भारतकोश
ईशादि नौ उपनिषद्

ईशादि नौ उपनिषद्

Ishadi Nau Upanishad

ऋषिगण द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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ईशादि नौ उपनिषद्

[ वल्ली १ ]

स्त्रीसहवास; च=और; स्वाध्यायप्रवचने च=वेदोंका पढ़ना-पढ़ाना भी (साथ-साथ करना चाहिये); प्रजाति:=कुटुम्बवृद्धिका कर्म; च=और; स्वाध्यायप्रवचने च=शास्त्रका पढ़ना-पढ़ाना भी (साथ-साथ करना चाहिये;); सत्यम्=सत्य ही इनमें श्रेष्ठ है; इति=यों; राथीतरः=राथीतरका पुत्र; सत्यवचाः=सत्यवचा ऋषि कहते हैं; तपः=तप ही सर्वश्रेष्ठ है; इति=यों; पौरुशिष्ठिः=पुरुषिष्ठका पुत्र; तपोनित्यः=तपोनित्य नामक ऋषि कहते हैं; स्वाध्यायप्रवचने एव=वेदका पढ़ना-पढ़ाना ही सर्वश्रेष्ठ है; इति=यों; मौद्रल्यः=मुद्रगलके पुत्र; नाकः='नाक' मुनि कहते हैं; हि=क्योंकि; तत्=वही; तपः=तप है; तत् हि=वही; तपः=तप है।

व्याख्या —इस अनुवाकमें यह बात समझायी गयी है कि अध्ययन और अध्यापन करनेवालोंको अध्ययन-अध्यापनके साथ-साथ शास्त्रोंमें बताये हुए मार्गपर स्वयं चलना भी चाहिये। यही बात उपदेशक और उपदेश सुननेवालोंके विषयमें भी समझनी चाहिये। अभिप्राय यह है कि अध्ययन और अध्यापन दोनों बहुत ही उपयोगी हैं, शास्त्रोंके अध्ययनसे ही मनुष्यको अपने कर्तव्यका तथा उसकी विधि और फलका ज्ञान होता है; अतः इसे करते हुए ही उसके साथ-साथ यथायोग्य सदाचारका पालन, सत्यभाषण, स्वधर्म पालनके लिये बड़े-से-बड़ा कष्ट सहना, इन्द्रियोंको वशमें रखना, मनको वशमें रखना, अग्निहोत्रके लिये अग्निको प्रदीप्त करना, फिर उसमें हवन करना, अतिथिको यथायोग्य सेवा करना, सबके साथ सुन्दर मनुष्योचित लौकिक व्यवहार करना, शास्त्रविधिके अनुसार गर्भाधान करना और ऋतुकालमें नियमितरूपसे स्त्री-सहवास करना तथा कुटुम्बको बढ़ानेका उपाय करना—इस प्रकार इन सभी श्रेष्ठ कर्मोंका अनुष्ठान करते रहना चाहिये। अध्यापक तथा उपदेशकके लिये तो इन सब कर्तव्योंका समुचित पालन और भी आवश्यक है; क्योंकि उनके आदर्शका अनुकरण उनके छात्र तथा श्रोता ग्रहण करते हैं। रथीतरके पुत्र सत्यवचा नामक ऋषिका कहना है कि 'इन सब कर्मोंमें सत्य ही सर्वश्रेष्ठ है; क्योंकि प्रत्येक कर्म सत्यभाषण और सत्यभावपूर्वक किये जानेपर ही यथार्थरूपसे सम्पन्न होता है।' पुरुषिष्ठपुत्र तपोनित्य नामक ऋषिका कहना है कि 'तपश्चर्या ही सर्वश्रेष्ठ