ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 378, कुल 548 में से
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ईशादि नौ उपनिषद्
[ वल्ली २ ]
हो जाते हैं। जो साधक इस अत्रकी ब्रह्मरूपमें उपासना करते हैं अर्थात् 'यह अत्र ही सर्वश्रेष्ठ है, सबसे बड़ा है' यह समझकर इसकी उपासना करते हैं, वे समस्त अत्रको प्राप्त कर लेते हैं। उन्हें यथेष्ट अत्र प्राप्त हो जाता है, अत्रका अभाव नहीं रहता। यह सर्वथा सत्य है कि यह अत्र ही सब भूतोंमें श्रेष्ठ है, इसलिये यह सर्वोपधमय कहलाता है। सब प्राणी अत्रसे उत्पन्न होते हैं और उत्पन्न होनेके बाद अत्रसे ही बढ़ते हैं—उनके अङ्गोंकी पुष्टि भी अत्रसे ही होती है। सब प्राणी इसको खाते हैं तथा यह भी सब प्राणियोंको खा जाता—अपनेमें विलीन कर लेता है, इसीलिये 'अद्यते, अति च इति अत्रम्' इस व्युत्पत्तिके अनुसार इसका नाम अत्र है।
तस्माद्वा एतस्मादन्नरसमयादन्योऽन्तर आत्मा प्राणमयः। तेनैष पूर्णः। स वा एष पुरुषविध एव। तस्य पुरुषविधतामन्वयं पुरुषविधः। तस्य प्राण एव शिरः। व्यानो दक्षिणः पक्षः। अपान उत्तरः पक्षः। आकाश आत्मा। पृथिवी पुच्छं प्रतिष्ठा। तदप्येष श्लोको भवति।
वै=निश्चय ही; तस्मात्=उस; एतस्मात्=इस; अन्नरसमयात्=अन्नरसमय मनुष्यशरीरसे; अन्यः=भिन्न; अन्तरः=उसके भीतर रहनेवाला; प्राणमयः आत्मा=प्राणमय पुरुष है; तेन=उससे; एषः=यह (अन्नरसमय पुरुष); पूर्णः=व्याप्त है; सः=वह; एषः=यह प्राणमय आत्मा; वै=निश्चय ही; पुरुषविधः एव=पुरुषके आकारका ही है; तस्य=उस (अन्नरसमय) आत्माकी; पुरुषविधताम्=पुरुषतुल्य आकृतिमें; अनु=अनुगत (व्याप्त) होनेसे ही; अयम्=यह; पुरुषविधः=पुरुषके आकारका है; तस्य=उस (प्राणमय आत्मा) का; प्राणः=प्राण; एव=ही; शिरः=(मानो) सिर है; व्यानः=व्यान; दक्षिणः=दाहिना; पक्षः=पंख है; अपानः=अपान; उत्तरः=बार्या; पक्षः=पंख है; आकाशः=आकाश; आत्मा=शरीरका मध्यभाग है; (और) पृथिवी=पृथ्वी; पुच्छम्=पूँछ; (एवम्) प्रतिष्ठा=आधार है; तत्=उस प्राण (की महिमा)के विषयमें; अपि=भी; एषः=यह आगे बताया जानेवाला; श्लोकः भवति=श्लोक है।