ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 396, कुल 548 में से
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ईशादि नौ उपनिषद्
[ वल्ली २ ]
अष्टम अनुवाक
सम्बन्ध—पिछले अनुवाकमें जिस श्लोकका लक्ष्य कराया गया था, उसका उल्लेख करते हैं—
भीषास्माद्वातः पवते। भीषोदेति सूर्यः। भीषास्मादग्निश्चन्द्रश्च। मृत्युर्धावति पञ्चम इति।
अस्मात् भीषा=इसीके भयसे; वातः=पवन; पवते=चलता है; भीषा=(इसीके) भयसे; सूर्यः=सूर्य; उदेति=उदय होता है; अस्मात् भीषा=इसीके भयसे; अग्निः=अग्नि; च=और; इन्द्रः=इन्द्र; च=और; पञ्चमः=पाँचवाँ; मृत्युः=मृत्यु; धावति=(ये सब) अपना-अपना कार्य करनेमें प्रवृत्त हो रहे हैं; इति=इस प्रकार यह श्लोक है।
व्याख्या—इन परब्रह्म परमेश्वरके भयसे ही पवन नियमानुसार चलता है, इन्हींके भयसे सूर्य ठीक समयपर उदय होता है और ठीक समयपर अस्त होता है तथा इन्हींके भयसे अग्नि, इन्द्र और पाँचवाँ मृत्यु—ये सब अपना-अपना कार्य नियमपूर्वक सुव्यवस्थितरूपसे कर रहे हैं। यदि इन सबकी सुव्यवस्था करनेवाला इन सबका प्रेरक कोई न हो तो जगत्के सारे काम कैसे चले। इससे सिद्ध होता है कि इन सबको बनानेवाला, सबको यथायोग्य नियममें रखनेवाला कोई एक सत्य, ज्ञान और आनन्दस्वरूप परब्रह्म परमात्मा अवश्य है और वह मनुष्यको अवश्य मिल सकता है*।
सम्बन्ध—उन आनन्दस्वरूप परब्रह्म परमात्माका यह आनन्द कितना और कैसा है, इस जिज्ञासापर आनन्दविषयक विचार आरम्भ किया जाता है—
सैषाऽऽनन्दस्य मीमाः सा भवति। युवा स्यात्साधुयुवाध्यायक आशिष्टो द्रढिष्टो बलिष्ठस्तस्येयं पृथिवी सर्वा वित्तस्य पूर्णा स्यात्। स एको मानुष आनन्दः।
सा=वह; एषा=यह; आनन्दस्य=आनन्दसम्बन्धी; मीमांसा=विचार; भवति=आरम्भ
- इसी भावकी श्रुति कठोपनिषद्में भी आयी है (२।३।३)।