भारतकोश
ईशादि नौ उपनिषद्

ईशादि नौ उपनिषद्

Ishadi Nau Upanishad

ऋषिगण द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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अनु० ५ ]

तैत्तिरीयोपनिषद्

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अनुभवकी बात पिताजीको सुनायी। इस बार भी पितासे कोई उत्तर नहीं मिला। पिताने सोचा कि यह पहलेकी अपेक्षा तो गहराईमें उतरा है, परंतु अभी इसे और भी तपस्या करनी चाहिये; अतः उत्तर न देना ही ठीक है। पितासे अपनी बातका उत्तर न पाकर भृगुने पुनः पहलेकी भाँति प्रार्थना की—‘भगवन्! यदि मैंने ठीक न समझा हो तो कृपया आप ही मुझे ब्रह्मका तत्त्व समझाइये।’ तब वरुणने पुनः वही उत्तर दिया—‘तू तपके द्वारा ब्रह्मके तत्त्वको जाननेकी इच्छा कर। अर्थात् तपस्या करते हुए मेरे उपदेशपर पुनः विचार कर। यह तपरूप साधन ही ब्रह्म है। ब्रह्मको जाननेका इससे बढ़कर दूसरा कोई उपाय नहीं है।’ इस प्रकार पिताकी आज्ञा पाकर भृगुने पुनः पहलेकी भाँति संयमपूर्वक रहकर पिताके उपदेशपर विचार किया। विचार करके उन्होंने क्या किया, यह बात अगले अनुवाकमें कही गयी है।

॥ चतुर्थ अनुवाक समाप्त ॥ ४ ॥

पञ्चम अनुवाक

विज्ञानं ब्रह्मेति व्यजानात्। विज्ञानाच्छ्रेयं खल्विमानि भूतानि जायन्ते। विज्ञानेन जातानि जीवन्ति। विज्ञानं प्रयन्यन्थिभसंविशन्तीति। तद्विज्ञाय पुनरेव वरुणं पितरमुपससार। अधीहि भगवो ब्रह्मेति। तः होवाच। तपसा ब्रह्म विजिज्ञासस्व। तपो ब्रह्मेति। स तपोऽतप्यत। स तपस्तप्त्वा।

विज्ञानम्=विज्ञान; ब्रह्म=ब्रह्म है; इति=इस प्रकार; व्यजानात्=जाना; हि=क्योंकि; खलु=सचमुच; विज्ञानात्=विज्ञानसे; एव=ही; इमानि=ये समस्त; भूतानि=प्राणी; जायन्ते=उत्पन्न होते हैं; जातानि=उत्पन्न होकर; विज्ञानेन=विज्ञानसे ही; जीवन्ति=जीते हैं; (और) प्रयन्ति=अन्तमें यहाँसे प्रयाण करते हुए; विज्ञानम् अभिसंविशन्ति=विज्ञानमें ही प्रविष्ट हो जाते हैं; इति=इस प्रकार; तत्=उस ब्रह्मको; विज्ञाय=जानकर; पुनः एव=(वह) पुनः उसी प्रकार; पितरम्=अपने पिता; वरुणम् उपससार=वरुणके