ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 419, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ेंअनु० ८]
तैत्तिरीयोपनिषद्
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ठीक-ठीक उपयोग कर सकता है। इसीलिये यह कहा गया है कि वह शरीर और प्राणोंके विज्ञानमें पारङ्गत हो जाता है और इसी विज्ञानके फलस्वरूप वह सब प्रकारकी भोगसामग्रीसे युक्त और उसे उपभोगमें लानेकी शक्तिसे सम्पन्न हो जाता है। इसीलिये वह संतानसे, नाना प्रकारके पशुओंसे और ब्रह्मतेजसे भी सम्पन्न होकर महान् बन जाता है। उसकी कीर्ति, उसका यश जगत्में फैल जाता है और उसके द्वारा भी वह जगत्में महान् हो जाता है।
॥सप्तम अनुवाक समाप्त॥ ७॥
अष्टम अनुवाक
अत्रं न परिच्छीत। तद् व्रतम्। आपो वा अन्नम्। ज्योतिरन्नादम्। अप्सु ज्योतिः प्रतिष्ठितम्। ज्योतिष्यापः प्रतिष्ठिताः। तदेतदन्नमन्ने प्रतिष्ठितम्। स य एतदन्नमन्ने प्रतिष्ठितं वेद प्रतिष्ठिष्ठति। अन्नवानन्नादो भवति। महान् भवति प्रजया पशुभिर्ब्रह्मवर्चसेन। महान् कीर्त्या।
अन्नम् न परिच्छीत=अन्नकी अवहेलना न करे; तत्=वह; व्रतम्=एक व्रत है; आपः=जल; वै=ही; अन्नम्=अन्न है; (और) ज्योतिः=तेज; अन्नादम्=(रसस्वरूप) अन्नका भोक्ता है; अप्सु=जलमें; ज्योतिः=तेज; प्रतिष्ठितम्=प्रतिष्ठित है; ज्योतिषि=तेजमें; आपः=जल; प्रतिष्ठिताः=प्रतिष्ठित है; तत्=वही; एतत्=यह; अन्ने=अन्नमें; अन्नम्=अन्न; प्रतिष्ठितम्=प्रतिष्ठित है; यः=जो मनुष्य; (इस प्रकार) अन्ने=अन्नमें; अन्नम्=अन्न; प्रतिष्ठितम्=प्रतिष्ठित है; एतत्=इस रहस्यको; वेद=भलीभाँति समझता है; सः=वह; (अन्तमें) प्रतिष्ठिष्ठति=(उस रहस्यमें) परिनिष्ठित हो जाता है; (तथा) अन्नवान्=अन्नवाला; (और) अन्नादः=अन्नको खानेवाला; भवति=हो जाता है; प्रजया=(वह) संतानसे; पशुभिः=पशुओंसे; (और) ब्रह्मवर्चसेन=ब्रह्म-तेजसे; महान्=महान्; भवति=बन जाता है; (तथा) कीर्त्या=कीर्तिसे (सम्बद्ध होकर भी); महान्=महान्; [ भवति ]=हो जाता है।