच्चारणपूर्वक यह प्रार्थना करता है कि 'मैं वेदको—वैदिक ज्ञानको प्राप्त कर लूँ—ऐसी बुद्धि दीजिये।' इसके फलस्वरूप वह वेदको निःसंदेह प्राप्त कर लेता है। इस प्रकार इस मन्त्रमें ॐ कारकी महिमाका वर्णन है।
॥ अष्टम अनुवाक समाप्त ॥ ८ ॥
अनु० ९ ]
तैत्तिरीयोपनिषद्
३५९
नवम अनुवाक
ऋतं च स्वाध्यायप्रवचने च। सत्यं च स्वाध्यायप्रवचने च। तपश्च स्वाध्यायप्रवचने च। दमश्च स्वाध्यायप्रवचने च। शमश्च स्वाध्यायप्रवचने च। अग्रयश्च स्वाध्यायप्रवचने च। अग्निहोत्रं च स्वाध्यायप्रवचने च। अतिथयश्च स्वाध्यायप्रवचने च। मानुषं च स्वाध्यायप्रवचने च। प्रजा च स्वाध्यायप्रवचने च। प्रजनश्च स्वाध्यायप्रवचने च। प्रजातिश्च स्वाध्यायप्रवचने च। सत्यमिति सत्यवचा राथीतरः। तप इति तपोनित्यः पौरुशिष्टिः। स्वाध्याय- प्रवचने एवेति नाको मौद्रल्यः। तद्धि तपस्तद्धि तपः।
ऋतम्=यथायोग्य सदाचारका पालन; च=और; स्वाध्यायप्रवचने च=शास्त्रका पढ़ना-पढ़ाना भी (यह सब अवश्य करना चाहिये); सत्यम्=सत्यभाषण; च=और; स्वाध्यायप्रवचने च=वेदोंका पढ़ना-पढ़ाना भी (साथ-साथ करना चाहिये); तपः=तपश्चर्या; च=और; स्वाध्यायप्रवचने च=वेदोंका पढ़ना-पढ़ाना भी (साथ-साथ करना चाहिये); दमः=इन्द्रियोंका दमन; च=और; स्वाध्यायप्रवचने च=वेदोंका पढ़ना-पढ़ाना भी (साथ-साथ करना चाहिये); शमः=मनका निग्रह; च=और; स्वाध्यायप्रवचने च=वेदोंका पढ़ना-पढ़ाना भी (साथ-साथ करना चाहिये); अग्रयः=अग्रियोंका चयन; च=और; स्वाध्यायप्रवचने च=वेदोंका पढ़ना-पढ़ाना भी (साथ-साथ करना चाहिये); अग्निहोत्रम्=अग्निहोत्र; च=और; स्वाध्यायप्रवचने च=वेदोंका पढ़ना-पढ़ाना भी (साथ-साथ करना चाहिये); अतिथयः=अतिथियोंकी सेवा; च=और; स्वाध्यायप्रवचने च=वेदोंका पढ़ना-पढ़ाना भी (साथ-साथ करना चाहिये); मानुषम्=मनुष्योचित लौकिक व्यवहार; च=और; स्वाध्यायप्रवचने च=वेदोंका पढ़ना-पढ़ाना भी (साथ-साथ करना चाहिये); प्रजा=गर्भाधानसंस्काररूप कर्म; च=और; स्वाध्यायप्रवचने च=वेदोंका पढ़ना-पढ़ाना भी (साथ-साथ करना चाहिये); प्रजनः=शास्त्रविधिके अनुसार
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ईशादि नौ उपनिषद्
[ वल्ली १ ]
स्त्रीसहवास; च=और; स्वाध्यायप्रवचने च=वेदोंका पढ़ना-पढ़ाना भी (साथ-साथ करना चाहिये); प्रजाति:=कुटुम्बवृद्धिका कर्म; च=और; स्वाध्यायप्रवचने च=शास्त्रका पढ़ना-पढ़ाना भी (साथ-साथ करना चाहिये;); सत्यम्=सत्य ही इनमें श्रेष्ठ है; इति=यों; राथीतरः=राथीतरका पुत्र; सत्यवचाः=सत्यवचा ऋषि कहते हैं; तपः=तप ही सर्वश्रेष्ठ है; इति=यों; पौरुशिष्ठिः=पुरुषिष्ठका पुत्र; तपोनित्यः=तपोनित्य नामक ऋषि कहते हैं; स्वाध्यायप्रवचने एव=वेदका पढ़ना-पढ़ाना ही सर्वश्रेष्ठ है; इति=यों; मौद्रल्यः=मुद्रगलके पुत्र; नाकः='नाक' मुनि कहते हैं; हि=क्योंकि; तत्=वही; तपः=तप है; तत् हि=वही; तपः=तप है।
व्याख्या —इस अनुवाकमें यह बात समझायी गयी है कि अध्ययन और अध्यापन करनेवालोंको अध्ययन-अध्यापनके साथ-साथ शास्त्रोंमें बताये हुए मार्गपर स्वयं चलना भी चाहिये। यही बात उपदेशक और उपदेश सुननेवालोंके विषयमें भी समझनी चाहिये। अभिप्राय यह है कि अध्ययन और अध्यापन दोनों बहुत ही उपयोगी हैं, शास्त्रोंके अध्ययनसे ही मनुष्यको अपने कर्तव्यका तथा उसकी विधि और फलका ज्ञान होता है; अतः इसे करते हुए ही उसके साथ-साथ यथायोग्य सदाचारका पालन, सत्यभाषण, स्वधर्म पालनके लिये बड़े-से-बड़ा कष्ट सहना, इन्द्रियोंको वशमें रखना, मनको वशमें रखना, अग्निहोत्रके लिये अग्निको प्रदीप्त करना, फिर उसमें हवन करना, अतिथिको यथायोग्य सेवा करना, सबके साथ सुन्दर मनुष्योचित लौकिक व्यवहार करना, शास्त्रविधिके अनुसार गर्भाधान करना और ऋतुकालमें नियमितरूपसे स्त्री-सहवास करना तथा कुटुम्बको बढ़ानेका उपाय करना—इस प्रकार इन सभी श्रेष्ठ कर्मोंका अनुष्ठान करते रहना चाहिये। अध्यापक तथा उपदेशकके लिये तो इन सब कर्तव्योंका समुचित पालन और भी आवश्यक है; क्योंकि उनके आदर्शका अनुकरण उनके छात्र तथा श्रोता ग्रहण करते हैं। रथीतरके पुत्र सत्यवचा नामक ऋषिका कहना है कि 'इन सब कर्मोंमें सत्य ही सर्वश्रेष्ठ है; क्योंकि प्रत्येक कर्म सत्यभाषण और सत्यभावपूर्वक किये जानेपर ही यथार्थरूपसे सम्पन्न होता है।' पुरुषिष्ठपुत्र तपोनित्य नामक ऋषिका कहना है कि 'तपश्चर्या ही सर्वश्रेष्ठ
अनु० १० ]
तैत्तिरीयोपनिषद्
