ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 337, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ेंअनु० ३ ]
तैत्तिरीयोपनिषद्
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आता, अतः उसे 'प्रकृतिभाव' कहते हैं। कहनेका तात्पर्य यह है कि वर्णोंके उच्चारणमें उक्त छहों नियमोंका पालन आवश्यक है।
॥ द्वितीय अनुवाक समाप्त ॥ २ ॥
तृतीय अनुवाक
सम्बन्ध— अब आचार्य अपने और शिष्यके अभ्युदयकी इच्छा प्रकट करते हुए संहिताविषयक उपासनाविधि आरम्भ करते हैं—
सह नौ यशः। सह नौ ब्रह्मवर्चसम्। अथातः संहिताया उपनिषदं व्याख्यास्यामः। पञ्चस्वधिकरणेषु। अधिलोक-मधिज्यौतिषमधिविद्यमधिप्रजमध्यात्मम्। ता महा संहिता इत्याचक्षते। अथाधिलोकम्। पृथिवी पूर्वरूपम्। द्यौ उत्तररूपम्। आकाशः संधिः। वायुः संधानम्। इत्यधिलोकम्।
नौ=हम (आचार्य और शिष्य) दोनोंका; यशः=यश; सह=एक साथ बढे (तथा); सह=एक साथ ही; नौ=हम दोनोंका; ब्रह्मवर्चसम्=ब्रह्मतेज भी बढे; अथ=इस प्रकार शुभ इच्छा प्रकट करनेके अनन्तर; अतः=यहाँसे (हम); अधिलोकम्=लोकोंके विषयमें; अधिज्यौतिषम्=ज्योतियोंके विषयमें; अधिविद्यम्=विद्याके विषयमें; अधिप्रजम्=प्रजाके विषयमें; (और) अध्यात्मम्=शरीरके विषयमें; (इस तरह) पञ्चसु=पाँच; अधिकरणेषु=स्थानोंमें; संहितायाः=संहिताके; उपनिषदम् व्याख्यास्यामः=रहस्यका वर्णन करेंगे; ताः=इन सबको; महासंहिताः=महासंहिता; इति=इस नामसे; आचक्षते=कहते हैं; अथ=उनमेंसे (यह पहली); अधिलोकम्=लोकविषयक संहिता है; पृथिवी=पृथ्वी; पूर्वरूपम्=पूर्वरूप (पूर्ववर्ण) है; द्यौः=स्वर्गलोक; उत्तररूपम्=उत्तररूप (परवर्ण) है; आकाशः=आकाश; संधिः=संधि—मेलसे बना हुआ रूप (तथा); वायुः=वायु; संधानम्=दोनोंका संयोजक है; इति=इस प्रकार (यह); अधिलोकम्=लोकविषयक संहिताकी उपासनाविधि पूरी हुई।