ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 412, कुल 548 में से
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ईशादि नौ उपनिषद्
[ वल्ली ३ ]
चतुर्थ अनुवाक
मनो ब्रह्मेति व्यजानात्। मनसो ह्येव खल्विमानि भूतानि जायन्ते। मनसा जातानि जीवन्ति। मनः प्रयत्यन्थिभंसविशन्तीति। तद्विज्ञाय पुनरेव वरुणं पितरमुपससार। अधीहि भगवो ब्रह्मेति। तः होवाच। तपसा ब्रह्म विजिज्ञासस्व। तपो ब्रह्मेति। स तपोऽतप्यत। स तपस्तप्त्वा।
मनः=मन; ब्रह्म=ब्रह्म है; इति=इस प्रकार; व्यजानात्=समझा; हि=क्योंकि; खलु=सचमुच; मनसः=मनसे; एव=ही; इमानि=ये समस्त; भूतानि=प्राणी; जायन्ते=उत्पन्न होते हैं; जातानि=उत्पन्न होकर; मनसा=मनसे ही; जीवन्ति=जीते हैं; (तथा) प्रयन्ति=(इस लोकसे) प्रयाण करते हुए; (अन्तमें) मनः अभिसंविशन्ति=मनमें ही सब प्रकारसे प्रविष्ट हो जाते हैं; इति=इस प्रकार; तत्=उस ब्रह्मको; विज्ञाय=जानकर; पुनः एव=फिर भी; पितरम्=अपने पिता; वरुणम् उपससार=वरुणके पास गया (और अपनी बातका कोई उत्तर न पाकर बोला—); भगवः=भगवन्! (मुझे); ब्रह्म अधीहि=ब्रह्मका उपदेश दीजिये; इति=इस प्रकार (प्रार्थना करनेपर); ह तम् उवाच=सुप्रसिद्ध वरुण ऋषिने उससे कहा; ब्रह्म=ब्रह्मको; तपसा=तपसे; विजिज्ञासस्व=तत्त्वतः जाननेकी इच्छा कर; तपः=तप ही; ब्रह्म=ब्रह्म है; इति=इस प्रकार पिताकी आज्ञा पाकर; सः=उसने; तपः अतप्यत=तप किया; सः=उसने; तपः तप्त्वा=तप करके—
व्याख्या —इस बार भगुने पिताके उपदेशानुसार यह निश्चय किया कि मन ही ब्रह्म है; उन्होंने सोचा, पिताजीके बताये हुए ब्रह्मके सारे लक्षण मनमें पाये जाते हैं। मनसे सब प्राणी उत्पन्न होते हैं—स्त्री और पुरुषके मानसिक प्रेमपूर्ण सम्बन्धसे ही प्राणी बीजरूपसे माताके गर्भमें आकर उत्पन्न होते हैं, उत्पन्न होकर मनसे ही इन्द्रियोंद्वारा समस्त जीवनोंपयोगी वस्तुओंका उपभोग करके जीवित रहते हैं और मरनेके बाद मनमें ही प्रविष्ट हो जाते हैं—मरनेके बाद इस शरीरमें प्राण और इन्द्रियाँ नहीं रहतीं, इसलिये मन ही ब्रह्म है। इस प्रकार निश्चय करके वे पुनः पहलेकी भाँति अपने पिता वरुणके पास गये और उन्होंने अपने