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है; क्योंकि तपसे ही सत्यभाषण आदि समस्त धर्मोंके पालन करनेकी और उनमें दृढ़तापूर्वक स्थित रहनेकी शक्ति आती है।' मुदलके पुत्र नाक नामक मुनिका कहना है कि 'वेद और धर्मशास्त्रोंका पठन-पाठन ही सर्वश्रेष्ठ है; क्योंकि वही तप है, वही तप है अर्थात् इन्होंने तप आदि समस्त धर्मोंका ज्ञान होता है।' इन सभी ऋषियोंका कहना यथार्थ है। उनके कथनको उद्धृत करके यह भाव दिखाया गया है कि प्रत्येक कर्ममें इन तीनोंकी प्रधानता रहनी चाहिये। जो कुछ कर्म किया जाय, वह पठन-पाठनसे उपलब्ध शास्त्रज्ञानके अनुकूल होना चाहिये। कितने ही विघ्न क्यों न उपस्थित हों, अपने कर्तव्यपालनरूप तपमें सदा दृढ़ रहना चाहिये और प्रत्येक क्रियामें सत्यभाव और सत्यभाषणपर विशेष ध्यान देना चाहिये।
॥ नवम अनुवाक समाप्त ॥ १ ॥
दशम अनुवाक
अहं वृक्षस्य रेरिवा। कीर्तिः पृष्ठं गिरेरिव। ऊर्ध्वपवित्रो वाजिनीव स्वमृतमस्मि। द्रविणः सवर्चसम्। सुमेधा अमृतोक्षितः। इति त्रिशङ्कोर्वेदानुवचनम्।
अहम्=मैं; वृक्षस्य=संसारवृक्षका; रेरिवा=उच्छेद करनेवाला हूँ; [ मम ] कीर्तिः= मेरी कीर्ति; गिरेः=पर्वतके; पृष्ठम् इव=शिखरकी भाँति उन्नत है; वाजिनि=अज्ञोत्पादक शक्तिसे युक्त सूर्यमें; स्वमृतम् इव=जैसे उत्तम अमृत है, उसी प्रकार मैं भी; ऊर्ध्वपवित्रः अस्मि=अतिशय पवित्र अमृतस्वरूप हूँ; (तथा मैं) सवर्चसम्=प्रकाशयुक्त; द्रविणम्=धनका भण्डार हूँ; अमृतोक्षितः=(परमानन्दमय) अमृतसे अभिषिक्त (तथा); सुमेधाः=श्रेष्ठ बुद्धिवाला हूँ; इति=इस प्रकार (यह); त्रिशङ्कोः=त्रिशङ्कु ऋषिका; वेदानुवचनम्=अनुभव किया हुआ वैदिक प्रवचन है।
व्याख्या—त्रिशङ्कु नामक ऋषिने परमात्माको प्राप्त होकर जो अपना अनुभव व्यक्त किया था, उसे ही इस अनुवाकमें उद्धृत किया गया है। त्रिशङ्कुके
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ईशादि नौ उपनिषद्
[ वल्ली १ ]
वचनानुसार अपने अन्तःकरणमें भावना करना भी परमात्माकी प्राप्तिका साधन है, यही बतानेके लिये इस अनुवाकका आरम्भ हुआ है। श्रुतिका भावार्थ यह है कि मैं प्रवाहरूपमें अनादिकालसे चले आते हुए इस जन्म-मृत्युरूप संसारवृक्षका उच्छेद करनेवाला हूँ। यह मेरा अन्तिम जन्म है। इसके बाद मेरा पुनः जन्म नहीं होनेका। मेरी कीर्ति पर्वत-शिखरकी भाँति उन्नत एवं विशाल है। अत्रोत्पादक शक्तिसे युक्त सूर्यमें जैसे उत्तम अमृतका निवास है, उसी प्रकार मैं भी विशुद्ध रोग-दोष आदिसे सर्वथा मुक्त हूँ, अमृतस्वरूप हूँ। इसके सिवा मैं प्रकाशयुक्त धनका भण्डार हूँ, परमानन्दरूप अमृतमें निमग्न और श्रेष्ठ धारणायुक्त बुद्धिसे सम्पन्न हूँ। इस प्रकार यह त्रिशङ्कु ऋषिका वेदानुवचन है अर्थात् ज्ञानप्राप्तिके बाद व्यक्त किया हुआ आत्माका उद्गार है।
मनुष्य जिस प्रकारकी भावना करता है, वैसा ही बन जाता है, उसके संकल्पमें यह अपूर्व—आश्चर्यजनक शक्ति है। अतः जो मनुष्य अपनेमें उपर्युक्त भावनाका अभ्यास करेगा वह निश्चय वैसा ही बन जायगा। परंतु इस साधनमें पूर्ण सावधानीकी आवश्यकता है। यदि भावनाके अनुसार गुण न आकर अभिमान आ गया तो पतन भी हो सकता है। यदि इस वेदानुवचनके रहस्यको ठीक समझकर इसकी भावना की जाय तो अभिमानकी आशङ्का भी नहीं की जा सकती।
॥ दशम अनुवाक समाप्त ॥ १० ॥
एकादश अनुवाक
वेदमनूच्याचार्योऽन्तेवासिनमनुशास्ति। सत्यं वद। धर्मं चर। स्वाध्यायान्मा प्रमदः। आचार्याय प्रियं धनमाह्वय प्रजातन्तु मा व्यवच्छेत्सीः। सत्यान्न प्रमदितव्यम्। धर्मान्न प्रमदितव्यम्। कुशलान्न प्रमदितव्यम्। भूतै न प्रमदितव्यम्। स्वाध्यायप्रवचनाभ्यां न प्रमदितव्यम्। देवपितृकार्याभ्यां न प्रमदितव्यम्।
अनु० ११ ]
तैत्तिरीयोपनिषद्
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वेदम् अनुच्य=वेदका भलीभाँति अध्ययन कराकर; आचार्यः=आचार्य; अन्तेवासिनम्=अपने आश्रममें रहनेवाले ब्रह्मचारी विद्यार्थीको; अनुशास्ति=शिक्षा देता है; सत्यम् वद=तुम सत्य बोलो; धर्मम् चर=धर्मका आचरण करो; स्वाध्यायात्=स्वाध्यायसे; मा प्रमदः=कभी न चूको; आचार्याय=आचार्यके लिये; प्रियम् धनम्=दक्षिणाके रूपमें वाञ्छित धन; आह्वय=लाकर (दो; फिर उनकी आज्ञासे गृहस्थ-आश्रममें प्रवेश करके); प्रजातन्तुम्=संतान-परम्पराको (चालू रखो, उसका); मा व्यवच्छेत्सीः=उच्छेद न करना; सत्यात्=(तुमको) सत्यसे; न प्रमदितव्यम्=कभी नहीं डिगना चाहिये; धर्मात्=धर्मसे; न=नहीं; प्रमदितव्यम्=डिगना चाहिये; कुशलात्=शुभ कर्मोंसे; न प्रमदितव्यम्=कभी नहीं चूकना चाहिये; भूत्ये=उन्नतिके साधनोंसे; न प्रमदितव्यम्=कभी नहीं चूकना चाहिये; स्वाध्यायप्रवचनाभ्याम्=वेदोंके पढ़ने और पढ़ानेमें; न प्रमदितव्यम्=कभी भूल नहीं करनी चाहिये; देवपितृकार्याभ्याम्=देवकार्यसे और पितृकार्यसे; न प्रमदितव्यम्=कभी नहीं चूकना चाहिये।
