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ईशादि नौ उपनिषद्

Ishadi Nau Upanishad

ऋषिगण द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

३१८

ईशादि नौ उपनिषद्

[ वल्ली २ ]

ते ये शतमाजानजानां देवानामानन्दाः। स एकः कर्मदेवानां देवानामानन्दः। ये कर्मणा देवानपियन्ति श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य।

ते=वे (पूर्वोक्त); ये=जो; आजानजानाम्=आजानज नामक; देवानाम्=देवोंके; शतम्=एक सौ; आनन्दाः=आनन्द हैं; सः=वह; कर्मदेवानाम् देवानाम्=(उन) कर्मदेव नामक देवताओंका; एकः=एक; आनन्दः=आनन्द है; ये=जो; कर्मणा=वेदोंक कर्मोंसे; देवान्=देवोंको; अपियन्ति=प्राप्त हुए हैं; च=और; (वह) अकामहतस्य=उस लोकतकके भोगोंमें कामनारहित; श्रोत्रियस्य=श्रोत्रिय (वेदज्ञ)को तो स्वतः प्राप्त है।

व्याख्या —इस वर्णनमें आजानज देवोंके आनन्दकी अपेक्षा कर्मदेवोंके आनन्दको सौगुना बताया गया है। भाव यह है कि आजानज देवोंके जिस आनन्दका ऊपर वर्णन किया गया है, वैसे सौ आनन्दोंको एकत्र करनेपर जो आनन्दकी एक राशि होती है, उतना आनन्द जो वेदोंक कर्मद्वारा मनुष्ययोनिसे देवभावको प्राप्त हुए हैं, उन कर्मदेवताओंका आनन्द है। जो उन कर्मदेवताओंतकके आनन्दकी कामनासे आहत नहीं है, अर्थात् जिसको देवलोकतकके भोगोंकी इच्छा नहीं रही है, उस वेदके रहस्यको समझनेवाले विरक्त पुरुषके लिये तो वह आनन्द स्वभावसिद्ध है।

ते ये शतं कर्मदेवानां देवानामानन्दाः। स एको देवानामानन्दः। श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य।

ते=वे (पूर्वोक्त); ये=जो; कर्मदेवानाम् देवानाम्=कर्मदेव नामक देवताओंके; शतम्=एक सौ; आनन्दाः=आनन्द हैं; सः=वह; देवानाम्= देवताओंका; एकः=एक; आनन्दः=आनन्द है; च=और; (वह) अकामहतस्य=उस लोकतकके भोगोंमें कामनारहित; श्रोत्रियस्य=श्रोत्रिय (वेदज्ञ) को तो स्वभावतः प्राप्त है।

व्याख्या —इस वर्णनमें कर्मदेवोंकी अपेक्षा सृष्टिके आदिकालमें जिन स्थायी देवोंकी उत्पत्ति हुई है, उन स्वभावसिद्ध देवोंके आनन्दको सौगुना बताया गया है। भाव यह है कि कर्मदेवोंके जिस आनन्दका ऊपर वर्णन किया गया

अनु० ८]

तैत्तिरीयोपनिषद्

३९९

है, वैसे सौ आनन्दोंको एकत्र करनेपर जो आनन्दकी एक राशि होती है, उतना उन स्वभावसिद्ध देवताओंका एक आनन्द है। जो उन स्वभावसिद्ध देवताओंके भोगानन्दकी कामनासे आहत नहीं है, अर्थात् उसकी भी जिसको कामना नहीं है, उस वेदके रहस्यको समझनेवाले निष्काम विरक्तके लिये तो वह आनन्द स्वभावसिद्ध ही है।

ते ये शतं देवानामानन्दाः। स एक इन्द्रस्यानन्दः। श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य।

ते=वे; ये=जो; देवानाम्=देवताओंके; शतम्=एक सौ; आनन्दाः=आनन्द हैं; सः=वह; इन्द्रस्य=इन्द्रका; एकः=एक; आनन्दः=आनन्द है; च=और; (वह) अकामहतस्य=इन्द्रतकके भोगोंमें कामनारहित; श्रोत्रियस्य=वेदवेताको स्वतः प्राप्त है।

व्याख्या —इस वर्णनमें पहले बताये हुए स्वभावसिद्ध देवोंके आनन्दकी अपेक्षा इन्द्रके आनन्दको सौगुना बताया गया है। भाव यह है कि देवताओंके जिस आनन्दका ऊपर वर्णन किया गया है, वैसे सौ आनन्दोंको एकत्र करनेपर जो आनन्दकी एक राशि होती है, उतना इन्द्रभावको प्राप्त देवताका एक आनन्द है। जो इन्द्रके भोगानन्दकी कामनासे आहत नहीं हुआ है, अर्थात् जिसको इन्द्रके सुखकी भी आकाङ्क्षा नहीं है—जो उसे भी तुच्छ समझकर उससे विरक्त हो गया है, उस वेदके रहस्यको समझनेवाले निष्काम पुरुषको तो वह आनन्द स्वतः प्राप्त है।

ते ये शतमिन्द्रस्यानन्दाः। स एको बृहस्पतेरानन्दः। श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य।

ते=वे; ये=जो; इन्द्रस्य=इन्द्रके; शतम्=एक सौ; आनन्दाः=आनन्द हैं; सः=वह; बृहस्पतेः=बृहस्पतिका; एकः=एक; आनन्दः=आनन्द है; च=और; (वह) अकामहतस्य=बृहस्पतितकके भोगोंमें निःस्पृह; श्रोत्रियस्य=वेदवेताको स्वतः प्राप्त है।

४००

ईशादि नौ उपनिषद्

[ वल्ली २ ]

व्याख्या —इस वर्णनमें इन्द्रके आनन्दकी अपेक्षा बृहस्पतिके आनन्दको सौगुना बताया गया है। भाव यह है कि इन्द्रके जिस आनन्दका ऊपर वर्णन किया गया है; वैसे सौ आनन्दोंको एकत्र करनेपर जो आनन्दकी एक राशि होती है, उतना बृहस्पतिके पदको प्राप्त हुए देवताका एक आनन्द है। परंतु जो मनुष्य बृहस्पतिके भोगानन्दकी कामनासे भी आहत नहीं है, उस भोगानन्दको भी अनित्य होनेके कारण जो तुच्छ समझकर उससे विरक्त हो चुका है, उस वेदके रहस्यको जाननेवाले निष्काम मनुष्यको वह आनन्द स्वतः प्राप्त है।

ते ये शतं बृहस्पतेरानन्दाः । स एकः प्रजापतेरानन्दः । श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य ।

ते=वे; ये=जो; बृहस्पतेः=बृहस्पतिके; शतम्=एक सौ; आनन्दाः=आनन्द हैं; सः=वह; प्रजापतेः=प्रजापतिके; एकः=एक; आनन्दः=आनन्द है; च=और; (वह) अकामहतस्य=प्रजापतितकके भोगोंमें कामनारहित; श्रोत्रियस्य=वेदेवेता पुरुषको स्वतः प्राप्त है।

