ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 401, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ेंअनु० ८]
तैत्तिरीयोपनिषद्
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है, वैसे सौ आनन्दोंको एकत्र करनेपर जो आनन्दकी एक राशि होती है, उतना उन स्वभावसिद्ध देवताओंका एक आनन्द है। जो उन स्वभावसिद्ध देवताओंके भोगानन्दकी कामनासे आहत नहीं है, अर्थात् उसकी भी जिसको कामना नहीं है, उस वेदके रहस्यको समझनेवाले निष्काम विरक्तके लिये तो वह आनन्द स्वभावसिद्ध ही है।
ते ये शतं देवानामानन्दाः। स एक इन्द्रस्यानन्दः। श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य।
ते=वे; ये=जो; देवानाम्=देवताओंके; शतम्=एक सौ; आनन्दाः=आनन्द हैं; सः=वह; इन्द्रस्य=इन्द्रका; एकः=एक; आनन्दः=आनन्द है; च=और; (वह) अकामहतस्य=इन्द्रतकके भोगोंमें कामनारहित; श्रोत्रियस्य=वेदवेताको स्वतः प्राप्त है।
व्याख्या —इस वर्णनमें पहले बताये हुए स्वभावसिद्ध देवोंके आनन्दकी अपेक्षा इन्द्रके आनन्दको सौगुना बताया गया है। भाव यह है कि देवताओंके जिस आनन्दका ऊपर वर्णन किया गया है, वैसे सौ आनन्दोंको एकत्र करनेपर जो आनन्दकी एक राशि होती है, उतना इन्द्रभावको प्राप्त देवताका एक आनन्द है। जो इन्द्रके भोगानन्दकी कामनासे आहत नहीं हुआ है, अर्थात् जिसको इन्द्रके सुखकी भी आकाङ्क्षा नहीं है—जो उसे भी तुच्छ समझकर उससे विरक्त हो गया है, उस वेदके रहस्यको समझनेवाले निष्काम पुरुषको तो वह आनन्द स्वतः प्राप्त है।
ते ये शतमिन्द्रस्यानन्दाः। स एको बृहस्पतेरानन्दः। श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य।
ते=वे; ये=जो; इन्द्रस्य=इन्द्रके; शतम्=एक सौ; आनन्दाः=आनन्द हैं; सः=वह; बृहस्पतेः=बृहस्पतिका; एकः=एक; आनन्दः=आनन्द है; च=और; (वह) अकामहतस्य=बृहस्पतितकके भोगोंमें निःस्पृह; श्रोत्रियस्य=वेदवेताको स्वतः प्राप्त है।