व्याख्या—गृहस्थको अपना जीवन कैसा बनाना चाहिये, यह बात समझानेके लिये इस अनुवाकका आरम्भ किया गया है। आचार्य शिष्यको वेदका भलीभाँति अध्ययन कराकर समावर्तन-संस्कारके समय गृहस्थाश्रममें प्रवेश करके गृहस्थ-धर्मका पालन करनेकी शिक्षा देते हैं—पुत्र! तुम सदा सत्य-भाषण करना, आपत्ति पड़नेपर भी झूठका कदापि आश्रय न लेना, अपने वर्ण-आश्रमके अनुकूल शास्त्र-सम्मत धर्मका अनुष्ठान करना, स्वाध्यायसे अर्थात् वेदोंके अभ्यास, संध्यावन्दन, गायत्रीजप और भगवद्भाम-गुणकीर्तन आदि नित्यकर्ममें कभी भी प्रमाद न करना—अर्थात् न तो कभी उन्हें अनादरपूर्वक करना और न आलस्यवश उनका त्याग ही करना। गुरुके लिये दक्षिणाके रूपमें उनकी रुचिके अनुरूप धन लाकर प्रेमपूर्वक देना; फिर उनकी आज्ञासे गृहस्थाश्रममें प्रवेश करके स्वधर्मका पालन करते हुए संतान-परम्पराको सुरक्षित रखना—उसका लोप न करना। अर्थात् शास्त्रविधिके अनुसार विवाहित धर्मपत्नीके साथ ऋतुकालमें नियमित सहवास करके संतानोत्पत्तिका कार्य
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ईशादि नौ उपनिषद्
[ वल्ली १ ]
अनासक्तिपूर्वक करना। तुमको कभी भी सत्यसे नहीं चूकना चाहिये अर्थात् हँसी-दिल्लगी या व्यर्थकी बातोंमें वाणीकी शक्तिको न तो नष्ट करना चाहिये और न परिहास आदिके बहाने कभी झूठ ही बोलना चाहिये। इसी प्रकार धर्मपालनमें भी भूल नहीं करनी चाहिये अर्थात् कोई बहाना बनाकर या आलस्यवश कभी धर्मकी अवहेलना नहीं करनी चाहिये। लौकिक और शास्त्रीय—जितने भी कर्तव्यरूपसे प्राप्त शुभ कर्म हैं, उनका कभी त्याग या उपेक्षा नहीं करनी चाहिये, अपितु यथायोग्य उनका अनुष्ठान करते रहना चाहिये। धन-सम्पत्तिको बढ़ानेवाले लौकिक उन्नतिके साधनोंके प्रति भी उदासीन नहीं होना चाहिये। इसके लिये भी वर्णाश्रमानुकूल चेष्टा करनी चाहिये। पढ़ने और पढ़ानेका जो मुख्य नियम है, उसकी कभी अवहेलना या आलस्यपूर्वक त्याग नहीं करना चाहिये। इसी प्रकार अग्निहोत्र और यज्ञादिके अनुष्ठानरूप देवकार्य तथा श्राद्ध-तर्पण आदि पितृकार्यके सम्पादनमें भी आलस्य या अवहेलनापूर्वक प्रमाद नहीं करना चाहिये।
मातृदेवो भव। पितृदेवो भव। आचार्यदेवो भव। अतिथिदेवो भव। यान्यनवद्यानि कर्माणि। तानि सेवितव्यानि। नो इतराणि। यान्यस्माकं सुचरितानि। तानि त्वयोपास्यानि। नो इतराणि। ये के चासमच्छ्रेयाः सो ब्राह्मणाः। तेषां त्वयाऽऽसनेन प्रश्रंसितव्यम्। श्रद्धया देयम्। अश्रद्धयादेयम्। श्रिया देयम्। ह्रिया देयम्। भिया देयम्। संविदा देयम्।
मातृदेवः भव =तुम मातामें देवबुद्धि करनेवाले बनो; पितृदेवः भव =पिताको देवरूप समझनेवाले होओ; आचार्यदेवः भव =आचार्यको देवरूप समझनेवाले बनो; अतिथिदेवः भव =अतिथिको देवतुल्य समझनेवाले होओ; यानि =जो-जो; अनवद्यानि =निर्दोष; कर्माणि =कर्म हैं; तानि =उन्होंका; सेवितव्यानि =तुम्हें सेवन करना चाहिये; इतराणि =दूसरे (दोषयुक्त) कर्मोंका; नो =कभी आचरण नहीं करना चाहिये; अस्माकम् =हमारे (आचरणोंमेंसे भी); यानि =जो-जो; सुचरितानि =अच्छे
अनु० ११ ]
तैत्तिरीयोपनिषद्
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आचरण है; तानि=उनका ही; त्वया=तुमको; उपास्यानि=सेवन करना चाहिये; इतराणि=दूसरोंका; नो=कभी नहीं; ये के च=जो कोई भी; असम्त्=हमसे; श्रेयांसः=श्रेष्ठ (गुरुजन एवं); ब्राह्मणाः=ब्राह्मण आर्ये; तेषाम्=उनको; त्वया=तुम्हें; आसनेन=आसन-दान आदिके द्वारा सेवा करके; प्रशंसितव्यम्=विश्राम देना चाहिये; श्रद्धया देयम्=श्रद्धापूर्वक दान देना चाहिये; अश्रद्धया=बिना श्रद्धाके; अदेयम्=नहीं देना चाहिये; श्रिया देयम्=आर्थिक स्थितिके अनुसार देना चाहिये; ह्रिया देयम्=लज्जासे देना चाहिये; भिया देयम्=भयसे भी देना चाहिये (और); संविदा देयम्=(जो कुछ भी दिया जाय, वह सब) विवेकपूर्वक देना चाहिये।
