भारतकोश
ईशादि नौ उपनिषद्

ईशादि नौ उपनिषद्

Ishadi Nau Upanishad

ऋषिगण द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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अनु० ९ ]

तैत्तिरीयोपनिषद्

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फलस्वरूप वह अत्रसे अर्थात् सब प्रकारकी भोग-सामग्रीसे सम्पन्न और उन सबको यथायोग्य उपभोगमें लानेकी सामर्थ्यसे युक्त हो जाता है और इसीलिये वह संतानसे, नाना प्रकारके पशुओंसे और ब्रह्मतेजसे सम्पन्न हो महान् हो जाता है। इतना ही नहीं, इस समृद्धिके कारण उसका यश सर्वत्र फैल जाता है, वह बड़ा भारी यशस्वी हो जाता है और उस यशके कारण भी वह महान् हो जाता है।

॥ अष्टम अनुवाक समाप्त ॥ ८ ॥

नवम अनुवाक

अत्रं बहु कुर्वीत । तद् व्रतम् । पृथिवी वा अत्रम् । आकाशोऽत्रादः । पृथिव्यामाकाशः प्रतिष्ठितः । आकाशे पृथिवी प्रतिष्ठिता । तदेतदत्रमत्रे प्रतिष्ठितम् । स य एतदत्रमत्रे प्रतिष्ठितं वेद प्रतितिष्ठति । अत्रवानत्रादो भवति । महान् भवति प्रजया पशुभिर्ब्रह्मवर्चसेन । महान् कीर्त्या ।

अत्रम्=अत्रको; बहु कुर्वीत=बढ़ाये; तत्=वह; व्रतम्=एक व्रत है; पृथिवी=पृथ्वी; वै=ही; अत्रम्=अत्र है; आकाशः=आकाश; अत्रादः=पृथ्वीरूप अत्रका आधार होनेसे (मानो) अत्राद है; पृथिव्याम्=पृथ्वीमें; आकाशः=आकाश; प्रतिष्ठितः=प्रतिष्ठित है; आकाशे=आकाशमें; पृथिवी=पृथ्वी; प्रतिष्ठिता=प्रतिष्ठित है; तत्=वही; एतत्=यह; अत्रे=अत्रमें; अत्रम्=अत्र; प्रतिष्ठितम्=प्रतिष्ठित है; यः=जो मनुष्य; (इस प्रकार) अत्रे=अत्रमें; अत्रम्=अत्र; प्रतिष्ठितम्=प्रतिष्ठित है; एतत्=इस रहस्यको; वेद=भलीभाँति जान लेता है; सः=वह; (उस विषयमें) प्रतितिष्ठति=प्रतिष्ठित हो जाता है; अत्रवान्=अत्रवाला; (और) अत्रादः=अत्रको खानेवाला अर्थात् उसे पचानेकी शक्तिवाला; भवति=हो जाता है; प्रजया=(वह) प्रजासे; पशुभिः=पशुओंसे; (और) ब्रह्मवर्चसेन=ब्रह्मतेजसे; महान्=महान्; भवति=बन जाता है; कीर्त्या=कीर्तिसे; [ च ]=भी; महान्=महान्; [ भवति ]=हो जाता है।