ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 368, कुल 548 में से
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ईशादि नौ उपनिषद्
[ वल्ली १ ]
मार्नू तो यह अपराध है। इसे सब प्राणियोंके हृदयमें स्थित भगवान्की सेवामें ही लगाना मेरा कर्तव्य है। मैं जो कुछ दे रहा हूँ, वह भी बहुत कम है। यों सोचकर संकोचका अनुभव करते हुए देना चाहिये। मनमें दानीपनके अभिमानको नहीं आने देना चाहिये। सर्वत्र और सबमें भगवान् हैं, अतः दान लेनेवाले भी भगवान् ही हैं। उनकी बड़ी कृपा है कि मेरा दिया हुआ स्वीकार कर रहे हैं। यों विचारकर भगवान्से भय मानते हुए दान देना चाहिये। 'हम किसीका उपकार कर रहे हैं' ऐसी भावना मनमें लाकर अभिमान या अविनय नहीं प्रकट करना चाहिये। परंतु जो कुछ दिया जाय—वह विवेकपूर्वक, उसके परिणामको समझकर निष्कामभावसे कर्तव्य समझकर देना चाहिये (गीता १७।२०)। इस प्रकार दिया हुआ दान ही भगवान्की प्रीतिका—कल्याणका साधन हो सकता है। वही अक्षय फलका देनेवाला है।
अथ यदि ते कर्मविचिकित्सा वा वृत्तविचिकित्सा वा स्यात्। ये तत्र ब्राह्मणाः सम्मर्शिनः। युक्ता आयुक्ताः। अलूक्षा धर्मकामाः स्युः। यथा ते तत्र वर्तैरन्। तथा तत्र वर्तैश्वाः। अथाभ्याख्यातेषु। ये तत्र ब्राह्मणाः सम्मर्शिनः। युक्ता आयुक्ताः। अलूक्षा धर्मकामाः स्युः। यथा ते तेषु वर्तैरन्। तथा तेषु वर्तैश्वाः। एष आदेशः। एष उपदेशः। एषा वेदोपनिषत्। एतदनुशासनम्। एवमुपासितव्यम्। एवमु चैतदुपास्यम्।
अथ=इसके बाद; यदि=यदि; ते=तुमको; कर्मविचिकित्सा=कर्तव्यके निर्णय करनेमें किसी प्रकारकी शङ्का हो; वा=या; वृत्तविचिकित्सा=सदाचारके विषयमें कोई शङ्का; वा=कदाचित्; स्यात्=हो जाय तो; तत्र=वहाँ; ये=जो; सम्मर्शिनः=उत्तम विचारवाले; युक्ताः=परामर्श देनेमें कुशल; आयुक्ताः=कर्म और सदाचारमें पूर्णतया लगे हुए; अलूक्षाः=स्निग्ध स्वभाववाले; (तथा) धर्मकामाः=एकमात्र धर्मके ही अभिलाषी; ब्राह्मणाः=ब्राह्मण; स्युः=हों; ते=वे; यथा=जिस प्रकार; तत्र=उस कर्म और आचरणके क्षेत्रमें; वर्तैरन्=बर्ताव करते हों; तत्र=उस कर्म