ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 400, कुल 548 में से
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ईशादि नौ उपनिषद्
[ वल्ली २ ]
ते ये शतमाजानजानां देवानामानन्दाः। स एकः कर्मदेवानां देवानामानन्दः। ये कर्मणा देवानपियन्ति श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य।
ते=वे (पूर्वोक्त); ये=जो; आजानजानाम्=आजानज नामक; देवानाम्=देवोंके; शतम्=एक सौ; आनन्दाः=आनन्द हैं; सः=वह; कर्मदेवानाम् देवानाम्=(उन) कर्मदेव नामक देवताओंका; एकः=एक; आनन्दः=आनन्द है; ये=जो; कर्मणा=वेदोंक कर्मोंसे; देवान्=देवोंको; अपियन्ति=प्राप्त हुए हैं; च=और; (वह) अकामहतस्य=उस लोकतकके भोगोंमें कामनारहित; श्रोत्रियस्य=श्रोत्रिय (वेदज्ञ)को तो स्वतः प्राप्त है।
व्याख्या —इस वर्णनमें आजानज देवोंके आनन्दकी अपेक्षा कर्मदेवोंके आनन्दको सौगुना बताया गया है। भाव यह है कि आजानज देवोंके जिस आनन्दका ऊपर वर्णन किया गया है, वैसे सौ आनन्दोंको एकत्र करनेपर जो आनन्दकी एक राशि होती है, उतना आनन्द जो वेदोंक कर्मद्वारा मनुष्ययोनिसे देवभावको प्राप्त हुए हैं, उन कर्मदेवताओंका आनन्द है। जो उन कर्मदेवताओंतकके आनन्दकी कामनासे आहत नहीं है, अर्थात् जिसको देवलोकतकके भोगोंकी इच्छा नहीं रही है, उस वेदके रहस्यको समझनेवाले विरक्त पुरुषके लिये तो वह आनन्द स्वभावसिद्ध है।
ते ये शतं कर्मदेवानां देवानामानन्दाः। स एको देवानामानन्दः। श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य।
ते=वे (पूर्वोक्त); ये=जो; कर्मदेवानाम् देवानाम्=कर्मदेव नामक देवताओंके; शतम्=एक सौ; आनन्दाः=आनन्द हैं; सः=वह; देवानाम्= देवताओंका; एकः=एक; आनन्दः=आनन्द है; च=और; (वह) अकामहतस्य=उस लोकतकके भोगोंमें कामनारहित; श्रोत्रियस्य=श्रोत्रिय (वेदज्ञ) को तो स्वभावतः प्राप्त है।
व्याख्या —इस वर्णनमें कर्मदेवोंकी अपेक्षा सृष्टिके आदिकालमें जिन स्थायी देवोंकी उत्पत्ति हुई है, उन स्वभावसिद्ध देवोंके आनन्दको सौगुना बताया गया है। भाव यह है कि कर्मदेवोंके जिस आनन्दका ऊपर वर्णन किया गया