व्याख्या— पुत्र! तुम मातामें देवबुद्धि रखना, पितामें भी देवबुद्धि रखना, आचार्यमें देवबुद्धि रखना तथा अतिथिमें भी देवबुद्धि रखना। आशय यह कि इन चारोंको ईश्वरकी प्रतिमूर्ति समझकर श्रद्धा और भक्तिपूर्वक सदा इनकी आज्ञाका पालन, नमस्कार और सेवा करते रहना; इन्हें सदा अपने विनयपूर्ण व्यवहारसे प्रसन्न रखना। जगत्में जो-जो निर्दीष कर्म हैं, उन्हींका तुम्हें सेवन करना चाहिये। उनसे भिन्न जो दोषयुक्त—निषिद्ध कर्म हैं, उनका कभी भूलकर—स्वप्नमें भी आचरण नहीं करना चाहिये। हमारे—अपने गुरुजनोंके आचार-व्यवहारमें भी जो उत्तम—शास्त्र एवं शिष्ट पुरुषोंद्वारा अनुमोदित आचरण हैं, जिनके विषयमें किसी प्रकारकी शङ्काको स्थान नहीं है, उन्हींका तुम्हें अनुकरण करना चाहिये, उन्हींका सेवन करना चाहिये। जिनके विषयमें जरा-सी भी शङ्का हो, उनका अनुकरण कभी नहीं करना चाहिये। जो कोई भी हमसे श्रेष्ठ—वय, विद्या, तप, आचरण आदिमें बड़े तथा ब्राह्मण आदि पूज्य पुरुष घरपर पधारें, उनको पाद्य, अर्घ्य, आसन आदि प्रदान करके सब प्रकारसे उनका सम्मान तथा यथायोग्य सेवा करनी चाहिये। अपनी शक्तिके अनुसार दान करनेके लिये तुम्हें सदा उदारतापूर्वक तत्पर रहना चाहिये। जो कुछ भी दिया जाय, वह श्रद्धापूर्वक देना चाहिये। अश्रद्धापूर्वक नहीं देना चाहिये; क्योंकि बिना श्रद्धाके किये हुए दान आदि कर्म असत् माने गये हैं (गीता १७। २७)। लज्जापूर्वक देना चाहिये अर्थात् सारा धन भगवान्का है, मैं यदि इसे अपना
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ईशादि नौ उपनिषद्
[ वल्ली १ ]
मार्नू तो यह अपराध है। इसे सब प्राणियोंके हृदयमें स्थित भगवान्की सेवामें ही लगाना मेरा कर्तव्य है। मैं जो कुछ दे रहा हूँ, वह भी बहुत कम है। यों सोचकर संकोचका अनुभव करते हुए देना चाहिये। मनमें दानीपनके अभिमानको नहीं आने देना चाहिये। सर्वत्र और सबमें भगवान् हैं, अतः दान लेनेवाले भी भगवान् ही हैं। उनकी बड़ी कृपा है कि मेरा दिया हुआ स्वीकार कर रहे हैं। यों विचारकर भगवान्से भय मानते हुए दान देना चाहिये। 'हम किसीका उपकार कर रहे हैं' ऐसी भावना मनमें लाकर अभिमान या अविनय नहीं प्रकट करना चाहिये। परंतु जो कुछ दिया जाय—वह विवेकपूर्वक, उसके परिणामको समझकर निष्कामभावसे कर्तव्य समझकर देना चाहिये (गीता १७।२०)। इस प्रकार दिया हुआ दान ही भगवान्की प्रीतिका—कल्याणका साधन हो सकता है। वही अक्षय फलका देनेवाला है।
अथ यदि ते कर्मविचिकित्सा वा वृत्तविचिकित्सा वा स्यात्। ये तत्र ब्राह्मणाः सम्मर्शिनः। युक्ता आयुक्ताः। अलूक्षा धर्मकामाः स्युः। यथा ते तत्र वर्तैरन्। तथा तत्र वर्तैश्वाः। अथाभ्याख्यातेषु। ये तत्र ब्राह्मणाः सम्मर्शिनः। युक्ता आयुक्ताः। अलूक्षा धर्मकामाः स्युः। यथा ते तेषु वर्तैरन्। तथा तेषु वर्तैश्वाः। एष आदेशः। एष उपदेशः। एषा वेदोपनिषत्। एतदनुशासनम्। एवमुपासितव्यम्। एवमु चैतदुपास्यम्।
अथ=इसके बाद; यदि=यदि; ते=तुमको; कर्मविचिकित्सा=कर्तव्यके निर्णय करनेमें किसी प्रकारकी शङ्का हो; वा=या; वृत्तविचिकित्सा=सदाचारके विषयमें कोई शङ्का; वा=कदाचित्; स्यात्=हो जाय तो; तत्र=वहाँ; ये=जो; सम्मर्शिनः=उत्तम विचारवाले; युक्ताः=परामर्श देनेमें कुशल; आयुक्ताः=कर्म और सदाचारमें पूर्णतया लगे हुए; अलूक्षाः=स्निग्ध स्वभाववाले; (तथा) धर्मकामाः=एकमात्र धर्मके ही अभिलाषी; ब्राह्मणाः=ब्राह्मण; स्युः=हों; ते=वे; यथा=जिस प्रकार; तत्र=उस कर्म और आचरणके क्षेत्रमें; वर्तैरन्=बर्ताव करते हों; तत्र=उस कर्म
अनु० ११ ]
तैत्तिरीयोपनिषद्
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और आचरणके क्षेत्रमें; तथा=वैसे ही; वर्तैथाः=तुमको भी बर्ताव करना चाहिये; अथ=तथा यदि; अभ्याख्यातेषु=किसी दोषसे लाञ्छित मनुष्योंके साथ बर्ताव करनेमें (संदेह उत्पन्न हो जाय, तो भी); ये=जो; तत्र=वहाँ; सम्मर्शिनः=उत्तम विचारवाले; युक्ताः=परामर्श देनेमें कुशल; आयुक्ताः=सब प्रकारसे यथायोग्य सत्कर्म और सदाचारमें भलीभाँति लगे हुए; अलूक्षाः=रूखेपनसे रहित; धर्मकामाः=धर्मके अभिलाषी; ब्राह्मणाः=(विद्वान्) ब्राह्मण; स्युः=हों; ते=वे; यथा=जिस प्रकार; तेषु=उनके साथ; वर्तैरन्=बर्ताव करें; तेषु=उनके साथ; तथा=वैसा ही; वर्तैथाः=तुमको भी बर्ताव करना चाहिये; एषः आदेशः=यह शास्त्रकी आज्ञा है; एषः उपदेशः=यही (गुरुजनोंका अपने शिष्यों और पुत्रोंके लिये) उपदेश है; एषा=यही; वेदोपनिषत्=वेदोंका रहस्य है; च=और; एतत्=यही; अनुशासनम्=परम्परागत शिक्षा है; एवम्=इसी प्रकार; उपासितव्यम्=तुमको अनुष्ठान करना चाहिये; एवम् उ=इसी प्रकार; एतत्=यह; उपास्यम्=अनुष्ठान करना चाहिये।
