ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 383, कुल 548 में से
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तैत्तिरीयोपनिषद्
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चतुर्थ अनुवाक
यतो वाचो निवर्तन्ते । अप्राप्य मनसा सह । आनन्दं ब्रह्मणो विद्वान् । न विभेति कदाचनेति । तस्यैष एव शारीर आत्मा यः पूर्वस्य ।
यतः=जहाँसे; मनसा सह=मनके सहित; वाचः=वाणी आदि इन्द्रियाँ; अप्राप्य=उसे न पाकर; निवर्तन्ते=लौट आती हैं; [ तस्य ] ब्रह्मणः=उस ब्रह्मके; आनन्दम्=आनन्दको; विद्वान्=जाननेवाला पुरुष; कदाचन=कभी; न विभेति=भय नहीं करता; इति=इस प्रकार यह श्लोक है; तस्य=उस मनोमय पुरुषका भी; एषः एव=यही परमात्मा; शारीरः=शरीरान्तर्वर्ती; आत्मा=आत्मा है; यः=जो; पूर्वस्य=पहले बताये हुए अन्नरसमय शरीर या प्राणमय शरीरका है।
व्याख्या—इस मन्त्रमें ब्रह्मके आनन्दको जाननेवाले विद्वान्की महिमाके साथ अर्थान्तरसे उसके मनोमय शरीरकी महिमा प्रकट की गयी है। भाव यह है कि परब्रह्म परमात्माका जो स्वरूपभूत परम आनन्द है, वहाँतक मन, वाणी आदि समस्त इन्द्रियोंके समुदायरूप मनोमय शरीरकी भी पहुँच नहीं है; परंतु ब्रह्मको पानेके लिये साधन करनेवाले मनुष्यको यह ब्रह्मके पास पहुँचानेमें विशेष सहायक है। ये मन-वाणी आदि साधनपरायण पुरुषको उन परब्रह्मके द्वारतक पहुँचाकर, उसे वहाँ छोड़कर स्वयं लौट आते हैं और वह साधक उनको प्राप्त हो जाता है। ब्रह्मके आनन्दमय स्वरूपको जान लेनेवाला विद्वान् कभी भयभीत नहीं होता। इस प्रकार यह मन्त्र है।
मनोमय शरीरके भी अन्तर््यामी आत्मा वे ही परमात्मा हैं, जो पूर्वोक्त अन्नरसमय शरीर और प्राणमय शरीरके अन्तर््यामी हैं।
तस्माद्वा एतस्मान्नमनोमयादन्योऽन्तर आत्मा विज्ञानमयस्तेनेष पूर्णः । स वा एष पुरुषविध एव । तस्य पुरुषविधतामन्वयं पुरुष-विधः । तस्य श्रद्धैव शिरः । ऋतं दक्षिणः पक्षः । सत्यमुत्तरः पक्षः । योग आत्मा । महः पुच्छं प्रतिष्ठा । तदप्येष श्लोको भवति ।
वै=निश्चय ही; तस्मात्=उस पहले बताये हुए; एतस्मात्=इस; मनोमयात्=