ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 346, कुल 548 में से
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ईशादि नौ उपनिषद्
[ वल्ली १ ]
(इस उद्देश्यसे यह आहुति दी जाती है); ब्रह्मचारिणः =ब्रह्मचारीलोग; विमयन्तु =कपटशून्य हों; स्वाहा =स्वाहा (इस उद्देश्यसे यह आहुति है); ब्रह्मचारिणः =ब्रह्मचारीलोग; प्रमायन्तु =प्रमाणिक ज्ञानको ग्रहण करनेवाले हों; स्वाहा =स्वाहा (इस उद्देश्यसे यह आहुति है); ब्रह्मचारिणः =ब्रह्मचारीलोग; दमायन्तु =इन्द्रियोंका दमन करनेवाले हों; स्वाहा =स्वाहा (इस उद्देश्यसे यह आहुति है); ब्रह्मचारिणः =ब्रह्मचारीलोग; शमायन्तु =मनको वशमें करनेवाले हों; स्वाहा =स्वाहा (इस उद्देश्यसे यह आहुति है)।
व्याख्या —चतुर्थ अनुवाकके इस अंशमें शिष्योंके हितार्थ आचार्यको जिन मन्त्रोंद्वारा हवन करना चाहिये, उनका वर्णन किया गया है। भाव यह है कि आचार्य 'उत्तम' ब्रह्मचारीलोग मेरे पास विद्या पढ़नेके लिये आयें, इस उद्देश्यसे मन्त्र पढ़कर 'स्वाहा' शब्दके साथ पहली आहुति दे; 'मेरे ब्रह्मचारी कपटशून्य हों' इस उद्देश्यसे मन्त्र पढ़कर 'स्वाहा' शब्दके साथ दूसरी आहुति दे; 'ब्रह्मचारीलोग उत्तम ज्ञानको ग्रहण करनेवाले हों' इस उद्देश्यसे मन्त्रोच्चारणपूर्वक 'स्वाहा' शब्दके साथ तीसरी आहुति दे; 'ब्रह्मचारीलोग इन्द्रियोंका दमन करनेवाले हों' इस उद्देश्यसे मन्त्रोच्चारणपूर्वक 'स्वाहा' शब्दके साथ चौथी आहुति दे तथा 'ब्रह्मचारीलोग मनको वशमें करनेवाले हों' इस उद्देश्यसे मन्त्रोच्चारणपूर्वक 'स्वाहा' शब्दके साथ पाँचवीं आहुति दे।
सम्बन्ध —आचार्यको अपने लौकिक और पारलौकिक हितके लिये किस प्रकार हवन करना चाहिये, इसकी विधि बतायी जाती है—
यशो जनेऽसानि स्वाहा। श्रेयान् वस्यसोऽसानि स्वाहा। तं त्वा भग प्रविशानि स्वाहा। स मा भग प्रविश स्वाहा। तस्मिन् सहस्त्रशाखे निभगाहं त्वयि मृजे स्वाहा।
जने =लोगोंमें (मैं); यशः =यशस्वी; असानि =होऊँ; स्वाहा =स्वाहा (इस उद्देश्यसे यह आहुति है); वस्यसः =महान् धनवानोंकी अपेक्षा भी; श्रेयान् =अधिक धनवान्; असानि =हो जाऊँ; स्वाहा =स्वाहा (इस उद्देश्यसे यह आहुति है); भग =हे भगवन्!; तम् त्वा =उस आपमें; प्रविशानि =मैं प्रविष्ट हो जाऊँ; स्वाहा =स्वाहा (इस