व्याख्या—'यह सब करते हुए भी यदि तुमको किसी अवसरपर अपना कर्तव्य निश्चित करनेमें दुविधा उत्पन्न हो जाय, अपनी बुद्धिसे किसी एक निश्चयपर पहुँचना कठिन हो जाय—तुम किंकर्तव्यविमूढ़ हो जाओ तो ऐसी स्थितिमें वहाँ जो कोई उत्तम विचार रखनेवाले, उचित परामर्श देनेमें कुशल, सत्कर्म और सदाचारमें तत्परतापूर्वक लगे हुए, सबके साथ प्रेमपूर्वक व्यवहार करनेवाले तथा एकमात्र धर्मपालनकी ही इच्छा रखनेवाले विद्वान् ब्राह्मण (या अन्य कोई ऐसे ही महापुरुष) हों—वे जिस प्रकार ऐसे प्रसङ्गोंपर आचरण करते हों, उसी प्रकारका आचरण तुम्हें भी करना चाहिये। ऐसे स्थलोंमें उन्हींके सत्परामर्शके अनुसार उन्हींके स्थापित आदर्शका अनुगमन करना चाहिये। इसके अतिरिक्त जो मनुष्य किसी दोषके कारण लाञ्छित हो गया हो, उसके साथ किस समय कैसा व्यवहार करना चाहिये—इस विषयमें भी यदि तुमको दुविधा प्राप्त हो जाय—तुम अपनी बुद्धिसे निर्णय न कर सको तो वहाँ भी जो विचारशील, परामर्श देनेमें कुशल, सत्कर्म और सदाचारमें पूर्णतया संलग्न तथा
३६८
ईशादि नौ उपनिषद्
[ वल्ली १ ]
धर्मकामी (सांसारिक धनादिकी कामनासे रहित) निःस्वार्थी विद्वान् ब्राह्मण हों, वे लोग उसके साथ जैसा व्यवहार करें, वैसा ही तुमको भी करना चाहिये। उनका व्यवहार ही इस विषयमें प्रमाण है।'
'यही शास्त्रकी आज्ञा है—शास्त्रोंका निचोड़ है। यही गुरु एवं माता-पिताका अपने शिष्यों और संतानोंके प्रति उपदेश है तथा यही सम्पूर्ण वेदोंका रहस्य है। इतना ही नहीं, अनुशासन भी यही है। ईश्वरकी आज्ञा तथा परम्परागत उपदेशका नाम अनुशासन है। इसलिये तुमको इसी प्रकार कर्तव्य एवं सदाचारका पालन करना चाहिये। इसी प्रकार कर्तव्य एवं सदाचारका पालन करना चाहिये।'
॥ एकादश अनुवाक समाप्त ॥ ११ ॥
द्वादश अनुवाक
शं नो मित्रः शं वरुणः। शं नो भवत्यर्यमा। शं न इन्द्रो बृहस्पतिः। शं नो विष्णुरुरुक्रमः*। नमो ब्रह्मणे। नमस्ते वायो। त्वमेव प्रत्यक्षं ब्रह्मासि। त्वामेव प्रत्यक्षं ब्रह्मावादिषम्। ऋतमवादिषम्। सत्यमवादिषम्। तन्मामावीत्। तद्वक्तारमावीत्। आवीन्माम्। आवीद्वक्तारम्।
ॐ शान्तिः! शान्तिः!! शान्तिः!!!
नः=हमारे लिये; मित्रः=(दिन और प्राणके अधिष्ठाता) मित्रदेवता; शम् [ भवतु ]=कल्याणप्रद हों; (तथा) वरुणः=(रात्रि और अपानके अधिष्ठाता) वरुण भी; शम् [ भवतु ]=कल्याणप्रद हों; अर्यमा=(चक्षु और सूर्यमण्डलके अधिष्ठाता) अर्यमा; नः=हमारे लिये; शम् भवतु=कल्याणमय हों; इन्द्रः=(बल
- यह मन्त्र ऋग्वेद मण्डल १ सूक्त ९० का नवौ है तथा यजु० ३६। ९ है।
अनु० १२]
तैत्तिरीयोपनिषद्
३६९
और भुजाओंके अधिष्ठाता) इन्द्र; (तथा) बृहस्पतिः=(वाणी और बुद्धिके अधिष्ठाता) बृहस्पति; नः=हमारे लिये; शम् [ भवतु ]=शान्ति प्रदान करनेवाले हों; उरुक्रमः=त्रिविक्रमरूपसे विशाल डगोंवाले; विष्णुः=विष्णु (जो पैरोंके अधिष्ठाता हैं); नः=हमारे लिये; शम् [ भवतु ]=कल्याणमय हों; ब्रह्मणे=(उपर्युक्त सभी देवताओंके आत्मस्वरूप) ब्रह्माके लिये; नमः=नमस्कार है; वायो=हे वायुदेव!; ते=तुम्हारे लिये; नमः=नमस्कार है; त्वम्=तुम; एव=ही; प्रत्यक्षम्=प्रत्यक्ष (प्राणरूपसे प्रतीत होनेवाले); ब्रह्म अस्मि=ब्रह्म हो (इसलिये मैंने); त्वाम्=तुझको; एव=ही; प्रत्यक्षम्=प्रत्यक्ष; ब्रह्म=ब्रह्म; अवादिषम्=कहा है; ऋतम्=(तुम ऋतके अधिष्ठाता हो, इसलिये मैंने तुम्हें) ऋत नामसे; अवादिषम्=पुकारा है; सत्यम्=(तुम सत्यके अधिष्ठाता हो, अतः मैंने तुम्हें) सत्य नामसे; अवादिषम्=कहा है; तत्=उस (सर्वशक्तिमान् परमेश्वरने); माम् आवीत्=मेरी रक्षा की है; तत्=उसने; वक्तारम् आवीत्=वक्ताकी—आचार्यकी रक्षा की है; आवीत् माम्=रक्षा की है मेरी; (और) आवीत् वक्तारम्=रक्षा की है मेरे आचार्यकी; ॐ शान्तिः=भगवान् शान्तिस्वरूप हैं; शान्तिः=शान्तिस्वरूप हैं; शान्तिः=शान्तिस्वरूप हैं।
व्याख्या —शीशावल्लीके इस अन्तिम अनुवाकमें भिन्न-भिन्न शक्तियोंके अधिष्ठाता परब्रह्म परमेश्वरसे भिन्न-भिन्न नाम और रूपोंमें उनकी स्तुति करते हुए प्रार्थनापूर्वक कृतज्ञता प्रकट की गयी है। भाव यह है कि समस्त आधिदैविक, आध्यात्मिक और आधिभौतिक शक्तियोंके रूपमें तथा उनके अधिष्ठाता मित्र, वरुण आदि देवताओंके रूपमें जो सबके आत्मा अन्तर्यामी परमेश्वर हैं, वे सब प्रकारसे हमारे लिये कल्याणमय हों—हमारी उन्नतिके मार्गमें किसी प्रकारका विघ्न न आने दें। हम सबके अन्तर्यामी ब्रह्मको नमस्कार करते हैं।
