ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 409, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ेंअनु० २]
तैत्तिरीयोपनिषद्
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अन्नम्=अन्न; ब्रह्म=ब्रह्म है; इति=इस प्रकार; व्यजानात्=जाना; हि=क्योंकि; खलु=सचमुच; अन्नात्=अन्नसे; एव=ही; इमानि=ये सब; भूतानि=प्राणी; जायन्ते=उत्पन्न होते हैं; जातानि=उत्पन्न होकर; अन्नैन=अन्नसे ही; जीवन्ति=जीते हैं; (और) प्रयन्ति=(अन्तमें यहाँसे) प्रयाण करते हुए; अन्नम् अभिसंविशन्ति=अन्नमें ही प्रविष्ट होते हैं; इति=इस प्रकार; तत्=उसको; विज्ञाय=जानकर; (वह) पुनः=पुनः; पितरम्=अपने पिता; वरुणम् एव उपससार=वरुणके ही पास गया; (तथा अपनी समझी हुई बात उसने पिताको सुनायी; किंतु पिताने उसका समर्थन नहीं किया। तब वह बोला—) भगवः=भगवन्!; (मुझे) ब्रह्म अधीहि=ब्रह्मका बोध कराइये; इति=तब; तम् ह उवाच=उससे सुप्रसिद्ध वरुण ऋषिने कहा; तपसा=तपसे; ब्रह्म=ब्रह्मको; विजिज्ञासस्व=तत्त्वतः जाननेकी इच्छा कर; तपः=तप ही; ब्रह्म=ब्रह्म है; इति=इस प्रकार (पिताकी आज्ञा पाकर); सः=उसने; तपः अतप्यत=(पुनः) तप किया; सः=उसने; तपः तप्त्वा=तप करके—
व्याख्या—भृगुने पिताके उपदेशानुसार यह निश्चय किया कि अन्न ही ब्रह्म है; क्योंकि पिताजीने ब्रह्मके जो लक्षण बताये थे, वे सब अन्नमें पाये जाते हैं। समस्त प्राणी अन्नसे—अन्नके परिणामभूत वीर्यसे उत्पन्न होते हैं, अन्नसे ही उनका जीवन सुरक्षित रहता है और मरनेके बाद अन्नस्वरूप इस पृथ्वीमें ही प्रविष्ट हो जाते हैं। इस प्रकार निश्चय करके वे पुनः अपने पिता वरुणके पास आये। आकर अपने निश्चयके अनुसार उन्होंने सब बातें कहीं। पिताने कोई उत्तर नहीं दिया। उन्होंने सोचा—‘इसने अभी ब्रह्मके स्थूल रूपको ही समझा है, वास्तविक रूपतक इसकी बुद्धि नहीं गयी; अतः इसे तपस्या करके अभी और विचार करनेकी आवश्यकता है। पर जो कुछ इसने समझा है, उसमें इसकी तुच्छ बुद्धि कराकर अश्रद्धा उत्पन्न कर देनेमें भी इसका हित नहीं है, अतः इसकी बातका उत्तर न देना ही ठीक है।’ पितासे अपनी बातका समर्थन न पाकर भृगुने फिर प्रार्थना की—‘भगवन्! यदि मैंने ठीक नहीं समझा हो तो आप मुझे ब्रह्मका तत्त्व समझाइये।’ तब वरुणने कहा—‘तू तपके द्वारा ब्रह्मके तत्त्वको समझनेकी