भारतकोश
ईशादि नौ उपनिषद्

ईशादि नौ उपनिषद्

Ishadi Nau Upanishad

ऋषिगण द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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ईशादि नौ उपनिषद्

[ वल्ली २ ]

मनोमय पुरुषसे; अन्यः=अन्य; अन्तरः=इसके भीतर रहनेवाला; आत्मा=आत्मा; विज्ञानमयः=विज्ञानमय है; तेन=उस विज्ञानमय आत्मासे; एषः=यह मनोमय शरीर; पूर्णः=व्याप्त है; सः=वह; एषः=यह विज्ञानमय आत्मा; वै=निस्संदेह; पुरुषविधः एव=पुरुषके आकारका ही है; तस्य=उसकी; पुरुषविधत्वात् अनु=पुरुषाकृतिमें अनुगत होनेसे ही; अयम्=यह विज्ञानमय आत्मा; पुरुषविधः=पुरुषके आकारका बताया जाता है; तस्य=उस विज्ञानमय आत्माका; श्रद्धा=श्रद्धा; एव=ही; शिरः=(मानो) सिर है; व्रतम्=सदाचारका निश्चय; दक्षिणः=दाहिना; पक्षः=पंख है; सत्यम्=सत्यभाषणका निश्चय; उत्तरः=बायाँ; पक्षः=पंख है; योगः=(ध्यानद्वारा परमात्मामें एकाग्रतारूप) योग ही; आत्मा=शरीरका मध्यभाग है; महः='महः' नामसे प्रसिद्ध परमात्मा ही; पुच्छम्=पुच्छ; (एवं) प्रतिष्ठा=आधार है; तत्=उस विषयमें; अपि=भी; एषः=यह आगे कहा जानेवाला; श्लोकः=श्लोक; भवति=है।

व्याख्या —चतुर्थ अनुवाकके इस दूसरे अंशमें विज्ञानमय पुरुषका अर्थात् विज्ञानमय शरीरके अधिष्ठाता जीवात्माका वर्णन है। भाव यह है कि पहले बताये हुए मनोमय शरीरसे भी सूक्ष्म होनेके कारण उसके भीतर रहनेवाला जो आत्मा है, वह अन्य है। वह है विज्ञानमय पुरुष अर्थात् बुद्धिरूप गुफामें निवास करनेवाला और उसमें तदाकार-सा बना हुआ जीवात्मा। उससे यह मनोमय शरीर पूर्ण है। अर्थात् वह इस मनोमय शरीरमें सर्वत्र व्याप्त है और मनोमय अपनेसे पहलेवाले प्राणमय और अन्नमयमें व्याप्त है। अतः यह विज्ञानमय जीवात्मा समस्त शरीरमें व्याप्त है। गीतामें भी यही कहा है कि जीवात्मारूप क्षेत्रज्ञ शरीररूप क्षेत्रमें सर्वत्र स्थित है (१३।३२)। वह विज्ञानमय आत्मा भी निश्चय ही पुरुषके आकारका है। उस मनोमय पुरुषमें व्याप्त होनेसे ही वह पुरुषाकार कहा जाता है। उस विज्ञानमयके अङ्गोंकी पक्षीके रूपमें इस प्रकार कल्पना की गयी है। श्रद्धा कहते हैं बुद्धिकी निश्चित विश्वासरूप वृत्तिको; वही उस विज्ञानात्माके शरीरमें प्रधान अङ्गरूप सिर है; क्योंकि यह दृढ़ विश्वास ही प्रत्येक विषयमें उन्नतिका कारण है। परमात्माकी प्राप्तिमें तो सबसे पहले और सबसे अधिक इसीकी आवश्यकता है। सदाचरणका निश्चय ही इसका दाहिना पंख है, सत्य-भाषणका निश्चय ही इसका बायाँ पंख है। ध्यानद्वारा परमात्माके साथ संयुक्त