इस प्रकार परमात्मासे शान्तिकी प्रार्थना करके सूत्रात्मा प्राणके रूपमें समस्त प्राणियोंमें व्याप्त परमेश्वरकी वायुके नामसे स्तुति करते हैं—‘हे सर्वशक्तिमान्, सबके प्राणस्वरूप वायुमय परमेश्वर! आपको नमस्कार है। आप
३७०
ईशादि नौ उपनिषद्
[ वल्ली १ ]
ही समस्त प्राणियोंके प्राणस्वरूप प्रत्यक्ष ब्रह्म हैं; अतः मैंने आपको ही प्रत्यक्ष ब्रह्म कहकर पुकारा है। मैंने ऋत नामसे भी आपको ही पुकारा है; क्योंकि सारे प्राणियोंके लिये जो कल्याणकारी नियम है, उस नियमरूप ऋतके आप ही अधिष्ठाता हैं। यही नहीं, मैंने 'सत्य' नामसे भी आपको ही पुकारा है; क्योंकि सत्य—यथार्थ भाषणके अधिष्ठातु-देवता भी आप ही हैं। उन सर्वव्यापी अन्तर््यामी परमेश्वरने मुझे सत्-आचरण एवं सत्य-भाषण करनेकी और सत्-विद्याको ग्रहण करनेकी शक्ति प्रदान करके इस जन्म-मरणरूप संसारचक्रसे मेरी रक्षा की है तथा मेरे आचार्यको उन सबका उपदेश देकर सर्वत्र उस सत्यका प्रचार करनेकी शक्ति प्रदान करके उनकी रक्षा—उनका भी सब प्रकारसे कल्याण किया है। यहाँ 'मेरी रक्षा की है, मेरे वक्ताकी रक्षा की है' इन वाक्योंको दुहरानेका अभिप्राय शीक्षावल्लीकी समाप्तिकी सूचना देना है।'
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः.—इस प्रकार तीन बार 'शान्तिः' पदका उच्चारण करनेका भाव यह है कि आधिभौतिक, आधिदैविक और आध्यात्मिक—तीनों प्रकारके विघ्नोंका सर्वथा उपशमन हो जाय। भगवान् शान्तिस्वरूप हैं। अतः उनके स्मरणसे सब प्रकारकी शान्ति निश्चित है।
॥ द्वादश अनुवाक समाप्त ॥ १२ ॥
॥ प्रथम वल्ली समाप्त ॥ १ ॥
—●—●—●—
ॐ
ब्रह्मानन्दवल्ली
शान्तिपाठ
ॐ सह नाववतु। सह नौ भुनक्तु। सह वीर्यं करवावहै। तेजस्वि नावधीतमस्तु। मा विद्विषावहै।
ॐ शान्तिः! शान्तिः!! शान्तिः!!!
ॐ=पूर्णब्रह्म परमात्मन्!; (आप) नौ=हम दोनों (गुरु-शिष्य) की; सह=साथ-साथ; अवतु=रक्षा करें; नौ=हम दोनोंका; सह=साथ-साथ; भुनक्तु=पालन करें; सह=(हम दोनों) साथ-साथ ही; वीर्यम्=शक्ति; करवावहै=प्राप्त करें; नौ=हम दोनोंकी; अधीतम्=पढ़ी हुई विद्या; तेजस्वि=तेजोमयी; अस्तु=हो; मा विद्विषावहै=हम दोनों परस्पर द्वेष न करें।
व्याख्या —हे परमात्मन्! आप हम गुरु-शिष्य दोनोंकी साथ-साथ सब प्रकारसे रक्षा करें, हम दोनोंका आप साथ-साथ समुचितरूपसे पालन-पोषण करें, हम दोनों साथ-ही-साथ सब प्रकारसे बल प्राप्त करें, हम दोनोंकी अध्ययन की हुई विद्या तेजपूर्ण हो— कहीं किसीसे हम विद्यामें परास्त न हों और हम दोनों जीवनभर परस्पर स्नेह-सूत्रसे बँधे रहें; हमारे अंदर परस्पर कभी द्वेष न हो। हे परमात्मन्! तीनों तापोंकी निवृत्ति हो।
प्रथम अनुवाक
ब्रह्मविदाज्जोति परम्। तदेषाभ्युक्ता।
ब्रह्मवित्-ब्रह्मज्ञानी; परम्=परब्रह्मको; आज्जोति=प्राप्त कर लेता है; तत्=उसी भावको व्यक्त करनेवाली; एषा=यह (श्रुति); अभ्युक्ता=कही गयी है।
व्याख्या —ब्रह्मज्ञानी महात्मा परब्रह्मको प्राप्त हो जाता है, इसी बातको बतानेके लिये आगे आनेवाली श्रुति कही गयी है।
३७२
ईशादि नौ उपनिषद्
[ वल्ली २ ]
सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म। यो वेद निहितं गृह्यायां परमे व्योमन्। सोऽश्रुते सर्वान् कामान् सह ब्रह्मणा विपश्चितेति।
ब्रह्म=ब्रह्म; सत्यम्=सत्य; ज्ञानम्=ज्ञानस्वरूप; (और) अनन्तम्=अनन्त है; यः=जो मनुष्य; परमे व्योमन्=परम विशुद्ध आकाशमें (रहते हुए भी); गृह्यायाम्=प्राणियोंके हृदयरूप गुफामें; निहितम्=छिपे हुए (उस ब्रह्मको); वेद=जानता है; सः=वह; विपश्चिता=(उस) विज्ञानस्वरूप; ब्रह्मणा सह=ब्रह्मके साथ; सर्वान्=समस्त; कामान् अश्रुते=भोगोंका अनुभव करता है; इति=इस प्रकार (यह ऋचा है)।
व्याख्या —इस मन्त्रमें परब्रह्म परमात्माके स्वरूपबोधक लक्षण बताकर उनकी प्राप्तिके स्थानका वर्णन करते हुए उनकी प्राप्तिका फल बताया गया है। भाव यह है कि वे परब्रह्म परमात्मा सत्यस्वरूप हैं। 'सत्य' शब्द यहाँ नित्य सत्ताका बोधक है। अर्थात् वे परब्रह्म नित्य सत् हैं; किसी भी कालमें उनका अभाव नहीं होता तथा वे ज्ञानस्वरूप हैं, उनमें अज्ञानका लेश भी नहीं है और वे अनन्त हैं अर्थात् देश और कालकी सीमासे अतीत—सीमारहित हैं। वे ब्रह्म परम विशुद्ध आकाशमें रहते हुए भी सबके हृदयकी गुफामें छिपे हुए हैं। उन परब्रह्म परमात्माको जो साधक तत्त्वसे जान लेता है, वह सबको भलीभाँति जाननेवाले उन ब्रह्मके साथ रहता हुआ सब प्रकारके भोगोंको अलौकिक ढंगसे अनुभव करता है।*
