भारतकोश
ईशादि नौ उपनिषद्

ईशादि नौ उपनिषद्

Ishadi Nau Upanishad

ऋषिगण द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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अनु० ६ ]

तैत्तिरीयोपनिषद्

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विस्तार किया; सः=उसने; तपः तप्त्वा=इस प्रकार संकल्पका विस्तार करके; यत् किम् च=जो कुछ भी; इदम्=यह देखने और समझनेमें आता है; इदम् सर्वम् असृजत=इस समस्त जगत्की रचना की; तत् सूष्टा=उस जगत्की रचना करनेके अनन्तर; तत् एव=(वह स्वयं) उसीमें; अनुप्राविशत्=साथ-साथ प्रविष्ट हो गया; तत् अनुपविश्य=उसमें साथ-साथ प्रविष्ट होनेके बाद (वह स्वयं ही); सत्=मूर्त; च=और; त्यत्=अमूर्त; च=भी; अभवत्=हो गया; निरुक्तम् च अनिरुक्तम्=बतानेमें आनेवाले और न आनेवाले; च=तथा; निलयनम्=आश्रय देनेवाले; च=और; अनिलयनम्=आश्रय न देनेवाले; च=तथा; विज्ञानम्=चेतनायुक्त; च=और; अविज्ञानम्=जड पदार्थ; च=तथा; सत्यम्=सत्य; च=और; अनुत्तम्=छूट (इन सबके रूपमें); च=भी; सत्यम्=वह सत्यस्वरूप परमात्मा ही; अभवत्=हो गया; यत् किम् च=जो कुछ भी; इदम्=यह दिखायी देता है और अनुभवमें आता है; तत्=वह; सत्यम्=सत्य ही है; इति=इस प्रकार; आचक्षते=ज्ञानीजन कहते हैं; तत्=उस विषयमें; अपि=भी; एषः=यह; श्लोकः=श्लोक; भवति=है।

व्याख्या —सर्गके आदिमें परब्रह्म परमात्माने यह विचार किया कि मैं नानारूपमें उत्पन्न होकर बहुत हो जाऊँ। यह विचार करके उन्होंने तप किया अर्थात् जीवोंके कर्मानुसार सृष्टि उत्पन्न करनेके लिये संकल्प किया। संकल्प करके यह जो कुछ भी देखने, सुनने और समझनेमें आता है, उस जडचेतनमय समस्त जगत्की रचना की, अर्थात् इसका संकल्पमय स्वरूप बना लिया। उसके बाद स्वयं भी उसमें प्रविष्ट हो गये। यद्यपि अपनेसे ही उत्पन्न इस जगत्में वे परमेश्वर पहलेसे ही प्रविष्ट थे—यह जगत् जब उन्हींका स्वरूप है, तब उसमें उनका प्रविष्ट होना नहीं बनता—तथापि जडचेतनमय जगत्में आत्मारूपसे परिपूर्ण हुए उन परब्रह्म परमेश्वरके विशेष स्वरूप—उनके अन्तर््यामी स्वरूपका लक्ष्य करानेके लिये यहाँ यह बात कही गयी है कि ‘इस जगत्की रचना करके वे स्वयं भी उसमें प्रविष्ट हो गये।’ प्रविष्ट होनेके बाद वे मूर्त और अमूर्तरूपसे अर्थात् देखनेमें आनेवाले पृथ्वी, जल और तेज—इन भूतोंके रूपमें तथा वायु और आकाश—इन न दिखायी देनेवाले भूतोंके रूपमें प्रकट हो गये। फिर