ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 293, कुल 548 में से
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माण्डूक्योपनिषद्
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न अन्तःप्रज्ञम्=जो न भीतरकी ओर प्रज्ञावाला है; न बहिष्प्रज्ञम्=न बाहरकी ओर प्रज्ञावाला है; न उभयतःप्रज्ञम्=न दोनों ओर प्रज्ञावाला है; न प्रज्ञानघनम्=न प्रज्ञानघन है; न प्रज्ञम्=न जाननेवाला है; न अप्रज्ञम्=न नहीं जाननेवाला है; अदृष्टम्=जो देखा नहीं गया है; अव्यवहार्यम्=जो व्यवहारमें नहीं लाया जा सकता; अग्राह्यम्=जो पकड़नेमें नहीं आ सकता; अलक्षणम्=जिसका कोई लक्षण (चिह्न) नहीं है; अचिन्त्यम्=जो चिन्तन करनेमें नहीं आ सकता; अव्यपदेश्यम्=जो बतलानेमें नहीं आ सकता; एकात्मप्रत्ययसारम्=एकमात्र आत्मसत्ताकी प्रतीति ही जिसका सार (प्रमाण) है; प्रपञ्चोपशमम्=जिसमें प्रपञ्चका सर्वथा अभाव है, ऐसा; शान्तम्=सर्वथा शान्त; शिवम्=कल्याणमय; अद्वैतम्=अद्वितीय तत्त्व; चतुर्थम्=(परब्रह्म परमात्माका) चौथा पाद है; मन्यन्ते=(इस प्रकार ब्रह्मज्ञानी) मानते हैं; सः आत्मा=वह परमात्मा (है); सः विज्ञेयः=वह जाननेयोग्य (है) ॥ ७ ॥
व्याख्या —इस मन्त्रमें निर्गुण-निराकार निर्विशेष स्वरूपको पूर्णब्रह्म परमात्माका चौथा पाद बताया गया है। भाव यह है कि जिसका ज्ञान न तो बाहरकी ओर है, न भीतरकी ओर है और न दोनों ही ओर है; जो न ज्ञानस्वरूप है, न जाननेवाला है और न नहीं जाननेवाला ही है; जो न देखनेमें आ सकता है, न व्यवहारमें लाया जा सकता है, न ग्रहण करनेमें आ सकता है, न चिन्तन करनेमें, न बतलानेमें आ सकता है और न जिसका कोई लक्षण ही है, जिसमें समस्त प्रपञ्चका अभाव है, एकमात्र परमात्मसत्ताकी प्रतीति ही जिसमें सार (प्रमाण) है—ऐसा सर्वथा, शान्त, कल्याणमय, अद्वितीय तत्त्व पूर्णब्रह्मका चौथा पाद माना जाता है। इस प्रकार जिनका चार पादोंमें विभाग करके वर्णन किया गया, वे ही पूर्णब्रह्म परमात्मा हैं, उन्हींको जानना चाहिये।
इस मन्त्रमें 'चतुर्थम् मन्यते' पदके प्रयोगसे यह स्पष्ट हो जाता है कि यहाँ परब्रह्म परमात्माके चार पादोंकी कल्पना केवल उनका तत्त्व समझानेके लिये ही की गयी है; वास्तवमें अवयवरहित परमात्माके कोई भाग नहीं है। जो पूर्णब्रह्म परमात्मा स्थूल जगत्में परिपूर्ण हैं, वे ही सूक्ष्म और कारण जगत्के