भारतकोश
ईशादि नौ उपनिषद्

ईशादि नौ उपनिषद्

Ishadi Nau Upanishad

ऋषिगण द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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ईशादि नौ उपनिषद्

[ मन्त्र ६-७ ]

समस्त प्राणियोंकी उत्पत्ति और प्रलयके स्थान हैं। इसके सिवा ग्यारहवें मन्त्रमें ओंकारकी तीसरी मात्राके साथ तीसरे पादकी एकता करके उसे जाननेका फल सबको जानना और सम्पूर्ण जगत्को विलीन कर लेना बताया है; इसलिये भी 'प्राज्ञः' पदका वाच्यार्थ कारण-जगत्के अधिष्ठाता परमेश्वरको ही समझना चाहिये। वह प्राज्ञ ही पूर्णब्रह्म परमात्माका तीसरा पाद है ॥५॥

सम्बन्ध— ऊपर बतलाये हुए ब्रह्मके पाद वैश्वानर, तैजस और प्राज्ञ किसके नाम हैं? इस जिज्ञासापर कहते हैं—

एष सर्वेश्वर एष सर्वज्ञ एषोऽन्तर्याम्येष योनिः सर्वस्य प्रभावप्ययौ हि भूतानाम् ॥ ६ ॥

एषः =यह; सर्वेश्वरः =सबका ईश्वर है; एषः =यह; सर्वज्ञः =सर्वज्ञ है; एषः =यह; अन्तर्यामी =सबका अन्तर्यामी है; एषः =यह; सर्वस्य =सम्पूर्ण जगत्का; योनिः =कारण है; हि =क्योंकि; भूतानाम् =समस्त प्राणियोंका; प्रभावप्ययौ =उत्पत्ति, स्थिति और प्रलयका स्थान यही है ॥६॥

व्याख्या— जिन परमेश्वरका तीनों पादोंके रूपमें वर्णन किया गया है, वे सम्पूर्ण ईश्वरोंके भी ईश्वर हैं। ये ही सर्वज्ञ और सबके अन्तर्यामी हैं। ये ही सम्पूर्ण जगत्के कारण हैं; क्योंकि सम्पूर्ण प्राणियोंकी उत्पत्ति, स्थिति और प्रलयके स्थान ये ही हैं। प्रश्नोपनिषद्में तीनों मात्राओंसे युक्त ओंकारके द्वारा परम पुरुष परमेश्वरका ध्यान करनेकी बात कहकर उसका फल समस्त पापोंसे रहित हो अविनाशी परात्पर पुरुषोत्तमको प्राप्त कर लेना बताया गया है (५।५)। अतः पूर्ववर्णित वैश्वानर, तैजस और प्राज्ञ परमेश्वरके ही नाम हैं। अलग-अलग स्थितिमें उन्हींका वर्णन भिन्न-भिन्न नामोंसे किया गया है ॥६॥

सम्बन्ध— अब पूर्णब्रह्म परमात्माके चौथे पादका वर्णन करते हैं—

नान्तःप्रज्ञं न बहिष्प्रज्ञं नोभयतःप्रज्ञं न प्रज्ञानघनं न प्रज्ञं नाप्रज्ञम्। अदृष्टमव्यवहार्यमग्राह्यमलक्षणमचिन्त्यमव्यपदेश्यमेकात्मप्रत्ययसारं प्रपञ्चोपशमं शान्तं शिवमद्वैतं चतुर्थं मन्यन्ते स आत्मा स विज्ञेयः ॥ ७ ॥