ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 375, कुल 548 में से
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तैत्तिरीयोपनिषद्
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सम्बन्ध— वे परब्रह्म परमात्मा किस प्रकार कैसी गुफामें छिपे हुए हैं, उन्हें कैसे जानना चाहिये—इस जिज्ञासापर आगेका प्रकरण आरम्भ किया जाता है—
तस्माद्वा एतस्मादात्मन आकाशः सम्भूतः। आकाशाद्वायुः। वायोरग्निः। अग्निरापः। अदभ्यः पृथिवी। पृथिव्या ओषधयः। ओषधीभ्योऽन्नम्। अन्नान्तरुषः। स वा एष पुरुषोऽन्नरसमयः। तस्येदमेव शिरः। अयं दक्षिणः पक्षः। अयमुत्तरः पक्षः। अयमात्मा। इदं पुच्छं प्रतिष्ठा। तदप्येष श्लोको भवति।
वै=निश्चय ही; तस्मात्=(सर्वत्र प्रसिद्ध) उस; एतस्मात्=इस; आत्मनः=परमात्मासे; (पहले-पहल) आकाशः=आकाशतत्त्व; सम्भूतः=उत्पन्न हुआ; आकाशात्=आकाशसे; वायुः=वायु; वायोः=वायुसे; अग्निः=अग्नि; अग्नेः=अग्निसे; आपः=जल; (और) अदभ्यः=जलतत्त्वसे; पृथिवी=पृथ्वीतत्त्व उत्पन्न हुआ; पृथिव्याः=पृथ्वीसे; ओषधयः=समस्त ओषधियाँ उत्पन्न हुई; ओषधीभ्यः=ओषधियोंसे; अन्नम्=अन्न उत्पन्न हुआ; अन्नान्तरुषः=अन्नसे ही; पुरुषः=(यह) मनुष्य-शरीर उत्पन्न हुआ; सः=वह; एषः=यह; पुरुषः=मनुष्य-शरीर; वै=निश्चय ही; अन्नरसमयः=अन्नरसमय है; तस्य=उसका; इदम्=यह (प्रत्यक्ष दीखनेवाला सिर); एव=ही; शिरः=(पक्षीकी कल्पनामें) सिर है; अयम्=यह (दाहिनी भुजा) ही; दक्षिणः पक्षः=दाहिना पंख है; अयम्=यह (बायीं भुजा) ही; उत्तरः पक्षः=बायीं पंख है; अयम्=यह (शरीरका मध्यभाग) ही; आत्मा=पक्षीके अङ्गोंका मध्य भाग है;* इदम्=यह (दोनों पैर ही); पुच्छम् प्रतिष्ठा=पूँछ एवं प्रतिष्ठा है; तत् अपि=उसीके विषयमें; एषः=यह (आगे कहा जानेवाला); श्लोकः=श्लोक; भवति=है।
भी अलग नहीं होता (गीता ६।३१)। अतः सदा सभी कर्मोंसे निर्लप रहता है। यही भाव दिखानेके लिये 'विपक्षिता ब्रह्मणा सह सर्वान् कामान् अशनुते' कहा गया है। इस प्रकार यह श्रुति परब्रह्मके स्वरूप तथा उसके ज्ञानकी महिमाको बतानेवाली है।
*'मध्यं ह्येषामङ्गनामात्मा' इस श्रुतिके अनुसार शरीरका मध्यभाग सब अङ्गोंका आत्मा है।