ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 388, कुल 548 में से
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ईशादि नौ उपनिषद्
[ वल्ली २ ]
ब्रह्मसूत्र (१।१।१२ से १९ तकके विवेचन)में युक्तियों तथा श्रुतियोंके प्रमाणोंद्वारा सिद्ध की गयी है।
इन आनन्दमय परमात्माके विषयमें भी आगे षष्ठ अनुवाकमें कहा जानेवाला श्लोक अर्थात् मन्त्र है।
॥पञ्चम अनुवाक समाप्त॥५॥
षष्ठ अनुवाक
असत्रेव स भवति। असद्व्रहोति वेद चेत्। अस्ति ब्रहोति चेद्देद। सन्तमेनं ततो विदुरिति।
चेत्=यदि; (कोई) ब्रह्म=ब्रह्म; असत्=नहीं है; इति=इस प्रकार; वेद=समझता है; (तो) सः=वह; असत्=असत्; एव=ही; भवति=हो जाता है; (और) चेत्=यदि; (कोई) ब्रह्म=ब्रह्म; अस्ति=है; इति=इस प्रकार; वेद=जानता है; ततः=तो; एनम्=इसको; (ज्ञानीजन) सन्तम्=संत—सत्पुरुष; विदुः=समझते हैं; इति=इस प्रकार यह श्लोक है।
व्याख्या —इस मन्त्रमें ब्रह्मकी सत्ता माननेका और न माननेका फल बताया गया है। भाव यह है कि यदि कोई मनुष्य यह समझता है या ऐसा निश्चय करता है कि 'ब्रह्म असत् है' अर्थात् ब्रह्म या ईश्वर नामकी कोई चीज नहीं है तो वह 'असत्' हो जाता है, अर्थात् स्वेच्छाचारी होकर सदाचारसे भ्रष्ट नीच प्रकृतिका हो जाता है। यदि कोई मनुष्य ब्रह्मके यथार्थ तत्त्वको न जानकर भी यह समझता है कि 'निसंदेह ब्रह्म है', अर्थात् शास्त्र और महापुरुषोंपर दृढ़ विश्वास होनेके कारण यदि उसके मनमें ईश्वरकी सत्तापर पूरा विश्वास हो गया है तो ऐसे मनुष्यको ज्ञानी और महापुरुष 'संत' अर्थात् सत्पुरुष समझते हैं; क्योंकि परमात्माके तत्त्वज्ञानकी पहली सीढ़ी उनकी सत्तामें विश्वास ही है। परमात्माकी सत्तामें विश्वास बना रहे तो कभी-न-कभी किन्हीं महापुरुषकी कृपासे साधनमें लगकर मनुष्य उन्हें प्राप्त भी कर सकता है।