भारतकोश
ईशादि नौ उपनिषद्

ईशादि नौ उपनिषद्

Ishadi Nau Upanishad

ऋषिगण द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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ईशादि नौ उपनिषद्

[ वल्ली २ ]

व्याख्या —इस मन्त्रमें विज्ञानात्माकी महिमाका वर्णन और उसकी ब्रह्मरूपसे उपासना करनेका फल बताया गया है। भाव यह है कि यह विज्ञान अर्थात् बुद्धिके साथ तद्रूप हुआ जीवात्मा ही यज्ञोंका अर्थात् शुभ-कर्मरूप पुण्योंका विस्तार करता है और यही अन्यान्य लौकिक कर्मोंका भी विस्तार करता है। अर्थात् जीवात्मासे ही सम्पूर्ण कर्मोंको प्रेरणा मिलती है। सम्पूर्ण इन्द्रियाँ और मनरूप देवता सर्वश्रेष्ठ ब्रह्मके रूपमें इस विज्ञानमय जीवात्माकी ही सेवा करते हैं, अपनी-अपनी वृत्तियोंद्वारा इसीको सुख पहुँचाते रहते हैं। यदि कोई साधक इस विज्ञानस्वरूप आत्माको ही ब्रह्म समझता है और यदि यह उस धारणासे कभी च्युत नहीं होता अर्थात् उस धारणामें भूल नहीं करता या शरीर आदिमें स्थित, एकदेशीय एवं बद्धस्वरूपमें ब्रह्मका अभिमान नहीं कर लेता तो वह अनेक जन्मोंके संचित पापसमुदायको शरीरमें ही छोड़कर समस्त दिव्य भोगोंका अनुभव करता है। इस प्रकार यह श्लोक है।

उस विज्ञानमयके भी अन्तर्यामी आत्मा वे ही परब्रह्म परमेश्वर हैं, जो पहलेवालोंके अर्थात् अन्नरसमय स्थूलशरीरके, प्राणमयके और मनोमयके हैं।

तस्माद्वा एतस्माद्विज्ञानमयादन्योऽन्तर आत्माऽऽनन्दमयः । तेनैष पूर्णः । स वा एष पुरुषविध एव । तस्य पुरुषविधतामन्वयं पुरुषविधः । तस्य प्रियमेव शिरः । मोदो दक्षिणः पक्षः । प्रमोद उत्तरः पक्षः । आनन्द आत्मा । ब्रह्म पुच्छं प्रतिष्ठा । तदप्येष श्लोको भवति ।

वै =निश्चय ही; तस्मात् =उस पहले कहे हुए; एतस्मात् =इस; विज्ञानमयात् =विज्ञानमय जीवात्मासे; अन्यः =भिन्न; अन्तरः =इसके भी भीतर रहनेवाला आत्मा; आनन्दमयः आत्मा =आनन्दमय परमात्मा है; तेन =उससे; एषः =यह विज्ञानमय; पूर्णः =पूर्णतः व्याप्त है; सः =वह; एषः =यह आनन्दमय परमात्मा; वै =भी; पुरुषविधः =पुरुषके समान आकारवाला; एव =ही है; तस्य =उस विज्ञानमयकी; पुरुषविधताम् अनु =पुरुषाकारतामें अनुगत होनेसे ही; अयम् =यह (आनन्दमय परमात्मा); पुरुषविधः =पुरुषाकार कहा जाता है; तस्य =उस आनन्दमयका; प्रियम् =प्रिय;