ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 373, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ेंॐ
ब्रह्मानन्दवल्ली
शान्तिपाठ
ॐ सह नाववतु। सह नौ भुनक्तु। सह वीर्यं करवावहै। तेजस्वि नावधीतमस्तु। मा विद्विषावहै।
ॐ शान्तिः! शान्तिः!! शान्तिः!!!
ॐ=पूर्णब्रह्म परमात्मन्!; (आप) नौ=हम दोनों (गुरु-शिष्य) की; सह=साथ-साथ; अवतु=रक्षा करें; नौ=हम दोनोंका; सह=साथ-साथ; भुनक्तु=पालन करें; सह=(हम दोनों) साथ-साथ ही; वीर्यम्=शक्ति; करवावहै=प्राप्त करें; नौ=हम दोनोंकी; अधीतम्=पढ़ी हुई विद्या; तेजस्वि=तेजोमयी; अस्तु=हो; मा विद्विषावहै=हम दोनों परस्पर द्वेष न करें।
व्याख्या —हे परमात्मन्! आप हम गुरु-शिष्य दोनोंकी साथ-साथ सब प्रकारसे रक्षा करें, हम दोनोंका आप साथ-साथ समुचितरूपसे पालन-पोषण करें, हम दोनों साथ-ही-साथ सब प्रकारसे बल प्राप्त करें, हम दोनोंकी अध्ययन की हुई विद्या तेजपूर्ण हो— कहीं किसीसे हम विद्यामें परास्त न हों और हम दोनों जीवनभर परस्पर स्नेह-सूत्रसे बँधे रहें; हमारे अंदर परस्पर कभी द्वेष न हो। हे परमात्मन्! तीनों तापोंकी निवृत्ति हो।
प्रथम अनुवाक
ब्रह्मविदाज्जोति परम्। तदेषाभ्युक्ता।
ब्रह्मवित्-ब्रह्मज्ञानी; परम्=परब्रह्मको; आज्जोति=प्राप्त कर लेता है; तत्=उसी भावको व्यक्त करनेवाली; एषा=यह (श्रुति); अभ्युक्ता=कही गयी है।
व्याख्या —ब्रह्मज्ञानी महात्मा परब्रह्मको प्राप्त हो जाता है, इसी बातको बतानेके लिये आगे आनेवाली श्रुति कही गयी है।