व्याख्या —इस वर्णनमें बृहस्पतिके आनन्दकी अपेक्षा प्रजापतिके आनन्दको सौगुना बताया गया है। भाव यह है कि बृहस्पतिके जिस आनन्दका ऊपर वर्णन किया गया है, वैसे सौ आनन्दोंको एकत्र करनेपर जो आनन्दकी एक राशि होती है, उतना प्रजापतिके पदपर आरूढ़ देवताका एक आनन्द है। परंतु जो मनुष्य इस प्रजापतिके भोगानन्दकी कामनासे भी आहत नहीं है, अर्थात् उससे भी जो विरक्त हो चुका है, उस वेदके रहस्यको जाननेवाले निष्काम मनुष्यको तो वह आनन्द स्वभावसे ही प्राप्त है।

ते ये शतं प्रजापतेरानन्दाः । स एको ब्रह्मण आनन्दः । श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य ।

ते=वे; ये=जो; प्रजापतेः=प्रजापतिके; शतम्=एक सौ; आनन्दाः=आनन्द हैं; सः=वह; ब्रह्मणः=ब्रह्माका; एकः=एक; आनन्दः=आनन्द है; च=और; (वह) अकामहतस्य=ब्रह्मलोकतकके भोगोंमें कामनारहित; श्रोत्रियस्य=श्रोत्रिय (वेदज्ञ)को स्वभावतः प्राप्त है।

अनु० ८]

तैत्तिरीयोपनिषद्

४०१

व्याख्या —इस वर्णनमें प्रजापतिके आनन्दसे भी हिरण्यगर्भ ब्रह्माके आनन्दको सौगुना बताया गया है। भाव यह है कि प्रजापतिके जिस आनन्दका ऊपर वर्णन किया गया है, वैसे सौ आनन्दोंको एकत्र करनेपर जो एक आनन्दकी राशि होती है, उतना सृष्टिके आरम्भमें सबसे पहले उत्पन्न होनेवाले हिरण्यगर्भ ब्रह्माका एक आनन्द है तथा जो मनुष्य उस ब्रह्माके पदसे प्राप्त भोगसुखकी कामनासे भी आहत नहीं है, अर्थात् जो उसे भी अनित्य और तुच्छ समझकर उससे विरक्त हो गया है, जिसको एकमात्र परमानन्दस्वरूप परब्रह्मको प्राप्त करनेकी ही उत्कट अभिलाषा है, उस वेदके रहस्यको समझनेवाले विरक्त पुरुषको वह आनन्द स्वतः प्राप्त है।

इस प्रकार यहाँ एकसे दूसरे आनन्दकी अधिकताका वर्णन करते-करते सबसे बढ़कर हिरण्यगर्भके आनन्दको बताकर यह भाव दिखाया गया है कि इस जगत्में जितने प्रकारके जो-जो आनन्द देखने-सुनने तथा समझनेमें आ सकते हैं, वे चाहे कितने ही बड़े क्यों न हों, उस पूर्णानन्दस्वरूप परमात्माके आनन्दकी तुलनामें बहुत ही तुच्छ हैं। बृहदारण्यकमें कहा भी है कि 'समस्त प्राणी इसी परमात्मसम्बन्धी आनन्दके किसी एक अंशको लेकर ही जीते हैं (४।३।३२)।'

स यश्चायं पुरुषे यश्चासावादित्ये स एकः। स य एवंविदस्माल्लोकात्प्रेत्य। एतमन्नमयमात्मानमुपसंक्रामति। एतं प्राणमयमात्मानमुपसंक्रामति। एतं मनोमयमात्मानमुपसंक्रामति। एतं विज्ञानमयमात्मानमुपसंक्रामति। एतमानन्दमयमात्मानमुपसंक्रामति। तदप्येष श्लोको भवति।

सः =वह (परमात्मा); यः =जो; अयम् =यह; पुरुषे =मनुष्यमें; =और; यः =जो; असौ =वह; आदित्ये =सूर्यमें भी है; सः =वह (सबका अन्तर््यामी); एकः =एक ही है; यः =जो; एवंवित् =इस प्रकार जाननेवाला है; सः =वह; अस्मात् लोकात् =इस लोकसे; प्रेत्य =विदा होकर; एतम् =इस; अन्नमयम् =अन्नमय; आत्मानम् =आत्माको; उपसंक्रामति =प्राप्त हो जाता है; एतम् =इस; प्राणमयम् =प्राणमय;

४०२

ईशादि नौ उपनिषद्

[ वल्ली २ ]

आत्मानम्=आत्माको; उपसंक्रामति=प्राप्त होता है; एतम्=इस; मनोमयम्=मनोमय; आत्मानम्=आत्माको; उपसंक्रामति=प्राप्त होता है; एतम्=इस; विज्ञानमयम्=विज्ञानमय; आत्मानम्=आत्माको; उपसंक्रामति=प्राप्त होता है; एतम्=इस; आनन्दमयम्=आनन्दमय; आत्मानम्=आत्माको; उपसंक्रामति=प्राप्त होता है; तत्=उसके विषयमें; अपि=भी; एषः=यह (आगे कहा जानेवाला); श्लोकः=श्लोक; भवति=है।

व्याख्या —ऊपर बताये हुए समस्त आनन्दोंके एकमात्र केन्द्र परमानन्दस्वरूप परब्रह्म परमात्मा ही सबके अन्तर्यामी हैं। जो परमात्मा मनुष्योंमें हैं, वे ही सूर्यमें भी हैं। वे सबके अन्तर्यामी एक ही हैं। जो इस प्रकार जान लेता है, वह मरनेपर इस मनुष्य-शरीरको छोड़कर उस पहले बताये हुए अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय और आनन्दमय आत्माको प्राप्त होता है। तात्पर्य यह कि इन पाँचोंके जो आत्मा हैं, वे पाँचों जिनके स्वरूप हैं, उन परब्रह्म परमात्माको प्राप्त हो जाता है। पहले इन पाँचोंका वर्णन करते समय सबका शरीरान्तर्वर्ती आत्मा अन्तर्यामी परमात्माको ही बतलाया था। फलरूपमें उन्हींकी प्राप्ति होती है और वे ही ब्रह्म हैं—यह बतलानेके लिये ही यहाँ पाँचोंको क्रमसे प्राप्त होनेकी बात कही गयी है। वास्तवमें इस क्रमसे प्राप्त होनेकी बात कहना अभीष्ट नहीं है; क्योंकि अन्नमय मनुष्यशरीरको तो वह पहलेसे प्राप्त था ही, उसे छोड़कर जानेके बाद प्राप्त होनेवाला फल परमात्मा है, शरीर नहीं। अतः यहाँ अन्नमय आदिके अन्तर्यामी परमात्माकी ही प्राप्ति बतायी गयी है। इसलिये इन सबमें परिपूर्ण, सर्वरूप, सबके आत्मा, परम आनन्दस्वरूप परब्रह्मको प्राप्त हो जाना ही इस फल-श्रुतिका तात्पर्य है। इसके विषयमें आगे नवम अनुवाकमें कहा जानेवाला यह श्लोक भी है।

॥ अष्टम अनुवाक समाप्त ॥ ८ ॥

अनु० ९ ]

तैत्तिरीयोपनिषद्

४०३

नवम अनुवाक

सम्बन्ध— आठवें अनुवाकमें जिस श्लोक (मन्त्र)को लक्ष्य कराया गया है, उसका उल्लेख किया जाता है—

यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह। आनन्दं ब्रह्मणो विद्वान् न बिभेति कुतश्चनेति।

मनसा सह=मनके सहित; वाचः=वाणी आदि समस्त इन्द्रियाँ; यतः=जहाँसे; अप्राप्य=उसे न पाकर; निवर्तन्ते=लौट आती हैं; [ तस्य ] ब्रह्मणः=उस ब्रह्मके; आनन्दम्=आनन्दको; विद्वान्=जाननेवाला (महापुरुष); कुतश्चन=किसीसे भी; न बिभेति=भय नहीं करता; इति=इस प्रकार यह श्लोक है।

व्याख्या— इस मन्त्रमें परब्रह्म परमात्माके परमानन्दस्वरूपको जाननेका फल बताया गया है। भाव यह है कि मनके सहित सभी इन्द्रियाँ उसे न पाकर जहाँसे लौट आती हैं—जिस ब्रह्मानन्दको जाननेकी इन मन और इन्द्रियोंकी शक्ति नहीं है, परब्रह्म परमात्माके उस आनन्दको जाननेवाला ज्ञानी महापुरुष कभी किसीसे भी भय नहीं करता, वह सर्वथा निर्भय हो जाता है। इस प्रकार इस श्लोकका तात्पर्य है।

एतॄः ह वाव न तपति। किमहॄः साधु नाकरवम्। किमहं पापमकरवमिति। स य एवं विद्वान्ते आत्मानॄः सृणुते। उभे द्वौ वैष एते आत्मानॄः सृणुते। य एवं वेद। इत्युपनिषत्।

ह वाव=यह प्रसिद्ध ही है कि; एतम्=उस (महापुरुष)को; (यह बात) न तपति=चिन्तित नहीं करती कि; अहम्=मैंने; किम्=क्यों; साधु=श्रेष्ठ कर्म; न=नहीं; अकरवम्=किया; किम्=(अथवा) क्यों; अहम्=मैंने; पापम्=पापाचरण; अकरवम् इति=किया; यः=जो; एते=इन पुण्य-पापकर्मोंको; एवम्=इस प्रकार (संतापका हेतु); विद्वान्=जाननेवाला है; सः=वह; आत्मानम् सृणुते=आत्माकी रक्षा करता है; हि=अवश्य ही; यः=जो; एते=इन पुण्य और पाप; उभे एव=दोनों ही कर्मोंको;

४०४

ईशादि नौ उपनिषद्

[ वल्ली २ ]

एवम्=इस प्रकार (संतापका हेतु); वेद=जानता है; [सः] एषः=वह यह पुरुष; आत्मानम् स्पृणुते=आत्माकी रक्षा करता है; इति=इस प्रकार; उपनिषत्=उपनिषद् (की ब्रह्मानन्दवल्ली) पूरी हुई।

व्याख्या —इस वर्णनमें यह बात कही गयी है कि ज्ञानी महापुरुषको किसी प्रकारका शोक नहीं होता। भाव यह है कि परमात्माको ऊपर बताये अनुसार जाननेवाला विद्वान् कभी इस प्रकार शोक नहीं करता कि ‘क्यों मैंने श्रेष्ठ कर्मोंका आचरण नहीं किया, अथवा क्यों मैंने पाप-कर्म किया।’ उसके मनमें पुण्य-कर्मोंके फलस्वरूप उत्तम लोकोंकी प्राप्तिका लोभ नहीं होता और उसे पापजनित नरकादिका भय भी नहीं सताता। लोभ और भयजनित संतापसे वह ऊँचा उठ जाता है। उक्त ज्ञानी महापुरुष आसक्तिपूर्वक किये हुए पुण्य और पाप दोनों प्रकारके कर्मोंको जन्म-मरणरूप संतापका हेतु समझकर उनके प्रति राग-द्वेषसे सर्वथा रहित हो जाता है और परमात्माके चिन्तनमें संलग्न रहकर आत्माकी रक्षा करता है।

इस मन्त्रमें कुछ शब्दोंको अक्षरशः अथवा अर्थतः दुहराकर इस वल्लीके उपसंहारकी सूचना दी गयी है।

॥ नवम अनुवाक समाप्त ॥ १ ॥

॥ ब्रह्मानन्दवल्ली समाप्त ॥ २ ॥

— ✶ ✶ ✶ —

भृगुवल्ली *

प्रथम अनुवाक

भृगुर्वै वारुणिः, वरुणं पितरमुपससार अधीहि भगवो ब्रह्मेति। तस्मा एतत्प्रोवाच। अत्रं प्राणं चक्षुः श्रोत्रं मनो वाचमिति। तः होवाच। यतो वा इमानी भूतानि जायन्ते येन जातानि जीवन्ति। यत्प्रयन्यभिर्संविशन्ति। तद्विजिज्ञासस्व। तद् ब्रह्मेति। स तपोऽतप्यत। स तपस्तप्त्वा।

वै=यह प्रसिद्ध है कि; वारुणिः=वरुणका पुत्र; भृगुः=भृगु; पितरम्=अपने पिता; वरुणम् उपससार=वरुणके पास गया (और विनयपूर्वक बोला—); भगवः=भगवन्!; (मुझे) ब्रह्म अधीहि=ब्रह्मका उपदेश कीजिये; इति=इस प्रकार प्रार्थना करनेपर; तस्मै=उससे; (वरुणने) एतत्=यह; प्रोवाच=कहा; अत्रम्= अत्र; प्राणम्=प्राण; चक्षुः=नेत्र; श्रोत्रम्=श्रोत्र; मनः=मन; (और) वाचम्=वाणी; इति=इस प्रकार (ये सब ब्रह्मकी उपलब्धिके द्वार हैं), तम् ह उवाच=पुनः (वरुणने) उससे कहा; वै=निश्चय ही; इमानी=ये सब प्रत्यक्ष दीखनेवाले; भूतानि=प्राणी; यतः=जिससे; जायन्ते=उत्पन्न होते हैं; जातानि=उत्पन्न होकर; येन=जिसके सहारे; जीवन्ति=जीवित रहते हैं; (तथा) प्रयन्ति=(अन्तमें इस लोकसे) प्रयाण करते हुए; यत् अभिर्संविशन्ति=जिसमें प्रवेश करते हैं; तत्=उसको; विजिज्ञासस्व=तत्त्वसे जाननेकी इच्छा कर; तत्=वही; ब्रह्म=ब्रह्म है; इति=इस प्रकार (पिताकी बात सुनकर); सः=उसने; तपः अतप्यत=तप किया; सः=उसने; तपः तप्त्वा=तप करके—


  • वरुणने अपने पुत्र भृगु ऋषिको जिस ब्रह्मविद्याका उपदेश दिया था, उसीका इस वल्लीमें वर्णन है, इस कारण इसका नाम भृगुवल्ली है।

४०६

ईशादि नौ उपनिषद्

[ वल्ली ३ ]

