ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 371, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ेंअनु० १२]
तैत्तिरीयोपनिषद्
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और भुजाओंके अधिष्ठाता) इन्द्र; (तथा) बृहस्पतिः=(वाणी और बुद्धिके अधिष्ठाता) बृहस्पति; नः=हमारे लिये; शम् [ भवतु ]=शान्ति प्रदान करनेवाले हों; उरुक्रमः=त्रिविक्रमरूपसे विशाल डगोंवाले; विष्णुः=विष्णु (जो पैरोंके अधिष्ठाता हैं); नः=हमारे लिये; शम् [ भवतु ]=कल्याणमय हों; ब्रह्मणे=(उपर्युक्त सभी देवताओंके आत्मस्वरूप) ब्रह्माके लिये; नमः=नमस्कार है; वायो=हे वायुदेव!; ते=तुम्हारे लिये; नमः=नमस्कार है; त्वम्=तुम; एव=ही; प्रत्यक्षम्=प्रत्यक्ष (प्राणरूपसे प्रतीत होनेवाले); ब्रह्म अस्मि=ब्रह्म हो (इसलिये मैंने); त्वाम्=तुझको; एव=ही; प्रत्यक्षम्=प्रत्यक्ष; ब्रह्म=ब्रह्म; अवादिषम्=कहा है; ऋतम्=(तुम ऋतके अधिष्ठाता हो, इसलिये मैंने तुम्हें) ऋत नामसे; अवादिषम्=पुकारा है; सत्यम्=(तुम सत्यके अधिष्ठाता हो, अतः मैंने तुम्हें) सत्य नामसे; अवादिषम्=कहा है; तत्=उस (सर्वशक्तिमान् परमेश्वरने); माम् आवीत्=मेरी रक्षा की है; तत्=उसने; वक्तारम् आवीत्=वक्ताकी—आचार्यकी रक्षा की है; आवीत् माम्=रक्षा की है मेरी; (और) आवीत् वक्तारम्=रक्षा की है मेरे आचार्यकी; ॐ शान्तिः=भगवान् शान्तिस्वरूप हैं; शान्तिः=शान्तिस्वरूप हैं; शान्तिः=शान्तिस्वरूप हैं।
व्याख्या —शीशावल्लीके इस अन्तिम अनुवाकमें भिन्न-भिन्न शक्तियोंके अधिष्ठाता परब्रह्म परमेश्वरसे भिन्न-भिन्न नाम और रूपोंमें उनकी स्तुति करते हुए प्रार्थनापूर्वक कृतज्ञता प्रकट की गयी है। भाव यह है कि समस्त आधिदैविक, आध्यात्मिक और आधिभौतिक शक्तियोंके रूपमें तथा उनके अधिष्ठाता मित्र, वरुण आदि देवताओंके रूपमें जो सबके आत्मा अन्तर्यामी परमेश्वर हैं, वे सब प्रकारसे हमारे लिये कल्याणमय हों—हमारी उन्नतिके मार्गमें किसी प्रकारका विघ्न न आने दें। हम सबके अन्तर्यामी ब्रह्मको नमस्कार करते हैं।
इस प्रकार परमात्मासे शान्तिकी प्रार्थना करके सूत्रात्मा प्राणके रूपमें समस्त प्राणियोंमें व्याप्त परमेश्वरकी वायुके नामसे स्तुति करते हैं—‘हे सर्वशक्तिमान्, सबके प्राणस्वरूप वायुमय परमेश्वर! आपको नमस्कार है। आप