भारतकोश
ईशादि नौ उपनिषद्

ईशादि नौ उपनिषद्

Ishadi Nau Upanishad

ऋषिगण द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

पृष्ठ 374, कुल 548 में से

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ईशादि नौ उपनिषद्

[ वल्ली २ ]

सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म। यो वेद निहितं गृह्यायां परमे व्योमन्। सोऽश्रुते सर्वान् कामान् सह ब्रह्मणा विपश्चितेति।

ब्रह्म=ब्रह्म; सत्यम्=सत्य; ज्ञानम्=ज्ञानस्वरूप; (और) अनन्तम्=अनन्त है; यः=जो मनुष्य; परमे व्योमन्=परम विशुद्ध आकाशमें (रहते हुए भी); गृह्यायाम्=प्राणियोंके हृदयरूप गुफामें; निहितम्=छिपे हुए (उस ब्रह्मको); वेद=जानता है; सः=वह; विपश्चिता=(उस) विज्ञानस्वरूप; ब्रह्मणा सह=ब्रह्मके साथ; सर्वान्=समस्त; कामान् अश्रुते=भोगोंका अनुभव करता है; इति=इस प्रकार (यह ऋचा है)।

व्याख्या —इस मन्त्रमें परब्रह्म परमात्माके स्वरूपबोधक लक्षण बताकर उनकी प्राप्तिके स्थानका वर्णन करते हुए उनकी प्राप्तिका फल बताया गया है। भाव यह है कि वे परब्रह्म परमात्मा सत्यस्वरूप हैं। 'सत्य' शब्द यहाँ नित्य सत्ताका बोधक है। अर्थात् वे परब्रह्म नित्य सत् हैं; किसी भी कालमें उनका अभाव नहीं होता तथा वे ज्ञानस्वरूप हैं, उनमें अज्ञानका लेश भी नहीं है और वे अनन्त हैं अर्थात् देश और कालकी सीमासे अतीत—सीमारहित हैं। वे ब्रह्म परम विशुद्ध आकाशमें रहते हुए भी सबके हृदयकी गुफामें छिपे हुए हैं। उन परब्रह्म परमात्माको जो साधक तत्त्वसे जान लेता है, वह सबको भलीभाँति जाननेवाले उन ब्रह्मके साथ रहता हुआ सब प्रकारके भोगोंको अलौकिक ढंगसे अनुभव करता है।*

  • इस कथनके रहस्यको समझ लेनेपर ईशावास्यापनिषद्के प्रथम मन्त्रमें साधकके लिये दिये हुए उपदेशका भी स्पष्ट हो जाता है। वहाँ कहा है कि इस ब्रह्माण्डमें जो कुछ भी जड़-चेतनरूप जगत् है, वह ईश्वरसे परिपूर्ण है, उस ईश्वरको अपने साथ रखते हुए अर्थात् निरन्तर याद रखते हुए ही त्यागपूर्वक आवश्यक विषयोंका सेवन करना चाहिये। जो उपदेश वहाँ साधकके लिये दिया गया है, वही बात यहाँ सिद्ध महात्माकी स्थिति बतानेके लिये कही गयी है। 'वह ब्रह्मके साथ सब भोगोंका अनुभव करता है' इस कथनका अभिप्राय यही है कि वह परमात्माको प्राप्त सिद्ध पुरुष इन्द्रियोंद्वारा बाह्य विषयोंका सेवन करते हुए भी स्वयं सदा परमात्मामें ही स्थित रहता है। उसके मन, बुद्धि और इन्द्रियोंके व्यवहार, उनके द्वारा होनेवाली सभी चेष्टाएँ परमात्मामें स्थित रहते हुए ही होती हैं। लोगोंके देखनेमें आवश्यकतानुसार यथायोग्य विषयोंका इन्द्रियोंद्वारा उपभोग करते समय भी वह परमात्मासे कभी एक क्षणके लिये
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