ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 370, कुल 548 में से
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ईशादि नौ उपनिषद्
[ वल्ली १ ]
धर्मकामी (सांसारिक धनादिकी कामनासे रहित) निःस्वार्थी विद्वान् ब्राह्मण हों, वे लोग उसके साथ जैसा व्यवहार करें, वैसा ही तुमको भी करना चाहिये। उनका व्यवहार ही इस विषयमें प्रमाण है।'
'यही शास्त्रकी आज्ञा है—शास्त्रोंका निचोड़ है। यही गुरु एवं माता-पिताका अपने शिष्यों और संतानोंके प्रति उपदेश है तथा यही सम्पूर्ण वेदोंका रहस्य है। इतना ही नहीं, अनुशासन भी यही है। ईश्वरकी आज्ञा तथा परम्परागत उपदेशका नाम अनुशासन है। इसलिये तुमको इसी प्रकार कर्तव्य एवं सदाचारका पालन करना चाहिये। इसी प्रकार कर्तव्य एवं सदाचारका पालन करना चाहिये।'
॥ एकादश अनुवाक समाप्त ॥ ११ ॥
द्वादश अनुवाक
शं नो मित्रः शं वरुणः। शं नो भवत्यर्यमा। शं न इन्द्रो बृहस्पतिः। शं नो विष्णुरुरुक्रमः*। नमो ब्रह्मणे। नमस्ते वायो। त्वमेव प्रत्यक्षं ब्रह्मासि। त्वामेव प्रत्यक्षं ब्रह्मावादिषम्। ऋतमवादिषम्। सत्यमवादिषम्। तन्मामावीत्। तद्वक्तारमावीत्। आवीन्माम्। आवीद्वक्तारम्।
ॐ शान्तिः! शान्तिः!! शान्तिः!!!
नः=हमारे लिये; मित्रः=(दिन और प्राणके अधिष्ठाता) मित्रदेवता; शम् [ भवतु ]=कल्याणप्रद हों; (तथा) वरुणः=(रात्रि और अपानके अधिष्ठाता) वरुण भी; शम् [ भवतु ]=कल्याणप्रद हों; अर्यमा=(चक्षु और सूर्यमण्डलके अधिष्ठाता) अर्यमा; नः=हमारे लिये; शम् भवतु=कल्याणमय हों; इन्द्रः=(बल
- यह मन्त्र ऋग्वेद मण्डल १ सूक्त ९० का नवौ है तथा यजु० ३६। ९ है।