ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 380, कुल 548 में से
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ईशादि नौ उपनिषद्
[ वल्ली २ ]
ये=जो-जो; देवाः=देवता; मनुष्याः=मनुष्य; च=और; पशवः=पशु आदि प्राणी हैं; [ ते ]=वे; प्राणम् अनु=प्राणका अनुसरण करके ही; प्राणन्ति=चेष्टा करते अर्थात् जीवित रहते हैं; हि=क्योंकि; प्राणः=प्राण ही; भूतानाम्=प्राणियोंकी; आयुः=आयु है; तस्मात्=इसलिये; (यह प्राण) सर्वायुषम्=सबका आयु; उच्यते=कहलाता है; प्राणः=प्राण; हि=ही; भूतानाम्=प्राणियोंकी; आयुः=आयु—जीवन है; तस्मात्=इसलिये; (वह) सर्वायुषम्=सबका आयु; उच्यते=कहलाता है; इति=यह समझकर; ये=जो कोई; प्राणम्=प्राणस्वरूप; ब्रह्म=ब्रह्मकी; उपासते=उपासना करते हैं; ते=वे; सर्वम् एव=निस्संदेह समस्त; आयुः=आयुको; यन्ति=प्राप्त कर लेते हैं; तस्य=उसका; एषः एव=यही; शरीरः=शरीरमें रहनेवाला; आत्मा=अन्तरात्मा है; यः=जो; पूर्वस्य=पहलेवालेका अर्थात् अत्ररसमय शरीरका अन्तरात्मा है।
व्याख्या —तृतीय अनुवाकके इस पहले अंशमें प्राणकी महिमाका वर्णन करनेवाली श्रुतिका उल्लेख करके फिर इस प्राणमय शरीरके अन्तर्यामी परमेश्वरको लक्ष्य कराया गया है। भाव यह है कि जितने भी देवता, मनुष्य, पशु आदि शरीरधारी प्राणी हैं, वे सब प्राणके सहारे ही जी रहे हैं। प्राणके बिना किसीका भी शरीर नहीं रह सकता; क्योंकि प्राण ही सब प्राणियोंकी आयु—जीवन है, इसीलिये यह प्राण 'सर्वायुष' कहलाता है। जो साधक यह प्राणियोंकी आयु है, इसलिये यह सबका आयु—जीवन कहलाता है; यों समझकर इस प्राणकी ब्रह्मरूपसे उपासना करते हैं, वे पूर्ण आयुको प्राप्त कर लेते हैं। प्रश्नोपनिषद्में भी कहा है कि जो मनुष्य इस प्राणके तत्त्वको जान लेता है, वह स्वयं अमर हो जाता है और उसकी प्रजा नष्ट नहीं होती है (३।११)। जो सर्वात्मा परमेश्वर अत्रके रससे बने हुए स्थूलशरीरधारी पुरुषका अन्तरात्मा है, वही उस प्राणमय पुरुषका भी शरीरान्तर्वर्ती अन्तर्यामी आत्मा है।
तस्माद्वा एतस्मात्प्राणमयादयोज्जर आत्मा मनोमयः। तैनेष पूर्णः। स वा एष पुरुषविध एव। तस्य पुरुषविधतामन्वयं पुरुषविधः।