व्याख्या—भृगु नामसे प्रसिद्ध एक ऋषि थे, जो वरुणके पुत्र थे। उनके मनमें परमात्माको जानने और प्राप्त करनेकी उत्कट अभिलाषा हुई, तब वे अपने पिता वरुणके पास गये। उनके पिता वरुण वेदको जाननेवाले, ब्रह्मनिष्ठ महापुरुष थे; अतः भृगुको किसी दूसरे आचार्यके पास जानेकी आवश्यकता नहीं हुई। अपने पिताके पास जाकर भृगुने इस प्रकार प्रार्थना की— ‘भगवन्! मैं ब्रह्मको जानना चाहता हूँ, अतः आप कृपा करके मुझे ब्रह्मका तत्त्व समझाइये।’ तब वरुणने भृगुसे कहा ‘तात! अन्न, प्राण, नेत्र, श्रोत्र, मन और वाणी—ये सभी ब्रह्मकी उपलब्धिके द्वार हैं। इन सबमें ब्रह्मकी सत्ता स्फुरित हो रही है।’ साथ ही यह भी कहा—‘ये प्रत्यक्ष दिखायी देनेवाले सब प्राणी जिनसे उत्पन्न होते हैं, उत्पन्न होकर जिनके सहयोगसे, जिनका बल पाकर ये सब जीते हैं—जीवनोपयोगी क्रिया करनेमें समर्थ होते हैं और महाप्रलयके समय जिनमें विलीन हो जाते हैं, उनको वास्तवमें जाननेकी (पानेकी) इच्छा कर। वे ही ब्रह्म हैं।’ इस प्रकार पिताका उपदेश पाकर भृगु ऋषिने ब्रह्मचर्य और शम-दम आदि नियमोंका पालन करते हुए तथा समस्त भोगोंके त्यागपूर्वक संयमसे रहते हुए पिताके उपदेशपर विचार किया। यही उनका तप था। इस प्रकार तप करके उन्होंने क्या किया, यह बात अगले अनुवाकमें कही गयी है।

॥ प्रथम अनुवाक समाप्त ॥ १ ॥

द्वितीय अनुवाक

अन्नं ब्रह्मेति व्यजानात्। अन्नाद्ब्रह्मेव खल्विमानि भूतानि जायन्ते। अन्नैन जातानि जीवन्ति। अन्नं प्रयन्यन्थिर्संविशन्तीति। तद्विज्ञाय पुनरेव वरुणं पितरमुपससार। अधीहि भगवो ब्रह्मेति। तः होवाच। तपसा ब्रह्म विजिज्ञासस्व। तपो ब्रह्मेति। स तपोऽतप्यत। स तपस्तत्त्व।

अनु० २]

तैत्तिरीयोपनिषद्

४०७

अन्नम्=अन्न; ब्रह्म=ब्रह्म है; इति=इस प्रकार; व्यजानात्=जाना; हि=क्योंकि; खलु=सचमुच; अन्नात्=अन्नसे; एव=ही; इमानि=ये सब; भूतानि=प्राणी; जायन्ते=उत्पन्न होते हैं; जातानि=उत्पन्न होकर; अन्नैन=अन्नसे ही; जीवन्ति=जीते हैं; (और) प्रयन्ति=(अन्तमें यहाँसे) प्रयाण करते हुए; अन्नम् अभिसंविशन्ति=अन्नमें ही प्रविष्ट होते हैं; इति=इस प्रकार; तत्=उसको; विज्ञाय=जानकर; (वह) पुनः=पुनः; पितरम्=अपने पिता; वरुणम् एव उपससार=वरुणके ही पास गया; (तथा अपनी समझी हुई बात उसने पिताको सुनायी; किंतु पिताने उसका समर्थन नहीं किया। तब वह बोला—) भगवः=भगवन्!; (मुझे) ब्रह्म अधीहि=ब्रह्मका बोध कराइये; इति=तब; तम् ह उवाच=उससे सुप्रसिद्ध वरुण ऋषिने कहा; तपसा=तपसे; ब्रह्म=ब्रह्मको; विजिज्ञासस्व=तत्त्वतः जाननेकी इच्छा कर; तपः=तप ही; ब्रह्म=ब्रह्म है; इति=इस प्रकार (पिताकी आज्ञा पाकर); सः=उसने; तपः अतप्यत=(पुनः) तप किया; सः=उसने; तपः तप्त्वा=तप करके—

व्याख्या—भृगुने पिताके उपदेशानुसार यह निश्चय किया कि अन्न ही ब्रह्म है; क्योंकि पिताजीने ब्रह्मके जो लक्षण बताये थे, वे सब अन्नमें पाये जाते हैं। समस्त प्राणी अन्नसे—अन्नके परिणामभूत वीर्यसे उत्पन्न होते हैं, अन्नसे ही उनका जीवन सुरक्षित रहता है और मरनेके बाद अन्नस्वरूप इस पृथ्वीमें ही प्रविष्ट हो जाते हैं। इस प्रकार निश्चय करके वे पुनः अपने पिता वरुणके पास आये। आकर अपने निश्चयके अनुसार उन्होंने सब बातें कहीं। पिताने कोई उत्तर नहीं दिया। उन्होंने सोचा—‘इसने अभी ब्रह्मके स्थूल रूपको ही समझा है, वास्तविक रूपतक इसकी बुद्धि नहीं गयी; अतः इसे तपस्या करके अभी और विचार करनेकी आवश्यकता है। पर जो कुछ इसने समझा है, उसमें इसकी तुच्छ बुद्धि कराकर अश्रद्धा उत्पन्न कर देनेमें भी इसका हित नहीं है, अतः इसकी बातका उत्तर न देना ही ठीक है।’ पितासे अपनी बातका समर्थन न पाकर भृगुने फिर प्रार्थना की—‘भगवन्! यदि मैंने ठीक नहीं समझा हो तो आप मुझे ब्रह्मका तत्त्व समझाइये।’ तब वरुणने कहा—‘तू तपके द्वारा ब्रह्मके तत्त्वको समझनेकी

४०८

ईशादि नौ उपनिषद्

[ वल्ली ३ ]

कोशिश कर। यह तप ब्रह्मका ही स्वरूप है, अतः यह उनका बोध करानेमें सर्वथा समर्थ है।' इस प्रकार पिताकी आज्ञा पाकर भृगु ऋषि पुनः पहलेकी भाँति तपोमय जीवन बिताते हुए पितासे पहले सुने हुए उपदेशके अनुसार ब्रह्मका स्वरूप निश्चय करनेके लिये विचार करते रहे। इस प्रकार तप करके उन्होंने क्या किया, यह बात अगले अनुवाकमें कही गयी है।

॥ द्वितीय अनुवाक समाप्त ॥ २ ॥

तृतीय अनुवाक

प्राणो ब्रह्मेति व्यजानात्। प्राणाङ्ग्येव खल्विमानि भूतानि जायन्ते। प्राणेन जातानि जीवन्ति। प्राणं प्रयन्त्यभिर्संविशन्तीति। तद्विज्ञाय पुनरेव वरुणं पितरमुपससार। अधीहि भगवो ब्रह्मेति। तत् होवाच। तपसा ब्रह्म विजिज्ञासस्व। तपो ब्रह्मेति। स तपोऽतप्यत। स तपस्तप्त्वा।

