ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 385, कुल 548 में से
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तैत्तिरीयोपनिषद्
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रहना ही विज्ञानमय शरीरका मध्यभाग है और 'महः' नामसे प्रसिद्ध* परमात्मा पुच्छ और आधार है; क्योंकि परमात्मा ही जीवात्माका परम आश्रय है।
इस विज्ञानात्माकी महिमाके विषयमें भी यह आगे पञ्चम अनुवाकमें कहा जानेवाला श्लोक अर्थात् मन्त्र है।
॥ चतुर्थ अनुवाक समाप्त ॥ ४ ॥
पञ्चम अनुवाक
विज्ञानं यज्ञं तनुते। कर्माणि तनुतेऽपि च। विज्ञानं देवाः सर्वे। ब्रह्म ज्येष्ठमुपासते। विज्ञानं ब्रह्म चेद्देव। तस्माच्छेन्न प्रमाद्यति। शरीरे पाप्मनो हित्वा। सर्वाङ्कामान्समशनुत इति। तस्यैष एव शारीर आत्मा यः पूर्वस्य।
विज्ञानम्=विज्ञान ही; यज्ञम् तनुते=यज्ञोंका विस्तार करता है; च=और; कर्माणि अपि तनुते=कर्माँका भी विस्तार करता है; सर्वे=सब; देवाः=इन्द्रियरूप देवता; ज्येष्ठम्=सर्वश्रेष्ठ; ब्रह्म=ब्रह्मके रूपमें; विज्ञानम् उपासते=विज्ञानकी ही सेवा करते हैं; चेतु=यदि; (कोई) विज्ञानम्=विज्ञानको; ब्रह्म=ब्रह्मरूपसे; वेद=जानता है; (और) चेतु=यदि; तस्मात्=उससे; न प्रमाद्यति=प्रमाद नहीं करता, उस निश्चयसे कभी विचलित नहीं होता (तो); पाप्मनः=(शरीराभिमानजनित) पापसमुदायको; शरीर=शरीरमें ही; हित्वा=छोड़कर; सर्वाङ्कामान्=समस्त भोगोंका; समशनुते=अनुभव करता है; इति=इस प्रकार यह श्लोक है; तस्य=उस विज्ञानमयका; एषः=यह परमात्मा; एव=ही; शारीर=शरीरान्तर्वर्ती; आत्मा=आत्मा है; यः=जो; पूर्वस्य=पहलेवालेका है।
- शीक्षावल्ली पञ्चम अनुवाकमें 'भूः','भुवः','स्वः' और 'महः'—इन चार व्याहृतियोंमें 'महः'को ब्रह्मका स्वरूप बताया गया है, अतः 'महः' व्याहृति ब्रह्मका नाम है और ब्रह्मको आत्माकी प्रतिष्ठा बतलाना सर्वथा युक्तिसंगत है।