भारतकोश
ईशादि नौ उपनिषद्

ईशादि नौ उपनिषद्

Ishadi Nau Upanishad

ऋषिगण द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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अनु० १० ]

तैत्तिरीयोपनिषद्

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दशम अनुवाक

न कञ्चन वसतौ प्रत्याचक्षीत। तद् व्रतम्। तस्माद्यया कया च विधया बह्व्रं प्राप्नुयात्। आराध्यस्मा अन्नमित्याचक्षते। एतद्वै मुखतोऽन्नः राह्मम्। मुखतोऽस्मा अन्नः राध्यते। एतद्वै मध्यतोऽन्नः राह्मम्। मध्यतोऽस्मा अन्नः राध्यते। एतद्वा अन्ततोऽन्नः राह्मम्। अन्ततोऽस्मा अन्नः राध्यते। य एवं वेद।

वसतौ=अपने घरपर (ठहरनेके लिये आये हुए); कञ्चन=किसी (भी अतिथि) को; न प्रत्याचक्षीत=प्रतिकूल उत्तर न दे; तत्=वह; व्रतम्=एक व्रत है; तस्मात्=इसलिये; (अतिथि-सत्कारके लिये) यया कया च विधया=जिस किसी भी प्रकारसे, बहु=बहुत-सा; अन्नम्=अन्न; प्राप्नुयात्=प्राप्त करना चाहिये; (क्योंकि सदगृहस्थ) अस्मै=इस (घरपर आये हुए अतिथि) से; अन्नम्=भोजन; आराधि=तैयार है; इति=यों; आचक्षते=कहते हैं; (यदि यह अतिथिको) मुखतः=मुख्यवृत्तिसे अर्थात् अधिक श्रद्धा, प्रेम और सत्कारपूर्वक; एतत्=यह; राह्मम्=तैयार किया हुआ; अन्नम्=भोजन (देता है तो); वै=निश्चय ही; अस्मै=इस (दाता)को; मुखतः=अधिक आदर-सत्कारके साथ ही; अन्नम्=अन्न; राध्यते=प्राप्त होता है; (यदि यह अतिथिको) मध्यतः=मध्यम श्रेणीकी श्रद्धा और प्रेमसे; एतत्=यह; राह्मम्=तैयार किया हुआ; अन्नम्=भोजन (देता है तो); वै=निःसंदेह; अस्मै=इस (दाता) को; मध्यतः=मध्यम श्रद्धा और प्रेमसे ही; अन्नम् राध्यते=अन्न प्राप्त होता है; (और यदि यह अतिथिको) अन्ततः=निकृष्ट श्रद्धा-सत्कारसे; एतत्=यह; राह्मम्=तैयार किया हुआ; अन्नम्=भोजन (देता है तो); वै=अवश्य ही; अस्मै=इस (दाता) को; अन्ततः=निकृष्ट श्रद्धा आदिसे; अन्नम्=अन्न; राध्यते=मिलता है; यः=जो; एवम्=इस प्रकार; वेद=इस रहस्यको जानता है (वह अतिथिके साथ बहुत उत्तम बर्ताव करता है)।

व्याख्या —दसवें अनुवाकके इस अंशमें अतिथि-सेवाका महत्त्व और फल बताया गया है। भाव यह है कि जो मनुष्य अतिथि-सेवाका पूरा लाभ