प्राणः=प्राण; ब्रह्म=ब्रह्म है; इति=इस प्रकार; व्यजानात्=जाना; हि=क्योंकि; खलु=सचमुच; प्राणात्=प्राणसे; एव=ही; इमानि=ये समस्त; भूतानि=प्राणी; जायन्ते=उत्पन्न होते हैं; जातानि=उत्पन्न होकर; प्राणेन=प्राणसे ही; जीवन्ति=जीते हैं (और); प्रयन्ति=(अन्तमें यहाँसे) प्रयाण करते हुए; प्राणम् अभिर्संविशन्ति=प्राणमें ही सब प्रकारसे प्रविष्ट हो जाते हैं; इति=इस प्रकार; तत्=उसे; विज्ञाय=जानकर; पुनः=फिर; पितरम् वरुणम् एव उपससार=(अपने) पिता वरुणके ही पास गया (और वहाँ उसने अपना निश्चय सुनाया; जब पिताने उत्तर नहीं दिया, तब वह बोला—); भगवः=भगवन्! (मुझे); ब्रह्म अधीहि=ब्रह्मका उपदेश दीजिये; इति=इस प्रकार प्रार्थना करनेपर; ह तम् उवाच=सुप्रसिद्ध वरुण ऋषिने उससे कहा; ब्रह्म=ब्रह्मको; तपसा=तपसे; विजिज्ञासस्व=तत्त्वतः जाननेकी इच्छा कर; तपः=तप ही; ब्रह्म=ब्रह्म अर्थात् उनकी प्राप्तिका बड़ा साधन है; इति=इस प्रकार

अनु० ३ ]

तैत्तिरीयोपनिषद्

४०९

पिताकी आज्ञा पाकर; सः=उसने (पुनः); तपः अतप्यत=तप किया; सः=उसने; तपः तप्त्वा=तप करके—

व्याख्या —भृगुने पिताके उपदेशानुसार तपके द्वारा यह निश्चय किया कि प्राण ही ब्रह्म है; उन्होंने सोचा, पिताजीद्वारा बताये हुए ब्रह्मके लक्षण प्राणमें पूर्णतया पाये जाते हैं। समस्त प्राणी प्राणसे उत्पन्न होते हैं, अर्थात् एक जीवित प्राणीसे उसीके सदृश दूसरा प्राणी उत्पन्न होता हुआ प्रत्यक्ष देखा जाता है; तथा सभी प्राणसे ही जीते हैं। यदि शासका आना-जाना बन्द हो जाय, यदि प्राणद्वारा अन्न ग्रहण न किया जाय तथा अन्नका रस समस्त शरीरमें न पहुँचाया जाय तो कोई भी प्राणी जीवित नहीं रह सकता और मरनेके बाद सब प्राणमें ही प्रविष्ट हो जाते हैं। यह प्रत्यक्ष देखा जाता है कि मृत शरीरमें प्राण नहीं रहते; अतः निःसन्देह प्राण ही ब्रह्म है, यह निश्चय करके वे पुनः अपने पिता वरुणके पास गये। पहलेकी भाँति अपने निश्चयके अनुसार उन्होंने पुनः पितासे अपना अनुभव निवेदन किया। पिताने फिर भी कोई उत्तर नहीं दिया। उन्होंने सोचा कि यह पहलेकी अपेक्षा तो कुछ सूक्ष्मतामें पहुँचा है; परंतु अभी बहुत कुछ समझना शेष है; अतः उत्तर न देनेसे अपने-आप इसकी जिज्ञासामें बल आयेगा; अतः उत्तर न देना ही ठीक है। पिताजीसे अपनी बातका समर्थन न पाकर भृगुने फिर उनसे प्रार्थना की—‘भगवन्! यदि अब भी मैंने ठीक न समझा हो तो आप ही कृपा करके मुझे ब्रह्मका तत्त्व समझाइये।’ तब वरुणने पुनः वही बात कही—‘तू तपके द्वारा ब्रह्मको जाननेकी चेष्टा कर; यह तप ही ब्रह्म है, अर्थात् ब्रह्मके तत्त्वको जाननेका प्रधान साधन है।’ इस प्रकार पिताजीकी आज्ञा पाकर भृगु ऋषि फिर उसी प्रकार तपस्या करते हुए पिताके उपदेशपर विचार करते रहे। तपस्या करके उन्होंने क्या किया, यह अगले अनुवाकमें बताया गया है।

॥ तृतीय अनुवाक समाप्त ॥ ३ ॥

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४१०

ईशादि नौ उपनिषद्

[ वल्ली ३ ]

चतुर्थ अनुवाक

मनो ब्रह्मेति व्यजानात्। मनसो ह्येव खल्विमानि भूतानि जायन्ते। मनसा जातानि जीवन्ति। मनः प्रयत्यन्थिभंसविशन्तीति। तद्विज्ञाय पुनरेव वरुणं पितरमुपससार। अधीहि भगवो ब्रह्मेति। तः होवाच। तपसा ब्रह्म विजिज्ञासस्व। तपो ब्रह्मेति। स तपोऽतप्यत। स तपस्तप्त्वा।

मनः=मन; ब्रह्म=ब्रह्म है; इति=इस प्रकार; व्यजानात्=समझा; हि=क्योंकि; खलु=सचमुच; मनसः=मनसे; एव=ही; इमानि=ये समस्त; भूतानि=प्राणी; जायन्ते=उत्पन्न होते हैं; जातानि=उत्पन्न होकर; मनसा=मनसे ही; जीवन्ति=जीते हैं; (तथा) प्रयन्ति=(इस लोकसे) प्रयाण करते हुए; (अन्तमें) मनः अभिसंविशन्ति=मनमें ही सब प्रकारसे प्रविष्ट हो जाते हैं; इति=इस प्रकार; तत्=उस ब्रह्मको; विज्ञाय=जानकर; पुनः एव=फिर भी; पितरम्=अपने पिता; वरुणम् उपससार=वरुणके पास गया (और अपनी बातका कोई उत्तर न पाकर बोला—); भगवः=भगवन्! (मुझे); ब्रह्म अधीहि=ब्रह्मका उपदेश दीजिये; इति=इस प्रकार (प्रार्थना करनेपर); ह तम् उवाच=सुप्रसिद्ध वरुण ऋषिने उससे कहा; ब्रह्म=ब्रह्मको; तपसा=तपसे; विजिज्ञासस्व=तत्त्वतः जाननेकी इच्छा कर; तपः=तप ही; ब्रह्म=ब्रह्म है; इति=इस प्रकार पिताकी आज्ञा पाकर; सः=उसने; तपः अतप्यत=तप किया; सः=उसने; तपः तप्त्वा=तप करके—

व्याख्या —इस बार भगुने पिताके उपदेशानुसार यह निश्चय किया कि मन ही ब्रह्म है; उन्होंने सोचा, पिताजीके बताये हुए ब्रह्मके सारे लक्षण मनमें पाये जाते हैं। मनसे सब प्राणी उत्पन्न होते हैं—स्त्री और पुरुषके मानसिक प्रेमपूर्ण सम्बन्धसे ही प्राणी बीजरूपसे माताके गर्भमें आकर उत्पन्न होते हैं, उत्पन्न होकर मनसे ही इन्द्रियोंद्वारा समस्त जीवनोंपयोगी वस्तुओंका उपभोग करके जीवित रहते हैं और मरनेके बाद मनमें ही प्रविष्ट हो जाते हैं—मरनेके बाद इस शरीरमें प्राण और इन्द्रियाँ नहीं रहतीं, इसलिये मन ही ब्रह्म है। इस प्रकार निश्चय करके वे पुनः पहलेकी भाँति अपने पिता वरुणके पास गये और उन्होंने अपने

