ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 345, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ेंअनु० ४ ]
तैत्तिरीयोपनिषद्
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आवहन्ती वितन्वाना कुर्वाणाचीरमात्मनः। वासाः सि मम गावश्च। अन्नपाने च सर्वदा। ततो मे श्रियमावह। लोमशां पशुभिः सह स्वाहा।
ततः=उसके बाद (अब ऐश्वर्य प्राप्त करनेकी रीति बताते हैं—हे देव!); [ या श्रीः ]=जो श्री; मम=मेरे; आत्मनः=अपने लिये; अचीरम्=तत्काल ही; वासांसि=नाना प्रकारके वस्त्र; च=और; गावः=गौएँ; च=तथा; अन्नपाने=खाने-पीनेके पदार्थ; सर्वदा=सदैव; आवहन्ती=ला देनेवाली; वितन्वाना=उनका विस्तार करनेवाली; (तथा) कुर्वाणा=उन्हें बनानेवाली है; लोमशाम्=रोएँवाले—भेड़-बकरी आदि; पशुभिः सह=पशुओंके सहित; [ ताम् ] श्रियम्=उस श्रीको; मे=मेरे लिये (तू); आवह=ले आ; स्वाहा=स्वाहा (इसी उद्देश्यसे तुझे यह आहुति समर्पित की जाती है)।
व्याख्या—चतुर्थ अनुवाकके इस उपर्युक्त अंशमें ऐश्वर्यकी कामनावाले सकाम मनुष्योंके लिये, परमेश्वरसे प्रार्थना करते हुए अग्निमें आहुति देनेकी रीति बतायी गयी है। प्रार्थनाका भाव यह है कि 'हे अग्निके अधिष्ठाता परमेश्वर! जो मेरे निजके लिये आवश्यकता होनेपर बिना विलम्ब तत्काल ही नाना प्रकारके वस्त्र, गौएँ और खाने-पीनेकी विविध सामग्री सदैव प्रस्तुत कर दे, उन्हें बढ़ाती रहे तथा उन्हें नवीनरूपसे रच दे, ऐसी श्रीको तू मेरे लिये भेड़-बकरी आदि रोएँवाले एवं अन्य प्रकारके पशुओंसहित ला दे। अर्थात् समस्त भोग-सामग्रीका साधनरूप धन मुझे प्रदान कर।' इस मन्त्रका उच्चारण करके 'स्वाहा' इस शब्दके साथ अग्निमें आहुति देनी चाहिये, यह ऐश्वर्यकी प्राप्तिका साधन है।
सम्बन्ध—आचार्यको ब्रह्मचारियोंके हितार्थ किस प्रकार हवन करना चाहिये, इसकी विधि बतायी जाती है—
आमायन्तु ब्रह्मचारिणः स्वाहा। विमायन्तु ब्रह्मचारिणः स्वाहा। प्रमायन्तु ब्रह्मचारिणः स्वाहा। दमायन्तु ब्रह्मचारिणः स्वाहा। शमायन्तु ब्रह्मचारिणः स्वाहा।
ब्रह्मचारिणः=ब्रह्मचारीलोग; मा=मेरे पास; आयन्तु=आयें; स्वाहा=स्वाहा