ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 369, कुल 548 में से
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तैत्तिरीयोपनिषद्
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और आचरणके क्षेत्रमें; तथा=वैसे ही; वर्तैथाः=तुमको भी बर्ताव करना चाहिये; अथ=तथा यदि; अभ्याख्यातेषु=किसी दोषसे लाञ्छित मनुष्योंके साथ बर्ताव करनेमें (संदेह उत्पन्न हो जाय, तो भी); ये=जो; तत्र=वहाँ; सम्मर्शिनः=उत्तम विचारवाले; युक्ताः=परामर्श देनेमें कुशल; आयुक्ताः=सब प्रकारसे यथायोग्य सत्कर्म और सदाचारमें भलीभाँति लगे हुए; अलूक्षाः=रूखेपनसे रहित; धर्मकामाः=धर्मके अभिलाषी; ब्राह्मणाः=(विद्वान्) ब्राह्मण; स्युः=हों; ते=वे; यथा=जिस प्रकार; तेषु=उनके साथ; वर्तैरन्=बर्ताव करें; तेषु=उनके साथ; तथा=वैसा ही; वर्तैथाः=तुमको भी बर्ताव करना चाहिये; एषः आदेशः=यह शास्त्रकी आज्ञा है; एषः उपदेशः=यही (गुरुजनोंका अपने शिष्यों और पुत्रोंके लिये) उपदेश है; एषा=यही; वेदोपनिषत्=वेदोंका रहस्य है; च=और; एतत्=यही; अनुशासनम्=परम्परागत शिक्षा है; एवम्=इसी प्रकार; उपासितव्यम्=तुमको अनुष्ठान करना चाहिये; एवम् उ=इसी प्रकार; एतत्=यह; उपास्यम्=अनुष्ठान करना चाहिये।
व्याख्या—'यह सब करते हुए भी यदि तुमको किसी अवसरपर अपना कर्तव्य निश्चित करनेमें दुविधा उत्पन्न हो जाय, अपनी बुद्धिसे किसी एक निश्चयपर पहुँचना कठिन हो जाय—तुम किंकर्तव्यविमूढ़ हो जाओ तो ऐसी स्थितिमें वहाँ जो कोई उत्तम विचार रखनेवाले, उचित परामर्श देनेमें कुशल, सत्कर्म और सदाचारमें तत्परतापूर्वक लगे हुए, सबके साथ प्रेमपूर्वक व्यवहार करनेवाले तथा एकमात्र धर्मपालनकी ही इच्छा रखनेवाले विद्वान् ब्राह्मण (या अन्य कोई ऐसे ही महापुरुष) हों—वे जिस प्रकार ऐसे प्रसङ्गोंपर आचरण करते हों, उसी प्रकारका आचरण तुम्हें भी करना चाहिये। ऐसे स्थलोंमें उन्हींके सत्परामर्शके अनुसार उन्हींके स्थापित आदर्शका अनुगमन करना चाहिये। इसके अतिरिक्त जो मनुष्य किसी दोषके कारण लाञ्छित हो गया हो, उसके साथ किस समय कैसा व्यवहार करना चाहिये—इस विषयमें भी यदि तुमको दुविधा प्राप्त हो जाय—तुम अपनी बुद्धिसे निर्णय न कर सको तो वहाँ भी जो विचारशील, परामर्श देनेमें कुशल, सत्कर्म और सदाचारमें पूर्णतया संलग्न तथा