भारतकोश
ईशादि नौ उपनिषद्

ईशादि नौ उपनिषद्

Ishadi Nau Upanishad

ऋषिगण द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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अनु० ३ ]

तैत्तिरीयोपनिषद्

३७९

तस्य यजुरेव शिरः। ऋगदक्षिणः पक्षः। सामोत्तरः पक्षः। आदेश आत्मा। अथर्वाङ्गिरसः पुच्छं प्रतिष्ठा। तदप्येष श्लोको भवति।

वै=यह निश्चय है कि; तस्मात्=उस; एतस्मात्=इस; प्राणमयात्=प्राणमय पुरुषसे; अन्यः=भिन्न; अन्तरः=उसके भीतर रहनेवाला; मनोमयः=मनोमय; आत्मा=आत्मा (पुरुष) है; तेन=उस मनोमय शरीरसे; एषः=यह प्राणमय शरीर; पूर्णः=व्याप्त है; सः=वह; एषः=यह मनोमय शरीर; वै=निश्चय ही; पुरुषविधः=पुरुषके आकारका; एव=ही है; तस्य=उसकी; पुरुषविधताम् अनु=पुरुषतुल्य आकृतिमें अनुगत (व्याप्त) होनेसे ही; अयम्=यह मनोमय शरीर; पुरुषविधः=पुरुषके आकारका है; तस्य=उस (मनोमय पुरुष)का; यजुः=यजुर्वेद; एव=ही; शिरः=(मानो) सिर है; ऋक्=ऋग्वेद; दक्षिणः=दाहिना; पक्षः=पंख है; साम=सामवेद; उत्तरः=बायाँ; पक्षः=पंख है; आदेशः=आदेश (विधिवाक्य); आत्मा=शरीरका मध्यभाग है; अथर्वाङ्गिरसः=अथर्वा और अङ्गिरा ऋषिद्वारा देखे गये अथर्ववेदके मन्त्र ही; पुच्छम्=पूँछ; (एवं) प्रतिष्ठा=आधार हैं; तत्=उसकी महिमाके विषयमें; अपि=भी; एषः=यह आगे कहा जानेवाला; श्लोकः भवति=श्लोक है।

व्याख्या—इस तृतीय अनुवाकके दूसरे अंशमें मनोमय पुरुषका वर्णन किया गया है। भाव यह है कि पहले बताये हुए प्राणमय पुरुषसे भिन्न, उससे भी सूक्ष्म होनेके कारण उसके भीतर रहनेवाला दूसरा पुरुष है; उसका नाम है मनोमय। उस मनोमयसे यह प्राणमय शरीर पूर्ण है अर्थात् वह इस प्राणमय शरीरमें सर्वत्र व्याप्त हो रहा है। वह यह मनोमय शरीर भी पुरुषके ही आकारका है। प्राणमय पुरुषमें अनुगत होनेसे ही यह मनोमय शरीर पुरुषके समान आकारवाला है। उसकी पक्षीके रूपमें इस प्रकार कल्पना की गयी है—उस मनोमय पुरुषका मानो यजुर्वेद ही सिर है, ऋग्वेद दाहिना पंख है, सामवेद बायाँ पंख है, आदेश (विधिवाक्य) मानो शरीरका मध्यभाग है तथा अथर्वा और अङ्गिरा ऋषियोंद्वारा देखे हुए अथर्ववेदके मन्त्र ही पूँछ और आधार हैं।