ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 392, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ें३९०
ईशादि नौ उपनिषद्
[ वल्ली २ ]
जिनका वर्णन किया जा सकता है और नहीं किया जा सकता; ऐसे विभिन्न नाना पदार्थोंके रूपमें हो गये। इसी प्रकार आश्रय देनेवाले और आश्रय न देनेवाले, चेतन और जड—इन सबके रूपमें वे एकमात्र परमेश्वर ही बहुत-से नाम और रूप धारण करके व्यक्त हो गये। वे एक सत्यस्वरूप परमात्मा ही सत्य और झूठ—इन सबके रूपमें हो गये। इसीलिये ज्ञानीजन कहते हैं कि ‘यह जो कुछ देखने, सुनने और समझनेमें आता है, वह सब-का-सब सत्यस्वरूप परमात्मा ही है।’
इस विषयमें भी यह आगे सप्तम अनुवाकमें कहा जानेवाला श्लोक अर्थात् मन्त्र है।
॥ षष्ठ अनुवाक समाप्त ॥ ६ ॥
सप्तम अनुवाक
असद्वा इदमग्र आसीत्। ततो वै सदजायत। तदात्मानः स्वयमकुरुत। तस्मात्तत्सुकृतमुच्यत इति।
अग्र=प्रकट होनेसे पहले; इदम्=यह जड-चेतनात्मक जगत्; असत्=अव्यक्तरूपमें; वै=ही; आसीत्=था; ततः=उससे; वै=ही; सत्=सत् अर्थात् नामरूपमय प्रत्यक्ष जगत्; अजायत=उत्पन्न हुआ है; तत्=उसने; आत्मानम्=अपनेको; स्वयम्=स्वयं; अकुरुत=(इस रूपमें) प्रकट किया है; तस्मात्=इसीलिये; तत्=वह; सुकृतम्=‘सुकृत’; उच्यते=कहा जाता है; इति=इस प्रकार यह श्लोक है।
व्याख्या—सूक्ष्म और स्थूलरूपमें प्रकट होनेसे पहले यह जड-चेतनमय सम्पूर्ण जगत् असत्—अर्थात् अव्यक्तरूपमें ही था; उस अव्यक्तावस्थामें ही यह सत् अर्थात् नामरूपमय प्रत्यक्ष जड-चेतनात्मक जगत् उत्पन्न हुआ है। परमात्माने अपनेको स्वयं ही इस जड-चेतनात्मक जगत्के रूपमें बनाया है; इसीलिये उनका नाम ‘सुकृत’ (अपने-आप बना हुआ) है।*
- गीतामें कई प्रकारसे इस जड-चेतनात्मक जगत्का अव्यक्तसे उत्पन्न होना और उसीमें