- इस कथनके रहस्यको समझ लेनेपर ईशावास्यापनिषद्के प्रथम मन्त्रमें साधकके लिये दिये हुए उपदेशका भी स्पष्ट हो जाता है। वहाँ कहा है कि इस ब्रह्माण्डमें जो कुछ भी जड़-चेतनरूप जगत् है, वह ईश्वरसे परिपूर्ण है, उस ईश्वरको अपने साथ रखते हुए अर्थात् निरन्तर याद रखते हुए ही त्यागपूर्वक आवश्यक विषयोंका सेवन करना चाहिये। जो उपदेश वहाँ साधकके लिये दिया गया है, वही बात यहाँ सिद्ध महात्माकी स्थिति बतानेके लिये कही गयी है। 'वह ब्रह्मके साथ सब भोगोंका अनुभव करता है' इस कथनका अभिप्राय यही है कि वह परमात्माको प्राप्त सिद्ध पुरुष इन्द्रियोंद्वारा बाह्य विषयोंका सेवन करते हुए भी स्वयं सदा परमात्मामें ही स्थित रहता है। उसके मन, बुद्धि और इन्द्रियोंके व्यवहार, उनके द्वारा होनेवाली सभी चेष्टाएँ परमात्मामें स्थित रहते हुए ही होती हैं। लोगोंके देखनेमें आवश्यकतानुसार यथायोग्य विषयोंका इन्द्रियोंद्वारा उपभोग करते समय भी वह परमात्मासे कभी एक क्षणके लिये
अनु० १ ]
तैत्तिरीयोपनिषद्
३७३
सम्बन्ध— वे परब्रह्म परमात्मा किस प्रकार कैसी गुफामें छिपे हुए हैं, उन्हें कैसे जानना चाहिये—इस जिज्ञासापर आगेका प्रकरण आरम्भ किया जाता है—
तस्माद्वा एतस्मादात्मन आकाशः सम्भूतः। आकाशाद्वायुः। वायोरग्निः। अग्निरापः। अदभ्यः पृथिवी। पृथिव्या ओषधयः। ओषधीभ्योऽन्नम्। अन्नान्तरुषः। स वा एष पुरुषोऽन्नरसमयः। तस्येदमेव शिरः। अयं दक्षिणः पक्षः। अयमुत्तरः पक्षः। अयमात्मा। इदं पुच्छं प्रतिष्ठा। तदप्येष श्लोको भवति।
वै=निश्चय ही; तस्मात्=(सर्वत्र प्रसिद्ध) उस; एतस्मात्=इस; आत्मनः=परमात्मासे; (पहले-पहल) आकाशः=आकाशतत्त्व; सम्भूतः=उत्पन्न हुआ; आकाशात्=आकाशसे; वायुः=वायु; वायोः=वायुसे; अग्निः=अग्नि; अग्नेः=अग्निसे; आपः=जल; (और) अदभ्यः=जलतत्त्वसे; पृथिवी=पृथ्वीतत्त्व उत्पन्न हुआ; पृथिव्याः=पृथ्वीसे; ओषधयः=समस्त ओषधियाँ उत्पन्न हुई; ओषधीभ्यः=ओषधियोंसे; अन्नम्=अन्न उत्पन्न हुआ; अन्नान्तरुषः=अन्नसे ही; पुरुषः=(यह) मनुष्य-शरीर उत्पन्न हुआ; सः=वह; एषः=यह; पुरुषः=मनुष्य-शरीर; वै=निश्चय ही; अन्नरसमयः=अन्नरसमय है; तस्य=उसका; इदम्=यह (प्रत्यक्ष दीखनेवाला सिर); एव=ही; शिरः=(पक्षीकी कल्पनामें) सिर है; अयम्=यह (दाहिनी भुजा) ही; दक्षिणः पक्षः=दाहिना पंख है; अयम्=यह (बायीं भुजा) ही; उत्तरः पक्षः=बायीं पंख है; अयम्=यह (शरीरका मध्यभाग) ही; आत्मा=पक्षीके अङ्गोंका मध्य भाग है;* इदम्=यह (दोनों पैर ही); पुच्छम् प्रतिष्ठा=पूँछ एवं प्रतिष्ठा है; तत् अपि=उसीके विषयमें; एषः=यह (आगे कहा जानेवाला); श्लोकः=श्लोक; भवति=है।
भी अलग नहीं होता (गीता ६।३१)। अतः सदा सभी कर्मोंसे निर्लप रहता है। यही भाव दिखानेके लिये 'विपक्षिता ब्रह्मणा सह सर्वान् कामान् अशनुते' कहा गया है। इस प्रकार यह श्रुति परब्रह्मके स्वरूप तथा उसके ज्ञानकी महिमाको बतानेवाली है।
*'मध्यं ह्येषामङ्गनामात्मा' इस श्रुतिके अनुसार शरीरका मध्यभाग सब अङ्गोंका आत्मा है।
३७४
ईशादि नौ उपनिषद्
[ वल्ली २ ]
व्याख्या —इस मन्त्रमें मनुष्यके हृदयरूप गुफाका वर्णन करनेके उद्देश्यसे पहले मनुष्य-शरीरकी उत्पत्तिका प्रकार संक्षेपमें बताकर उसके अङ्गोंकी पक्षीके अङ्गोंके रूपमें कल्पना की गयी है। भाव यह है कि सबके आत्मा अन्तर्यामी परमात्मासे पहले आकाशतत्त्व उत्पन्न हुआ। आकाशसे वायुतत्त्व, वायुसे अग्नितत्त्व, अग्निसे जलतत्त्व और जलसे पृथ्वी उत्पन्न हुई। पृथ्वीसे नाना प्रकारकी ओषधियाँ—अनाजके पौधे हुए और ओषधियोंसे मनुष्योंका आहार अन्न उत्पन्न हुआ। उस अन्नसे यह स्थूल मनुष्य-शरीररूप पुरुष उत्पन्न हुआ। अन्नके रससे बना हुआ यह जो मनुष्य-शरीरधारी पुरुष है, इसकी पक्षीके रूपमें कल्पना की गयी है। इसका जो यह प्रत्यक्ष सिर है, वही तो मानो पक्षीका सिर है; दाहिनी भुजा ही दाहिना पंख है। बायीं भुजा ही बाँया पंख है। शरीरका मध्यभाग ही मानो उस पक्षीके शरीरका मध्यभाग है। दोनों पैर ही पूँछ एवं प्रतिष्ठा (पक्षीके पैर) हैं। अन्नकी महिमाके विषयमें यह आगे कहा जानेवाला श्लोक—मन्त्र है।
॥ प्रथम अनुवाक समाप्त ॥ १ ॥
द्वितीय अनुवाक
अन्नाद्वै प्रजाः प्रजायन्ते। याः काश्च पृथिवीः श्रिताः। अथो अन्नैव जीवन्ति। अथैनदपि यन्त्यन्ततः। अन्नः हि भूतानां ज्येष्ठम्। तस्मात्सर्वोषधमुच्यते। सर्वं वै तेष्वमानुवन्ति येष्वं ब्रह्मोपासते। अन्नः हि भूतानां ज्येष्ठम्। तस्मात्सर्वोषधमुच्यते। अन्नाद्भूतानि जायन्ते। जातान्यन्नेन वर्धन्ते। अद्यतेऽति च भूतानि। तस्मादन्नं तदुच्यत इति।
