ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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ईशादि नौ उपनिषद्
[ वल्ली १ ]
है। भाव यह है कि समस्त आधिदैविक, आध्यात्मिक और आधिभौतिक शक्तियोंके रूपमें तथा उनके अधिष्ठाता मित्र, वरुण आदि देवताओंके रूपमें जो सबके आत्मा—अन्तर्यामी परमेश्वर हैं, वे सब प्रकारसे हमारे लिये कल्याणमय हों। हमारी उन्नतिके मार्गमें और अपनी प्राप्तिके मार्गमें किसी प्रकारका विघ्न न आने दें। सबके अन्तर्यामी उन ब्रह्मको हम नमस्कार करते हैं।
इस प्रकार परमात्मासे शान्तिकी प्रार्थना करके सूत्रात्मा प्राणके रूपमें समस्त प्राणियोंमें व्याप्त उन परमेश्वरकी वायुके नामसे स्तुति करते हैं—हे सर्वशक्तिमान् सबके प्राणस्वरूप वायुमय परमेश्वर! तुम्हें नमस्कार है। तुम्हीं समस्त प्राणियोंके प्राणस्वरूप प्रत्यक्ष ब्रह्म हो, अतः मैं तुम्होंको प्रत्यक्ष ब्रह्मके नामसे पुकारूँगा। मैं ‘ऋत’ नामसे भी तुम्हें पुकारूँगा; क्योंकि सारे प्राणियोंके लिये जो कल्याणकारी नियम है, उस नियमरूप ऋतके तुम्हीं अधिष्ठाता हो। तथा मैं तुम्हें ‘सत्य’ नामसे पुकारा करूँगा; क्योंकि सत्य (यथार्थ भाषण) के अधिष्ठातृ देवता तुम्हीं हो। वे सर्वव्यापी अन्तर्यामी परमेश्वर मुझे सत्-आचरण एवं सत्य-भाषण करनेकी और सत्-विद्याको ग्रहण करनेकी शक्ति प्रदान करके इस जन्म-मरणरूप संसारचक्रसे मेरी रक्षा करें तथा मेरे आचार्यको इन सबका उपदेश देकर सर्वत्र उस सत्यका प्रचार करनेकी शक्ति प्रदान करके उनकी रक्षा करें। यहाँ ‘मेरी रक्षा करें’, ‘वक्ताकी रक्षा करें’—इन वाक्योंको दुबारा कहनेका अभिप्राय शान्तिपाठकी समाप्तिको सूचित करना है।
ओम् शान्तिः, शान्तिः, शान्तिः —इस प्रकार तीन बार कहनेका भाव यह है कि आधिभौतिक, आधिदैविक और आध्यात्मिक—तीनों प्रकारके विघ्नोंका सर्वथा उपशमन हो जाय। भगवान् शान्तिस्वरूप हैं, अतः उनके स्मरणसे सब प्रकारकी शान्ति निश्चित है।
॥ प्रथम अनुवाक समाप्त ॥ १ ॥