ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 389, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ेंअनु० ६ ]
तैत्तिरीयोपनिषद्
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तरयैष एव शारीर आत्मा यः पूर्वस्य।
तस्य=उस (आनन्दमय) का भी; एषः एव=यही; शारीरः=शरीरान्तर्वर्ती; आत्मा=आत्मा है; यः=जो; पूर्वस्य=पहलेवाले (विज्ञानमय)का है।
व्याख्या —पछ अनुवाकके इस दूसरे अंशमें पहलेके वर्णनानुसार आनन्दमयका अन्तरात्मा स्वयं आनन्दमयको ही बताया गया है। भाव यह है कि उन आनन्दमय ब्रह्मके वे स्वयं ही शरीरान्तर्वर्ती आत्मा हैं; क्योंकि उनमें शरीर और शरीरीका भेद नहीं है। जो पहले बताये हुए अन्नरसमय आदि सबके अन्तर्यामी परमात्मा हैं, वे स्वयं ही अपने अन्तर्यामी हैं; उनका अन्तर्यामी कोई दूसरा नहीं है। इसीलिये इनके आगे किसी दूसरेको न बताकर उस वर्णनकी परम्पराको यहीं समाप्त कर दिया गया है।
सम्बन्ध —ऊपर कहे हुए अंशमें ब्रह्मको 'असत्' मानने और 'सत्' माननेका फल बताया गया है; उसे सुनकर प्रत्येक मनुष्यके मनमें जो प्रश्न उठ सकते हैं, उन प्रश्नोंका निर्णय करके उन ब्रह्मकी सत्ताका प्रतिपादन करनेके लिये श्रुति स्वयं ही प्रश्न उपस्थित करती हैं—
अथातोऽनुप्रश्नाः । उताविद्वानमुं लोकं प्रेत्य कश्चन गच्छती ३ । आहो विद्वानमुं लोकं प्रेत्य कश्चित्समश्रुता ३ उ ।
अथ=इसके बाद; अतः=यहाँसे; अनुप्रश्नाः=अनुप्रश्न आरम्भ होते हैं; उत=क्या; अविद्वान्=ब्रह्मको न जाननेवाला; कश्चन=कोई पुरुष; प्रेत्य=मरकर; अमुम् लोकम् गच्छति=उस लोकमें (परलोकमें) जाता है; आहो=अथवा; कश्चित्=कोई भी; विद्वान्=ज्ञानी; प्रेत्य=मरकर; अमुम्=उस; लोकम्=लोकको; समश्रुते=प्राप्त होता है; उ=क्या ?
व्याख्या —अब यहाँसे अनुप्रश्न* आरम्भ करते हैं। पहला प्रश्न तो यह है कि यदि ब्रह्म हैं तो उनको न जाननेवाला कोई भी मनुष्य मरनेके अनन्तर
- अनुप्रश्न उन प्रश्नोंको कहते हैं, जो आचार्यके उपदेशके अनन्तर किसी शिष्यके मनमें उठते हैं या जिन्हें वह उपस्थित करता है।
इस अनुवाकमें जो अनुप्रश्न पूछे गये हैं, वे दोके रूपमें तीन हैं—(१) वास्तवमें ब्रह्म है या नहीं ? (२) जब ब्रह्म आकाशकी भाँति सर्वगत तथा पक्षपातरहित—सम हैं,