भारतकोश
ईशादि नौ उपनिषद्

ईशादि नौ उपनिषद्

Ishadi Nau Upanishad

ऋषिगण द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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अनु० ४ ]

तैत्तिरीयोपनिषद्

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उद्देश्यसे यह आहुति है); भग=हे भगवन्!; सः=वह (तु); मा=मुझमें; प्रविश=प्रविष्ट हो जा; स्वाहा=स्वाहा (इस उद्देश्यसे यह आहुति है); भग=हे भगवन्!; तस्मिन्=उस; सहस्त्रशरणे=हजारों शाखावाले; त्वधि=आपमें; (ध्यानद्वारा निमग्न होकर) अहम्=मैं; निमूज्जे=अपनेको विशुद्ध कर लूँ; स्वाहा=स्वाहा (इस उद्देश्यसे यह आहुति है)।

व्याख्या —चतुर्थ अनुवाकके इस अंशमें आचार्यको अपने हितके लिये जिन मन्त्रोंद्वारा हवन करना चाहिये, उनका वर्णन किया गया है। भाव यह है कि 'लोगोंमें मैं यशस्वी बन्तूँ, जगत्में मेरा यश-सौरभ सर्वत्र फैल जाय, मुझसे कोई भी ऐसा आचरण न बने, जो मेरे यशमें धब्बा लगानेवाला हो, इस उद्देश्यसे 'यशो जनेऽसानि' इस मन्त्रका उच्चारण करके 'स्वाहा' शब्दके साथ पहली आहुति डालनी चाहिये। 'महान् धनवानोंकी अपेक्षा भी मैं अधिक सम्पत्तिशाली बन जाऊँ' इस उद्देश्यसे मन्त्रोच्चारणपूर्वक 'स्वाहा' शब्दके साथ दूसरी आहुति अग्निमें डालनी चाहिये। 'हे भगवन्! आपके उस दिव्य स्वरूपमें मैं प्रविष्ट हो जाऊँ' इस उद्देश्यसे मन्त्रोच्चारणपूर्वक 'स्वाहा' शब्दके साथ तीसरी आहुति अग्निमें डालनी चाहिये। 'हे भगवन्! वह आपका दिव्य स्वरूप मुझमें प्रविष्ट हो जाय—मेरे मनमें बस जाय' इस उद्देश्यसे मन्त्रोच्चारणपूर्वक 'स्वाहा' शब्दके साथ चौथी आहुति अग्निमें डालनी चाहिये। 'हे भगवन्! हजारों शाखावाले आपके उस दिव्यरूपमें ध्यानद्वारा निमग्न होकर मैं अपने-आपको विशुद्ध बना लूँ' इस उद्देश्यसे मन्त्रोच्चारणपूर्वक 'स्वाहा' शब्दके साथ पाँचवीं आहुति अग्निमें डालनी चाहिये।

यथाऽऽपः प्रवता यन्ति यथा मासा अहर्जरम्। एवं मां ब्रह्मचारिणो धातरायन्तु सर्वतः स्वाहा। प्रतिवेशोऽसि प्र मा भाहि प्र मा पद्यस्व॥

यथा=जिस प्रकार; आपः=(नदी आदिके) जल; प्रवता=निम्नस्थानसे होकर; यन्ति=समुद्रमें चले जाते हैं; यथा=जिस प्रकार; मासाः=महीने; अहर्जरम्=दिनोंका अन्त करनेवाले संवत्सररूप कालमें; [ यन्ति ]=चले जाते हैं; धातः=हे विधाता!;