अनु० ५ ]

तैत्तिरीयोपनिषद्

४११

अनुभवकी बात पिताजीको सुनायी। इस बार भी पितासे कोई उत्तर नहीं मिला। पिताने सोचा कि यह पहलेकी अपेक्षा तो गहराईमें उतरा है, परंतु अभी इसे और भी तपस्या करनी चाहिये; अतः उत्तर न देना ही ठीक है। पितासे अपनी बातका उत्तर न पाकर भृगुने पुनः पहलेकी भाँति प्रार्थना की—‘भगवन्! यदि मैंने ठीक न समझा हो तो कृपया आप ही मुझे ब्रह्मका तत्त्व समझाइये।’ तब वरुणने पुनः वही उत्तर दिया—‘तू तपके द्वारा ब्रह्मके तत्त्वको जाननेकी इच्छा कर। अर्थात् तपस्या करते हुए मेरे उपदेशपर पुनः विचार कर। यह तपरूप साधन ही ब्रह्म है। ब्रह्मको जाननेका इससे बढ़कर दूसरा कोई उपाय नहीं है।’ इस प्रकार पिताकी आज्ञा पाकर भृगुने पुनः पहलेकी भाँति संयमपूर्वक रहकर पिताके उपदेशपर विचार किया। विचार करके उन्होंने क्या किया, यह बात अगले अनुवाकमें कही गयी है।

॥ चतुर्थ अनुवाक समाप्त ॥ ४ ॥

पञ्चम अनुवाक

विज्ञानं ब्रह्मेति व्यजानात्। विज्ञानाच्छ्रेयं खल्विमानि भूतानि जायन्ते। विज्ञानेन जातानि जीवन्ति। विज्ञानं प्रयन्यन्थिभसंविशन्तीति। तद्विज्ञाय पुनरेव वरुणं पितरमुपससार। अधीहि भगवो ब्रह्मेति। तः होवाच। तपसा ब्रह्म विजिज्ञासस्व। तपो ब्रह्मेति। स तपोऽतप्यत। स तपस्तप्त्वा।

विज्ञानम्=विज्ञान; ब्रह्म=ब्रह्म है; इति=इस प्रकार; व्यजानात्=जाना; हि=क्योंकि; खलु=सचमुच; विज्ञानात्=विज्ञानसे; एव=ही; इमानि=ये समस्त; भूतानि=प्राणी; जायन्ते=उत्पन्न होते हैं; जातानि=उत्पन्न होकर; विज्ञानेन=विज्ञानसे ही; जीवन्ति=जीते हैं; (और) प्रयन्ति=अन्तमें यहाँसे प्रयाण करते हुए; विज्ञानम् अभिसंविशन्ति=विज्ञानमें ही प्रविष्ट हो जाते हैं; इति=इस प्रकार; तत्=उस ब्रह्मको; विज्ञाय=जानकर; पुनः एव=(वह) पुनः उसी प्रकार; पितरम्=अपने पिता; वरुणम् उपससार=वरुणके

४१२

ईशादि नौ उपनिषद्

[ वल्ली ३ ]

पास गया; (और अपनी बातका उत्तर न मिलनेपर बोला—) भगवः=भगवन्! ; (मुझे) ब्रह्म अधीहि=ब्रह्मका उपदेश दीजिये; इति=इस प्रकार कहनेपर; ह तम् उवाच=सुप्रसिद्ध वरुण ऋषिने उससे कहा; ब्रह्म=ब्रह्मको; तपसा=(तु) तपके द्वारा; विजिज्ञासस्व=तत्त्वतः जाननेकी इच्छा कर; तपः=तप ही; ब्रह्म=ब्रह्म है; इति=इस प्रकार पिताकी आज्ञा पाकर; सः=उसने; तपः अतप्यत=पुनः तप किया; सः=उसने; तपः तप्त्वा=तप करके—

व्याख्या— इस बार भृगुने पिताके उपदेशानुसार यह निश्चय किया कि यह विज्ञानस्वरूप चेतन जीवात्मा ही ब्रह्म है; उन्होंने सोचा—पिताजीने जो ब्रह्मके लक्षण बताये थे, वे सब-के-सब पूर्णतया इसमें पाये जाते हैं। ये समस्त प्राणी जीवात्मासे ही उत्पन्न होते हैं, सजीव चेतन प्राणियोंसे ही प्राणियोंकी उत्पत्ति प्रत्यक्ष देखी जाती है। उत्पन्न होकर इस विज्ञानस्वरूप जीवात्मासे ही जीते हैं; यदि जीवात्मा न रहे तो ये मन, इन्द्रियाँ, प्राण आदि कोई भी नहीं रह सकते और कोई भी अपना काम नहीं कर सकते तथा मरनेके बाद ये मन आदि सब जीवात्मामें ही प्रविष्ट हो जाते हैं—जीवके निकल जानेपर मृत शरीरमें ये सब देखनेमें नहीं आते। अतः विज्ञानस्वरूप जीवात्मा ही ब्रह्म है। यह निश्चय करके वे पहलेकी भाँति अपने पिता वरुणके पास आये। आकर उन्होंने अपने निश्चित अनुभवकी बात पिताजीको सुनायी। इस बार भी पिताजीने कोई उत्तर नहीं दिया। पिताने सोचा—‘इस बार यह बहुत कुछ ब्रह्मके निकट आ गया है, इसका विचार स्थूल और सूक्ष्म—दोनों प्रकारके जडतत्वोंसे ऊपर उठकर चेतन जीवात्मातक तो पहुँच गया है। परंतु ब्रह्मका स्वरूप तो इससे भी विलक्षण है, वे तो नित्य आनन्दस्वरूप एक अद्वितीय परमात्मा हैं; इसे अभी और तपस्या करनेकी आवश्यकता है, अतः उत्तर न देना ही ठीक है।’ इस प्रकार बार-बार पिताजीसे कोई उत्तर न मिलनेपर भी भृगु हतोत्साह या निराश नहीं हुए। उन्होंने पहलेकी भाँति पुनः पिताजीसे वही प्रार्थना की—‘भगवन्! यदि मैंने ठीक न समझा हो तो आप मुझे ब्रह्मका रहस्य बतलाइये।’ तब वरुणने पुनः वही

अनु० ६ ]

तैत्तिरीयोपनिषद्

४१३

उत्तर दिया—‘तू तपके द्वारा ही ब्रह्मके तत्त्वको जाननेकी इच्छा कर। अर्थात् तपस्यापूर्वक उसका पूर्वकथनानुसार विचार कर। तप ही ब्रह्म है।’ इस प्रकार पिताजीकी आज्ञा पाकर भगुने पुनः पहलेकी भाँति संयमपूर्वक रहते हुए पिताके उपदेशपर विचार किया। विचार करके उन्होंने क्या किया, यह आगे बताया गया है।

