ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 410, कुल 548 में से
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ईशादि नौ उपनिषद्
[ वल्ली ३ ]
कोशिश कर। यह तप ब्रह्मका ही स्वरूप है, अतः यह उनका बोध करानेमें सर्वथा समर्थ है।' इस प्रकार पिताकी आज्ञा पाकर भृगु ऋषि पुनः पहलेकी भाँति तपोमय जीवन बिताते हुए पितासे पहले सुने हुए उपदेशके अनुसार ब्रह्मका स्वरूप निश्चय करनेके लिये विचार करते रहे। इस प्रकार तप करके उन्होंने क्या किया, यह बात अगले अनुवाकमें कही गयी है।
॥ द्वितीय अनुवाक समाप्त ॥ २ ॥
तृतीय अनुवाक
प्राणो ब्रह्मेति व्यजानात्। प्राणाङ्ग्येव खल्विमानि भूतानि जायन्ते। प्राणेन जातानि जीवन्ति। प्राणं प्रयन्त्यभिर्संविशन्तीति। तद्विज्ञाय पुनरेव वरुणं पितरमुपससार। अधीहि भगवो ब्रह्मेति। तत् होवाच। तपसा ब्रह्म विजिज्ञासस्व। तपो ब्रह्मेति। स तपोऽतप्यत। स तपस्तप्त्वा।
प्राणः=प्राण; ब्रह्म=ब्रह्म है; इति=इस प्रकार; व्यजानात्=जाना; हि=क्योंकि; खलु=सचमुच; प्राणात्=प्राणसे; एव=ही; इमानि=ये समस्त; भूतानि=प्राणी; जायन्ते=उत्पन्न होते हैं; जातानि=उत्पन्न होकर; प्राणेन=प्राणसे ही; जीवन्ति=जीते हैं (और); प्रयन्ति=(अन्तमें यहाँसे) प्रयाण करते हुए; प्राणम् अभिर्संविशन्ति=प्राणमें ही सब प्रकारसे प्रविष्ट हो जाते हैं; इति=इस प्रकार; तत्=उसे; विज्ञाय=जानकर; पुनः=फिर; पितरम् वरुणम् एव उपससार=(अपने) पिता वरुणके ही पास गया (और वहाँ उसने अपना निश्चय सुनाया; जब पिताने उत्तर नहीं दिया, तब वह बोला—); भगवः=भगवन्! (मुझे); ब्रह्म अधीहि=ब्रह्मका उपदेश दीजिये; इति=इस प्रकार प्रार्थना करनेपर; ह तम् उवाच=सुप्रसिद्ध वरुण ऋषिने उससे कहा; ब्रह्म=ब्रह्मको; तपसा=तपसे; विजिज्ञासस्व=तत्त्वतः जाननेकी इच्छा कर; तपः=तप ही; ब्रह्म=ब्रह्म अर्थात् उनकी प्राप्तिका बड़ा साधन है; इति=इस प्रकार