ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 367, कुल 548 में से
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तैत्तिरीयोपनिषद्
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आचरण है; तानि=उनका ही; त्वया=तुमको; उपास्यानि=सेवन करना चाहिये; इतराणि=दूसरोंका; नो=कभी नहीं; ये के च=जो कोई भी; असम्त्=हमसे; श्रेयांसः=श्रेष्ठ (गुरुजन एवं); ब्राह्मणाः=ब्राह्मण आर्ये; तेषाम्=उनको; त्वया=तुम्हें; आसनेन=आसन-दान आदिके द्वारा सेवा करके; प्रशंसितव्यम्=विश्राम देना चाहिये; श्रद्धया देयम्=श्रद्धापूर्वक दान देना चाहिये; अश्रद्धया=बिना श्रद्धाके; अदेयम्=नहीं देना चाहिये; श्रिया देयम्=आर्थिक स्थितिके अनुसार देना चाहिये; ह्रिया देयम्=लज्जासे देना चाहिये; भिया देयम्=भयसे भी देना चाहिये (और); संविदा देयम्=(जो कुछ भी दिया जाय, वह सब) विवेकपूर्वक देना चाहिये।
व्याख्या— पुत्र! तुम मातामें देवबुद्धि रखना, पितामें भी देवबुद्धि रखना, आचार्यमें देवबुद्धि रखना तथा अतिथिमें भी देवबुद्धि रखना। आशय यह कि इन चारोंको ईश्वरकी प्रतिमूर्ति समझकर श्रद्धा और भक्तिपूर्वक सदा इनकी आज्ञाका पालन, नमस्कार और सेवा करते रहना; इन्हें सदा अपने विनयपूर्ण व्यवहारसे प्रसन्न रखना। जगत्में जो-जो निर्दीष कर्म हैं, उन्हींका तुम्हें सेवन करना चाहिये। उनसे भिन्न जो दोषयुक्त—निषिद्ध कर्म हैं, उनका कभी भूलकर—स्वप्नमें भी आचरण नहीं करना चाहिये। हमारे—अपने गुरुजनोंके आचार-व्यवहारमें भी जो उत्तम—शास्त्र एवं शिष्ट पुरुषोंद्वारा अनुमोदित आचरण हैं, जिनके विषयमें किसी प्रकारकी शङ्काको स्थान नहीं है, उन्हींका तुम्हें अनुकरण करना चाहिये, उन्हींका सेवन करना चाहिये। जिनके विषयमें जरा-सी भी शङ्का हो, उनका अनुकरण कभी नहीं करना चाहिये। जो कोई भी हमसे श्रेष्ठ—वय, विद्या, तप, आचरण आदिमें बड़े तथा ब्राह्मण आदि पूज्य पुरुष घरपर पधारें, उनको पाद्य, अर्घ्य, आसन आदि प्रदान करके सब प्रकारसे उनका सम्मान तथा यथायोग्य सेवा करनी चाहिये। अपनी शक्तिके अनुसार दान करनेके लिये तुम्हें सदा उदारतापूर्वक तत्पर रहना चाहिये। जो कुछ भी दिया जाय, वह श्रद्धापूर्वक देना चाहिये। अश्रद्धापूर्वक नहीं देना चाहिये; क्योंकि बिना श्रद्धाके किये हुए दान आदि कर्म असत् माने गये हैं (गीता १७। २७)। लज्जापूर्वक देना चाहिये अर्थात् सारा धन भगवान्का है, मैं यदि इसे अपना