ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 422, कुल 548 में से
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ईशादि नौ उपनिषद्
[ वल्ली ३ ]
व्याख्या —इस अनुवाकमें पृथ्वी और आकाश दोनोंको अनरूप बताकर उनके तत्त्वको जाननेका यह फल बताया गया है। भाव यह है कि जिस मनुष्यको अत्रादिसे समृद्ध होनेकी इच्छा हो, उसे पहले तो यह व्रत लेना चाहिये—यह दृढ़ संकल्प करना चाहिये कि ‘मैं अत्रको खूब बढ़ाऊँगा।’ किसी वस्तुका अभ्युदय—उसका विस्तार चाहना ही उसे आकर्षित करनेका सबसे श्रेष्ठ उपाय है। जो जिस वस्तुको क्षीण करनेपर तुला हुआ है, वह वस्तु उसे कदापि नहीं मिल सकती और मिलनेपर टिकेगी नहीं। इसके बाद अत्रके इस तत्त्वको समझना चाहिये कि पृथ्वी ही अत्र है—जितने भी अत्र हैं, वे सब पृथ्वीसे ही उत्पन्न होते हैं और पृथ्वीको अपनेमें विलीन कर लेनेवाला इसका आधारभूत आकाश ही अत्राद अर्थात् इस अत्रका भोक्ता है। पृथ्वीमें आकाश स्थित है, क्योंकि वह सर्वव्यापी है; और आकाशमें पृथ्वी स्थित है—यह बात प्रत्यक्ष सिद्ध है। ये दोनों ही एक-दूसरेके आधार होनेके कारण अत्रस्वरूप हैं। पाँच भूतोंमें आकाश पहला तत्त्व है और पृथ्वी अन्तिम तत्त्व है; बीचके तीनों तत्त्व इन्हींके अन्तर्गत हैं। समस्त भोग्यपदार्थरूप अत्र इन पाँच महाभूतोंके ही कार्य हैं; अतः ये ही अत्रके रूपमें स्थित हैं। इसलिये अत्रमें ही अत्र प्रतिष्ठित है। जो मनुष्य इस बातको तत्त्वसे जानता है कि पृथ्वीरूप अत्रमें आकाशरूप अत्र और आकाशरूप अत्रमें पृथ्वीरूप अत्र प्रतिष्ठित है, वही आकाश आदि पाँचों भूतोंका यथायोग्य उपयोग कर सकता है और इसीलिये वह इस विषयमें सिद्ध हो जाता है। इसी विज्ञानके फलस्वरूप वह अत्रसे अर्थात् सब प्रकारके भोग्य पदार्थोंसे और उनको उपभोगमें लानेकी शक्तिसे सम्पन्न हो जाता है। इसीलिये वह संतानसे, नाना प्रकारके पशुओंसे और विद्याके तेजसे समृद्ध हो महान् बन जाता है। उसका यश समस्त जगत्में फैल जाता है, अतः वह यशके द्वारा भी महान् हो जाता है।
॥ नवम अनुवाक समाप्त ॥ १ ॥
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