ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 377, कुल 548 में से
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तैत्तिरीयोपनिषद्
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हैं; अथो=फिर; अत्रेन एव=अत्रसे ही; जीवन्ति=जीते हैं; अथ=फिर; अन्ततः=अन्तमें; एनत् अपि=इस अत्रमें ही; यन्ति=विलीन हो जाते हैं; अत्रम्=(अतः) अत्र; हि=ही; भूतानाम्=सब भूतोंमें; ज्येष्ठम्=श्रेष्ठ है; तस्मात्=इसलिये (यह); सर्वोषधम्=सर्वोषधरूप; उच्यते=कहलाता है; ये=जो साधक; अत्रम् ब्रह्म=अत्रकी ब्रह्मभावसे; उपासते=उपासना करते हैं; ते वै=वे अवश्य ही; सर्वम्=समस्त; अत्रम्=अत्रको; आनुवन्ति=प्राप्त कर लेते हैं; हि=क्योंकि; अत्रम्=अत्र ही; भूतानाम्=भूतोंमें; ज्येष्ठम्=श्रेष्ठ है; तस्मात्=इसलिये; सर्वोषधम्=(यह) सर्वोषध नामसे; उच्यते=कहा जाता है; अत्रात्=अत्रसे ही; भूतानि=सब प्राणी; जायन्ते=उत्पन्न होते हैं; जातानि=उत्पन्न होकर; अत्रेन=अत्रसे ही; वर्धन्ते=बढ़ते हैं; तत्=वह; अद्यते=(प्राणियोंद्वारा) खाया जाता है; च=तथा; भूतानि=(स्वयं भी) प्राणियोंको; अन्ति=खाता है; तस्मात्=इसलिये; अत्रम्='अत्र'; इति=इस नामसे; उच्यते=कहा जाता है।
व्याख्या —इस मन्त्रमें अत्रकी महिमाका वर्णन किया गया है। भाव यह है कि इस पृथ्वीलोकमें निवास करनेवाले जितने भी प्राणी हैं, वे सब अत्रसे ही उत्पन्न हुए हैं—अत्रके परिणामरूप रज और वीर्यसे ही उनके शरीर बने हैं, उत्पन्न होनेके बाद अत्रसे ही उनका पालन-पोषण होता है, अतः अत्रसे ही वे जीते हैं। फिर अन्तमें इस अत्रमें ही—अत्र उत्पन्न करनेवाली पृथ्वीमें ही विलीन हो जाते हैं। तात्पर्य यह कि समस्त प्राणियोंके जन्म, जीवन और मरण स्थूलशरीरके सम्बन्धसे ही होते हैं; और स्थूलशरीर अत्रसे ही उत्पन्न होते हैं, अत्रसे ही जीते हैं तथा अत्रके उद्गमस्थान पृथ्वीमें ही विलीन हो जाते हैं। उन शरीरोंमें रहनेवाले जो जीवात्मा हैं, वे अत्रमें विलीन नहीं होते; वे तो मृत्युकालमें प्राणोंके साथ इस शरीरसे निकलकर दूसरे शरीरोंमें चले जाते हैं।
इस प्रकार यह अत्र समस्त प्राणियोंकी उत्पत्ति आदिका कारण है, इसीपर सब कुछ निर्भर करता है; इसलिये यही सबसे श्रेष्ठ है और इसीलिये यह सर्वोषधरूप कहलाता है; क्योंकि इसीसे प्राणियोंका शुधाजन्य संताप दूर होता है। सारे संतापोंका मूल शुधा है, इसलिये उसके शान्त होनेपर सारे संताप दूर