॥ पञ्चम अनुवाक समाप्त ॥ ५ ॥

षष्ठ अनुवाक

आनन्दो ब्रह्मेति व्यजानात्। आनन्दाद्धयेव खलि्वमानि भूतानि जायन्ते। आनन्देन जातानि जीवन्ति। आनन्दं प्रयन्त्यभिंसंविशन्तीति। सैषा भार्गवी वारुणी विद्या परमे व्योमन् प्रतिष्ठिता। स य एवं वेद प्रतितिष्ठति। अन्नवानन्नादो भवति। महान् भवति प्रजया पशुभिर्ब्रह्मवर्चसेन। महान् कीर्त्या।

आनन्दः=आनन्द ही; ब्रह्म=ब्रह्म है; इति=इस प्रकार; व्यजानात्=निश्चय-पूर्वक जाना; हि=क्योंकि; खलु=सचमुच; आनन्दात्=आनन्दसे; एव=ही; इमानि=ये समस्त; भूतानि=प्राणी; जायन्ते=उत्पन्न होते हैं; जातानि=उत्पन्न होकर; आनन्देन=आनन्दसे ही; जीवन्ति=जीते हैं; (तथा) प्रयन्ति=इस लोकसे प्रयाण करते हुए; (अन्तमें) आनन्दम् अभिसंविशन्ति=आनन्दमें ही प्रविष्ट हो जाते हैं; इति=इस प्रकार (जाननेपर उसे परब्रह्मका पूरा ज्ञान हो गया); सा=वह; एषा=यह; भार्गवी=भगुकी जानी हुई; वारुणी=और वरुणद्वारा उपदेश की हुई; विद्या=विद्या; परमे व्योमन्=विशुद्ध आकाशस्वरूप परब्रह्म परमात्मामें; प्रतिष्ठिता=प्रतिष्ठित है अर्थात् पूर्णतः स्थित है; यः=जो कोई (दूसरा साधक) भी; एवम्=इस प्रकार (आनन्दस्वरूप ब्रह्मको); वेद=जानता है; सः=वह; (उस विशुद्ध आकाशस्वरूप परमानन्दमें) प्रतितिष्ठति=स्थित हो जाता है; (इतना ही नहीं; इस लोकमें लोगोंके

४१४

ईशादि नौ उपनिषद्

[ वल्ली ३ ]

देखनेमें भी वह) अत्रवान्=बहुत अत्रवाला; अत्राद्=और अत्रको भलीभाँति पचानेकी शक्तिवाला; भवति=हो जाता है; (तथा) प्रजया=संतानसे; पशुभिः=पशुओंसे; (तथा) ब्रह्मवर्चसेन=ब्रह्मतेजसे सम्पन्न होकर; महान्=महान्; भवति=हो जाता है; कीर्त्या [ अपि ]=उत्तम कीर्तिके द्वारा भी; महान्=महान्; [ भवति ]=हो जाता है।

व्याख्या —इस बार भृगुने पिताके उपदेशपर गहरा विचार करके यह निश्चय किया कि आनन्द ही ब्रह्म है। ये आनन्दमय परमात्मा ही अत्रमय आदि सबके अन्तरात्मा हैं। वे सब भी इन्हींके स्थूलरूप हैं। इसी कारण उनमें ब्रह्मबुद्धि होती है और ब्रह्मके आंशिक लक्षण पाये जाते हैं। परंतु सर्वशसे ब्रह्मके लक्षण आनन्दमें ही घटते हैं; क्योंकि ये समस्त प्राणी उन आनन्दस्वरूप परब्रह्म परमात्मासे ही सृष्टिके आदिमें उत्पन्न होते हैं—इन सबके आदि कारण तो वे ही हैं तथा इन आनन्दमयके आनन्दका लेश पाकर ही ये सब प्राणी जी रहे हैं—कोई भी दुःखके साथ जीवित रहना नहीं चाहता। इतना ही नहीं, उन आनन्दमय सर्वांतर्त्यामी परमात्माकी अचिन्त्यशक्तिकी प्रेरणासे ही इस जगत्के समस्त प्राणियोंकी सारी चेष्टाएँ हो रही हैं। उनके शासनमें रहनेवाले सूर्य आदि यदि अपना-अपना काम न करें तो एक क्षण भी कोई प्राणी जीवित नहीं रह सकता। सबके जीवनाधार सचमुच वे आनन्दस्वरूप परमात्मा ही हैं तथा प्रलयकालमें समस्त प्राणियोंसे भरा हुआ यह ब्रह्माण्ड उन्हींमें प्रविष्ट होता है—उन्हींमें विलीन होता है, वे ही सब प्रकारसे सदा-सर्वदा सबके आधार हैं। इस प्रकार अनुभव होते ही भृगुको परब्रह्मका यथार्थ ज्ञान हो गया। फिर उन्हें किसी प्रकारकी जिज्ञासा नहीं रही। श्रुति स्वयं उस विद्याकी महिमा बतलानेके लिये कहती है—वही यह वरुणद्वारा बतायी हुई और भृगुको प्राप्त हुई ब्रह्मविद्या (ब्रह्मका रहस्य बतानेवाली विद्या) है। यह विद्या विशुद्ध आकाशस्वरूप परब्रह्म परमात्मामें स्थित है। वे ही इस विद्याके भी आधार हैं। जो कोई मनुष्य भृगुकी भाँति तपस्यापूर्वक इसपर विचार करके परमानन्दस्वरूप परब्रह्म परमात्माको जान लेता है, वह भी उन विशुद्ध परमानन्दस्वरूप परमात्मामें स्थित हो जाता

अनु० ७ ]

तैत्तिरीयोपनिषद्

४१५

है। इस प्रकार इस विद्याका वास्तविक फल बताकर मनुष्योंको उस साधनकी ओर लगानेके लिये उपर्युक्त प्रकारसे अन्न, प्राण आदि समस्त तत्त्वोंके रहस्य विज्ञानपूर्वक ब्रह्मको जाननेवाले ज्ञानीके शरीर और अन्तःकरणमें जो स्वाभाविक विलक्षण शक्तियाँ उत्पन्न हो जाती हैं, उनको भी श्रुति बतलाती है। वह अन्नवान् अर्थात् नाना प्रकारके जीवन-यात्रोपयोगी भोगोंसे सम्पन्न हो जाता है और उन सबको सेवन करनेकी सामर्थ्य भी उसमें आ जाती है। अर्थात् उसके मन, इन्द्रियाँ और शरीर सर्वथा निर्विकार और नीरोग हो जाते हैं। इतना ही नहीं, वह संतानसे, पशुओंसे, ब्रह्मतेजसे और बड़ी भारी कीर्तिसे समृद्ध होकर जगत्में सर्वश्रेष्ठ समझा जाता है।

॥ षष्ठ अनुवाक समाप्त ॥ ६ ॥

सप्तम अनुवाक

सम्बन्ध— छठे अनुवाकमें ब्रह्मज्ञानीके अन्न और प्रजा आदिसे सम्पन्न होनेकी बात कही गयी; इसपर यह जिज्ञासा होती है कि ये सब सिद्धियाँ भी क्या ब्रह्मसाक्षात्कार होनेपर ही मिलती हैं या इन्हें प्राप्त करनेका दूसरा उपाय भी है। इसपर इन सबकी प्राप्तिके दूसरे उपाय भी बताये जाते हैं—

