भारतकोश
ईशादि नौ उपनिषद्

ईशादि नौ उपनिषद्

Ishadi Nau Upanishad

ऋषिगण द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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अनु० १]

तैत्तिरीयोपनिषद्

३३१

वदिष्यामि। सत्यं वदिष्यामि। तन्नामवतु। तद्भक्तारमवतु। अवतु माम्। अवतु वक्तारम्। ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः।*

ॐ इस परमेश्वरके नामका स्मरण करके उपनिषद्का आरम्भ किया जाता है। नः=हमारे लिये; मित्रः=(दिन और प्राणके अधिष्ठाता) मित्र देवता; शम् [ भवतु ]=कल्याणप्रद हों (तथा); वरुणः=(रात्रि और अपनानेके अधिष्ठाता) वरुण (भी); शम् [ भवतु ]=कल्याणप्रद हों; अर्यमा=(चक्षु और सूर्य-मण्डलके अधिष्ठाता) अर्यमा; नः=हमारे लिये; शम् भवतु=कल्याणकारी हों; इन्द्रः=(बल और भुजाओंके अधिष्ठाता) इन्द्र (तथा); बृहस्पतिः=(वाणी और बुद्धिके अधिष्ठाता) बृहस्पति (दोनों); नः=हमारे लिये; शम् [ भवताम् ]=शान्ति प्रदान करनेवाले हों; उरुक्रमः=त्रिविक्रमरूपसे विशाल डगोंवाले; विष्णुः=विष्णु (जो पैरोके अधिष्ठाता है); नः=हमारे लिये; शम् [ भवतु ]=कल्याणकारी हों; ब्रह्मणे=(उपर्युक्त सभी देवताओंके आत्मस्वरूप) ब्रह्मके लिये; नमः=नमस्कार है; वायो=हे वायुदेव; ते=तुम्हारे लिये; नमः=नमस्कार है; त्वम् एव=तुम ही; प्रत्यक्षम्=प्रत्यक्ष (प्राणरूपसे प्रतीत होनेवाले); ब्रह्म अस्मि=ब्रह्म हो (इसलिये मैं); त्वाम् एव=तुमको ही; प्रत्यक्षम्=प्रत्यक्ष; ब्रह्म=ब्रह्म; वदिष्यामि=कहूँगा; ऋतम्=(तुम ऋतके अधिष्ठाता हो, इसलिये मैं तुम्हें) ऋत नामसे; वदिष्यामि=पुकारूँगा; सत्यम्=(तुम सत्यके अधिष्ठाता हो, अतः मैं तुम्हें) सत्य नामसे; वदिष्यामि=कहूँगा; तत्=वह (सर्वशक्तिमान् परमेश्वर); माम् अवतु=मेरी रक्षा करे; तत्=वह; वक्तारम् अवतु=वक्ताकी अर्थात् आचार्यकी रक्षा करे; अवतु माम्=रक्षा करे मेरी (और); अवतु वक्तारम्=रक्षा करे मेरे आचार्यकी; ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः=भगवान् शान्तिस्वरूप हैं, शान्तिस्वरूप हैं, शान्तिस्वरूप हैं।

व्याख्या —इस प्रथम अनुवाकमें भिन्न-भिन्न शक्तियोंके अधिष्ठाता परब्रह्म परमेश्वरकी भिन्न-भिन्न नाम और रूपोंमें स्तुति करते हुए उनसे प्रार्थना की गयी

  • यह मन्त्र ऋग्वेद १।१०।९, अथर्ववेद १९।९।६ और यजुर्वेद ३६।९ में भी आया है।