पृथिवीम् श्रिताः=पृथ्वीलोकका आश्रय लेकर रहनेवाले; याः काः च=जो कोई भी; प्रजाः=प्राणी हैं (वे सब); अन्नात्=अन्नसे; वै=ही; प्रजायन्ते=उत्पन्न होते
अनु० २ ]
तैत्तिरीयोपनिषद्
३७५
हैं; अथो=फिर; अत्रेन एव=अत्रसे ही; जीवन्ति=जीते हैं; अथ=फिर; अन्ततः=अन्तमें; एनत् अपि=इस अत्रमें ही; यन्ति=विलीन हो जाते हैं; अत्रम्=(अतः) अत्र; हि=ही; भूतानाम्=सब भूतोंमें; ज्येष्ठम्=श्रेष्ठ है; तस्मात्=इसलिये (यह); सर्वोषधम्=सर्वोषधरूप; उच्यते=कहलाता है; ये=जो साधक; अत्रम् ब्रह्म=अत्रकी ब्रह्मभावसे; उपासते=उपासना करते हैं; ते वै=वे अवश्य ही; सर्वम्=समस्त; अत्रम्=अत्रको; आनुवन्ति=प्राप्त कर लेते हैं; हि=क्योंकि; अत्रम्=अत्र ही; भूतानाम्=भूतोंमें; ज्येष्ठम्=श्रेष्ठ है; तस्मात्=इसलिये; सर्वोषधम्=(यह) सर्वोषध नामसे; उच्यते=कहा जाता है; अत्रात्=अत्रसे ही; भूतानि=सब प्राणी; जायन्ते=उत्पन्न होते हैं; जातानि=उत्पन्न होकर; अत्रेन=अत्रसे ही; वर्धन्ते=बढ़ते हैं; तत्=वह; अद्यते=(प्राणियोंद्वारा) खाया जाता है; च=तथा; भूतानि=(स्वयं भी) प्राणियोंको; अन्ति=खाता है; तस्मात्=इसलिये; अत्रम्='अत्र'; इति=इस नामसे; उच्यते=कहा जाता है।
व्याख्या —इस मन्त्रमें अत्रकी महिमाका वर्णन किया गया है। भाव यह है कि इस पृथ्वीलोकमें निवास करनेवाले जितने भी प्राणी हैं, वे सब अत्रसे ही उत्पन्न हुए हैं—अत्रके परिणामरूप रज और वीर्यसे ही उनके शरीर बने हैं, उत्पन्न होनेके बाद अत्रसे ही उनका पालन-पोषण होता है, अतः अत्रसे ही वे जीते हैं। फिर अन्तमें इस अत्रमें ही—अत्र उत्पन्न करनेवाली पृथ्वीमें ही विलीन हो जाते हैं। तात्पर्य यह कि समस्त प्राणियोंके जन्म, जीवन और मरण स्थूलशरीरके सम्बन्धसे ही होते हैं; और स्थूलशरीर अत्रसे ही उत्पन्न होते हैं, अत्रसे ही जीते हैं तथा अत्रके उद्गमस्थान पृथ्वीमें ही विलीन हो जाते हैं। उन शरीरोंमें रहनेवाले जो जीवात्मा हैं, वे अत्रमें विलीन नहीं होते; वे तो मृत्युकालमें प्राणोंके साथ इस शरीरसे निकलकर दूसरे शरीरोंमें चले जाते हैं।
इस प्रकार यह अत्र समस्त प्राणियोंकी उत्पत्ति आदिका कारण है, इसीपर सब कुछ निर्भर करता है; इसलिये यही सबसे श्रेष्ठ है और इसीलिये यह सर्वोषधरूप कहलाता है; क्योंकि इसीसे प्राणियोंका शुधाजन्य संताप दूर होता है। सारे संतापोंका मूल शुधा है, इसलिये उसके शान्त होनेपर सारे संताप दूर
३७६
ईशादि नौ उपनिषद्
[ वल्ली २ ]
हो जाते हैं। जो साधक इस अत्रकी ब्रह्मरूपमें उपासना करते हैं अर्थात् 'यह अत्र ही सर्वश्रेष्ठ है, सबसे बड़ा है' यह समझकर इसकी उपासना करते हैं, वे समस्त अत्रको प्राप्त कर लेते हैं। उन्हें यथेष्ट अत्र प्राप्त हो जाता है, अत्रका अभाव नहीं रहता। यह सर्वथा सत्य है कि यह अत्र ही सब भूतोंमें श्रेष्ठ है, इसलिये यह सर्वोपधमय कहलाता है। सब प्राणी अत्रसे उत्पन्न होते हैं और उत्पन्न होनेके बाद अत्रसे ही बढ़ते हैं—उनके अङ्गोंकी पुष्टि भी अत्रसे ही होती है। सब प्राणी इसको खाते हैं तथा यह भी सब प्राणियोंको खा जाता—अपनेमें विलीन कर लेता है, इसीलिये 'अद्यते, अति च इति अत्रम्' इस व्युत्पत्तिके अनुसार इसका नाम अत्र है।
तस्माद्वा एतस्मादन्नरसमयादन्योऽन्तर आत्मा प्राणमयः। तेनैष पूर्णः। स वा एष पुरुषविध एव। तस्य पुरुषविधतामन्वयं पुरुषविधः। तस्य प्राण एव शिरः। व्यानो दक्षिणः पक्षः। अपान उत्तरः पक्षः। आकाश आत्मा। पृथिवी पुच्छं प्रतिष्ठा। तदप्येष श्लोको भवति।
वै=निश्चय ही; तस्मात्=उस; एतस्मात्=इस; अन्नरसमयात्=अन्नरसमय मनुष्यशरीरसे; अन्यः=भिन्न; अन्तरः=उसके भीतर रहनेवाला; प्राणमयः आत्मा=प्राणमय पुरुष है; तेन=उससे; एषः=यह (अन्नरसमय पुरुष); पूर्णः=व्याप्त है; सः=वह; एषः=यह प्राणमय आत्मा; वै=निश्चय ही; पुरुषविधः एव=पुरुषके आकारका ही है; तस्य=उस (अन्नरसमय) आत्माकी; पुरुषविधताम्=पुरुषतुल्य आकृतिमें; अनु=अनुगत (व्याप्त) होनेसे ही; अयम्=यह; पुरुषविधः=पुरुषके आकारका है; तस्य=उस (प्राणमय आत्मा) का; प्राणः=प्राण; एव=ही; शिरः=(मानो) सिर है; व्यानः=व्यान; दक्षिणः=दाहिना; पक्षः=पंख है; अपानः=अपान; उत्तरः=बार्या; पक्षः=पंख है; आकाशः=आकाश; आत्मा=शरीरका मध्यभाग है; (और) पृथिवी=पृथ्वी; पुच्छम्=पूँछ; (एवम्) प्रतिष्ठा=आधार है; तत्=उस प्राण (की महिमा)के विषयमें; अपि=भी; एषः=यह आगे बताया जानेवाला; श्लोकः भवति=श्लोक है।