अन्नं न निन्द्यात्। तद्भुतम्। प्राणो वा अन्नम्। शरीरमन्नादम्। प्राणे शरीरं प्रतिष्ठितम्। शरीरं प्राणः प्रतिष्ठितः। तदेतदन्नमन्ने प्रतिष्ठितम्। स य एतदन्नमन्ने प्रतिष्ठितं वेद प्रतितिष्ठति। अन्नवानन्नादो भवति। महान् भवति प्रजया पशुभिर्ब्रह्मवर्चसेन। महान् कीर्त्या।

अन्नम् न निन्द्यात्=अन्नकी निन्दा न करे; तत्=वह; व्रतम्=व्रत है; प्राणः=प्राण; वै=ही; अन्नम्=अन्न है; (और) शरीरम्=शरीर; (उस प्राणरूप अन्नसे जीनेके कारण) अन्नादम्=अन्नका भोक्ता है; शरीरम्=शरीर; प्राणे=प्राणके आधारपर; प्रतिष्ठितम्=स्थित हो रहा है; (और) शरीरे=शरीरके आधारपर; प्राणः=प्राण;

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ईशादि नौ उपनिषद्

[ वल्ली ३ ]

प्रतिष्ठितः=स्थित हो रहे हैं; तत्=इस तरह; एतत्=यह; अत्रे=अत्रमें ही; अत्रम्=अत्र; प्रतिष्ठितम्=स्थित हो रहा है; यः=जो मनुष्य; अत्रे=अत्रमें ही; अत्रम्=अत्र; प्रतिष्ठितम्=प्रतिष्ठित हो रहा है; एतत्=इस रहस्यको; वेद=जानता है; सः=वह; प्रतिष्ठितः=उसमें प्रतिष्ठित हो जाता है; (अतः) अत्रवान्=अत्रवाला; (और) अत्रादः=अत्रको खानेवाला; भवति=हो जाता है; प्रजया=प्रजासे; पशुभिः=पशुओंसे; ब्रह्मवर्चसेन=(और) ब्रह्मतेजसे सम्पन्न होकर; महान्=महान्; भवति=बन जाता है; (तथा) कीर्त्या=कीर्तिसे (सम्पन्न होकर भी); महान्=महान्; [ भवति ]=हो जाता है।

व्याख्या —इस अनुवाकमें अत्रका महत्त्व बतलाकर उसे जाननेका फल बताया गया है। भाव यह है कि जो मनुष्य अत्रादिसे सम्पन्न होना चाहे, उसे सबसे पहले तो यह व्रत लेना चाहिये कि ‘मैं कभी अत्रकी निन्दा नहीं करूँगा।’ यह एक साधारण नियम है कि जिस किसी वस्तुको मनुष्य पाना चाहता है, उसके प्रति उसकी महत्त्वबुद्धि होनी चाहिये; तभी वह उसके लिये प्रयत्न करेगा। जिसकी जिसमें हेयबुद्धि है, वह उसकी ओर आँख उठाकर देखेगा भी नहीं। अत्रकी निन्दा न करनेका व्रत लेकर अत्रके इस महत्त्वको समझना चाहिये कि अत्र ही प्राण है और प्राण ही अत्र है; क्योंकि अत्रसे ही प्राणोंमें बल आता है और प्राणशक्तिसे ही अत्रमय शरीरमें जीवनी शक्ति आती है। यहाँ प्राणको अत्र इसलिये भी कहा है कि यही शरीरमें अत्रके रसको सर्वत्र फैलाता है। शरीर प्राणके ही आधार टिका हुआ है, इसीलिये वह प्राणरूप अत्रका भोक्ता है। शरीर प्राणमें स्थित है अर्थात् शरीरकी स्थिति प्राणके अधीन है और प्राण शरीरमें स्थित है—प्राणोंका आधार शरीर है, यह बात प्रत्यक्ष है ही। इस प्रकार यह अत्रमय शरीर भी अत्र है। यह अनुभवसिद्ध विषय है कि प्राणोंको आहार न मिलनेपर वे शरीरकी धातुओंको ही सोख लेते हैं। और शरीरकी स्थिति प्राणके अधीन होनेसे प्राण भी अत्र ही हैं। अतः शरीर और प्राणका अन्योन्याश्रयसम्बन्ध होनेसे यह कहा गया है कि अत्रमें ही अत्र स्थित हो रहा है। यही इसका तत्त्व है। जो मनुष्य इस रहस्यको समझ लेता है, वही शरीर और प्राण—इन दोनोंका

अनु० ८]

तैत्तिरीयोपनिषद्

४१७

ठीक-ठीक उपयोग कर सकता है। इसीलिये यह कहा गया है कि वह शरीर और प्राणोंके विज्ञानमें पारङ्गत हो जाता है और इसी विज्ञानके फलस्वरूप वह सब प्रकारकी भोगसामग्रीसे युक्त और उसे उपभोगमें लानेकी शक्तिसे सम्पन्न हो जाता है। इसीलिये वह संतानसे, नाना प्रकारके पशुओंसे और ब्रह्मतेजसे भी सम्पन्न होकर महान् बन जाता है। उसकी कीर्ति, उसका यश जगत्में फैल जाता है और उसके द्वारा भी वह जगत्में महान् हो जाता है।

॥सप्तम अनुवाक समाप्त॥ ७॥

अष्टम अनुवाक

अत्रं न परिच्छीत। तद् व्रतम्। आपो वा अन्नम्। ज्योतिरन्नादम्। अप्सु ज्योतिः प्रतिष्ठितम्। ज्योतिष्यापः प्रतिष्ठिताः। तदेतदन्नमन्ने प्रतिष्ठितम्। स य एतदन्नमन्ने प्रतिष्ठितं वेद प्रतिष्ठिष्ठति। अन्नवानन्नादो भवति। महान् भवति प्रजया पशुभिर्ब्रह्मवर्चसेन। महान् कीर्त्या।

अन्नम् न परिच्छीत=अन्नकी अवहेलना न करे; तत्=वह; व्रतम्=एक व्रत है; आपः=जल; वै=ही; अन्नम्=अन्न है; (और) ज्योतिः=तेज; अन्नादम्=(रसस्वरूप) अन्नका भोक्ता है; अप्सु=जलमें; ज्योतिः=तेज; प्रतिष्ठितम्=प्रतिष्ठित है; ज्योतिषि=तेजमें; आपः=जल; प्रतिष्ठिताः=प्रतिष्ठित है; तत्=वही; एतत्=यह; अन्ने=अन्नमें; अन्नम्=अन्न; प्रतिष्ठितम्=प्रतिष्ठित है; यः=जो मनुष्य; (इस प्रकार) अन्ने=अन्नमें; अन्नम्=अन्न; प्रतिष्ठितम्=प्रतिष्ठित है; एतत्=इस रहस्यको; वेद=भलीभाँति समझता है; सः=वह; (अन्तमें) प्रतिष्ठिष्ठति=(उस रहस्यमें) परिनिष्ठित हो जाता है; (तथा) अन्नवान्=अन्नवाला; (और) अन्नादः=अन्नको खानेवाला; भवति=हो जाता है; प्रजया=(वह) संतानसे; पशुभिः=पशुओंसे; (और) ब्रह्मवर्चसेन=ब्रह्म-तेजसे; महान्=महान्; भवति=बन जाता है; (तथा) कीर्त्या=कीर्तिसे (सम्बद्ध होकर भी); महान्=महान्; [ भवति ]=हो जाता है।