ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 399, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ेंअनु० ८ ]
तैत्तिरीयोपनिषद्
३१७
प्राप्त हुए; पितृणाम्=पितरोंका; एकः=एक; आनन्दः=आनन्द है; च=और; (वह) अकाममहतस्य=भोगोंके प्रति निष्काम; श्रोत्रियस्य=वेदज्ञ पुरुषको स्वतः प्राप्त है।
व्याख्या —इस वर्णनमें देव-गन्धर्वोंके आनन्दकी अपेक्षा चिरस्थायी पितृलोकको प्राप्त दिव्य पितरोंके आनन्दको सौगुना बताया गया है। भाव यह है कि देव-गन्धर्वोंके जिस आनन्दका ऊपर वर्णन किया गया है, वैसे सौ आनन्दोंको एकत्र करनेपर आनन्दकी जो एक राशि होती है, उतना चिरस्थायी पितृलोकमें रहनेवाले दिव्य पितरोंका एक आनन्द है तथा जो उस लोकके भोग-सुखकी कामनासे आहत नहीं है, अर्थात् जिसको उसकी आवश्यकता ही नहीं रही है, उस श्रोत्रियको—वेदके रहस्यको समझनेवाले विरक्तको वह आनन्द स्वतः ही प्राप्त है।
ते ये शतं पितृणां चिरलोकलोकानामानन्दः। स एक आजानजानां देवानामानन्दः। श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य।
ते=वे (पूर्वोक्त); ये=जो; चिरलोकलोकानाम्=चिरस्थायी पितृलोकको प्राप्त हुए; पितृणाम्=पितरोंके; शतम्=एक सौ; आनन्दः=आनन्द हैं; सः=वह; आजानजानाम्=आजानज नामक; देवानाम्=देवताओंका; एकः=एक; आनन्दः=आनन्द है; च=और (वह आनन्द); अकाममहतस्य=उस लोकतकके भोगोंमें कामनारहित; श्रोत्रियस्य=श्रोत्रिय (वेदज्ञ)को स्वभावतः प्राप्त है।
व्याख्या —इस वर्णनमें चिरस्थायी लोकोंमें रहनेवाले दिव्य पितरोंके आनन्दकी अपेक्षा 'आजानज' नामक देवोंके आनन्दको सौगुना बताया गया है। भाव यह है कि चिरस्थायी लोकोंमें रहनेवाले दिव्य पितरोंके जिस आनन्दका ऊपर वर्णन किया गया है, वैसे सौ आनन्दोंकी मात्राको एकत्र करनेपर जो आनन्दकी एक राशि होती है, उतना 'आजानज' नामक देवताओंका एक आनन्द है। देवलोकके एक विशेष स्थानका नाम 'आजान' है; जो लोग स्मृतियोंमें प्रतिपादित किन्हीं पुण्य-कर्मोंके कारण वहाँ उत्पन्न हुए हैं, उन्हें 'आजानज' कहते हैं। जो उस लोकतकके भोगोंकी कामनासे आहत नहीं है, अर्थात् जो उस आनन्दको भी तुच्छ समझकर उससे विरक्त हो गया है, उस वेदके रहस्यको समझनेवाले विरक्त पुरुषके लिये तो वह आनन्द स्वभावसिद्ध है।