ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 397, कुल 548 में से
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तैत्तिरीयोपनिषद्
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होता है; युवा=कोई युवक; स्यात्=हो; (वह भी ऐसा-वैसा नहीं) साधयुवा=श्रेष्ठ आचरणवाला युवक हो; (तथा) अध्यायक:=वेदोंका अध्ययन कर चुका हो; आशिष्ठ:=शासनमें अत्यन्त कुशल हो; द्रढिष्ठ:=उसके सम्पूर्ण अङ्ग और इन्द्रियाँ सर्वथा दृढ़ हों; (तथा) बलिष्ठ:=वह सब प्रकारसे बलवान् हो; तस्य=(फिर) उसे; इयम्=यह; वित्तय पूर्णा=धनसे परिपूर्ण; सर्वा=सब-की-सब; पृथिवी=पृथ्वी;; स्यात्=प्राप्त हो जाय; (तो) स:=वह; मानुष:=मनुष्यलोकका; एक:=एक; आनन्द:=आनन्द है।
व्याख्या —इस वर्णनमें उस आनन्दका विचार आरम्भ करनेकी सूचना देकर सर्वप्रथम मनुष्यलोकके भोगोंसे मिल सकनेवाले बड़े-से-बड़े आनन्दकी कल्पना की गयी है। भाव यह है कि एक मनुष्य युवा हो; वह भी ऐसा-वैसा मामूली युवक नहीं—सदाचारी, अच्छे स्वभाववाला, अच्छे कुलमें उत्पन्न श्रेष्ठ पुरुष हो; उसे सम्पूर्ण वेदोंकी शिक्षा मिली हो तथा शासनमें—ब्रह्मचारियोंको सदाचारकी शिक्षा देनेमें अत्यन्त कुशल हो; उसके सम्पूर्ण अङ्ग और इन्द्रियाँ रोगरहित, समर्थ और सुदृढ़ हों और वह सब प्रकारके बलसे सम्पन्न हो। फिर धन-सम्पत्तिसे भरी यह सम्पूर्ण पृथ्वी उसके अधिकारमें आ जाय तो यह मनुष्यका एक बड़े-से-बड़ा सुख है। वह मानव-लोकका एक सबसे महान् आनन्द है।
ते ये शतं मानुषा आनन्दाः । स एको मनुष्यगन्धर्वाणामानन्दः । श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य ।
ते=वे; ये=जो; मानुषा:=मनुष्यलोक-सम्बन्धी; शतम्=एक सौ; आनन्द:=आनन्द हैं; स:=वह; मनुष्यगन्धर्वाणाम्=मानव-गन्धर्वोंका; एक:=एक; आनन्द:=आनन्द होता है; च=और (वह); अकामहतस्य=जिसका अन्तःकरण भोगोंकी कामनाओंसे दूषित नहीं हुआ है, ऐसे; श्रोत्रियस्य=वेदवेत्ता पुरुषको स्वभावसे ही प्राप्त है।
व्याख्या —जो मनुष्ययोनियोंने उत्तम कर्म करके गन्धर्वभावको प्राप्त हुए हैं, उनको ‘मनुष्य-गन्धर्व’ कहते हैं। यहाँ इनके आनन्दको उपर्युक्त मनुष्यके