ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 418, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ें४१६
ईशादि नौ उपनिषद्
[ वल्ली ३ ]
प्रतिष्ठितः=स्थित हो रहे हैं; तत्=इस तरह; एतत्=यह; अत्रे=अत्रमें ही; अत्रम्=अत्र; प्रतिष्ठितम्=स्थित हो रहा है; यः=जो मनुष्य; अत्रे=अत्रमें ही; अत्रम्=अत्र; प्रतिष्ठितम्=प्रतिष्ठित हो रहा है; एतत्=इस रहस्यको; वेद=जानता है; सः=वह; प्रतिष्ठितः=उसमें प्रतिष्ठित हो जाता है; (अतः) अत्रवान्=अत्रवाला; (और) अत्रादः=अत्रको खानेवाला; भवति=हो जाता है; प्रजया=प्रजासे; पशुभिः=पशुओंसे; ब्रह्मवर्चसेन=(और) ब्रह्मतेजसे सम्पन्न होकर; महान्=महान्; भवति=बन जाता है; (तथा) कीर्त्या=कीर्तिसे (सम्पन्न होकर भी); महान्=महान्; [ भवति ]=हो जाता है।
व्याख्या —इस अनुवाकमें अत्रका महत्त्व बतलाकर उसे जाननेका फल बताया गया है। भाव यह है कि जो मनुष्य अत्रादिसे सम्पन्न होना चाहे, उसे सबसे पहले तो यह व्रत लेना चाहिये कि ‘मैं कभी अत्रकी निन्दा नहीं करूँगा।’ यह एक साधारण नियम है कि जिस किसी वस्तुको मनुष्य पाना चाहता है, उसके प्रति उसकी महत्त्वबुद्धि होनी चाहिये; तभी वह उसके लिये प्रयत्न करेगा। जिसकी जिसमें हेयबुद्धि है, वह उसकी ओर आँख उठाकर देखेगा भी नहीं। अत्रकी निन्दा न करनेका व्रत लेकर अत्रके इस महत्त्वको समझना चाहिये कि अत्र ही प्राण है और प्राण ही अत्र है; क्योंकि अत्रसे ही प्राणोंमें बल आता है और प्राणशक्तिसे ही अत्रमय शरीरमें जीवनी शक्ति आती है। यहाँ प्राणको अत्र इसलिये भी कहा है कि यही शरीरमें अत्रके रसको सर्वत्र फैलाता है। शरीर प्राणके ही आधार टिका हुआ है, इसीलिये वह प्राणरूप अत्रका भोक्ता है। शरीर प्राणमें स्थित है अर्थात् शरीरकी स्थिति प्राणके अधीन है और प्राण शरीरमें स्थित है—प्राणोंका आधार शरीर है, यह बात प्रत्यक्ष है ही। इस प्रकार यह अत्रमय शरीर भी अत्र है। यह अनुभवसिद्ध विषय है कि प्राणोंको आहार न मिलनेपर वे शरीरकी धातुओंको ही सोख लेते हैं। और शरीरकी स्थिति प्राणके अधीन होनेसे प्राण भी अत्र ही हैं। अतः शरीर और प्राणका अन्योन्याश्रयसम्बन्ध होनेसे यह कहा गया है कि अत्रमें ही अत्र स्थित हो रहा है। यही इसका तत्त्व है। जो मनुष्य इस रहस्यको समझ लेता है, वही शरीर और प्राण—इन दोनोंका