ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 363, कुल 548 में से
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तैत्तिरीयोपनिषद्
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है; क्योंकि तपसे ही सत्यभाषण आदि समस्त धर्मोंके पालन करनेकी और उनमें दृढ़तापूर्वक स्थित रहनेकी शक्ति आती है।' मुदलके पुत्र नाक नामक मुनिका कहना है कि 'वेद और धर्मशास्त्रोंका पठन-पाठन ही सर्वश्रेष्ठ है; क्योंकि वही तप है, वही तप है अर्थात् इन्होंने तप आदि समस्त धर्मोंका ज्ञान होता है।' इन सभी ऋषियोंका कहना यथार्थ है। उनके कथनको उद्धृत करके यह भाव दिखाया गया है कि प्रत्येक कर्ममें इन तीनोंकी प्रधानता रहनी चाहिये। जो कुछ कर्म किया जाय, वह पठन-पाठनसे उपलब्ध शास्त्रज्ञानके अनुकूल होना चाहिये। कितने ही विघ्न क्यों न उपस्थित हों, अपने कर्तव्यपालनरूप तपमें सदा दृढ़ रहना चाहिये और प्रत्येक क्रियामें सत्यभाव और सत्यभाषणपर विशेष ध्यान देना चाहिये।
॥ नवम अनुवाक समाप्त ॥ १ ॥
दशम अनुवाक
अहं वृक्षस्य रेरिवा। कीर्तिः पृष्ठं गिरेरिव। ऊर्ध्वपवित्रो वाजिनीव स्वमृतमस्मि। द्रविणः सवर्चसम्। सुमेधा अमृतोक्षितः। इति त्रिशङ्कोर्वेदानुवचनम्।
अहम्=मैं; वृक्षस्य=संसारवृक्षका; रेरिवा=उच्छेद करनेवाला हूँ; [ मम ] कीर्तिः= मेरी कीर्ति; गिरेः=पर्वतके; पृष्ठम् इव=शिखरकी भाँति उन्नत है; वाजिनि=अज्ञोत्पादक शक्तिसे युक्त सूर्यमें; स्वमृतम् इव=जैसे उत्तम अमृत है, उसी प्रकार मैं भी; ऊर्ध्वपवित्रः अस्मि=अतिशय पवित्र अमृतस्वरूप हूँ; (तथा मैं) सवर्चसम्=प्रकाशयुक्त; द्रविणम्=धनका भण्डार हूँ; अमृतोक्षितः=(परमानन्दमय) अमृतसे अभिषिक्त (तथा); सुमेधाः=श्रेष्ठ बुद्धिवाला हूँ; इति=इस प्रकार (यह); त्रिशङ्कोः=त्रिशङ्कु ऋषिका; वेदानुवचनम्=अनुभव किया हुआ वैदिक प्रवचन है।
व्याख्या—त्रिशङ्कु नामक ऋषिने परमात्माको प्राप्त होकर जो अपना अनुभव व्यक्त किया था, उसे ही इस अनुवाकमें उद्धृत किया गया है। त्रिशङ्कुके