ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 429, कुल 548 में से
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तैत्तिरीयोपनिषद्
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२३, २४; ९।२२, २३)। अतः मनुष्यको चाहिये कि इस रहस्यको समझकर सब देवोंके देव सर्वशक्तिमान् परमात्माकी उपासना उन्हींकी प्राप्तिके लिये करे, उनसे और कुछ न चाहे।
सम्बन्ध —सर्वत्र एक ही परमात्मा परिपूर्ण हैं, इस बातको समझकर उन्हें प्राप्त कर लेनेका फल और प्राप्त करनेवालेकी स्थितिका वर्णन करते हैं—
स यश्चायं पुरुषे यश्चासावादित्ये स एकः। स य एवंवित्। अस्माल्लोकात्प्रेत्य। एतमन्नमयमात्मानमुपसंक्रम्य। एतं प्राणमयमात्मानमुपसंक्रम्य। एतं मनोमयमात्मानमुपसंक्रम्य। एतं विज्ञानमयमात्मानमुपसंक्रम्य। एतमानन्दमयमात्मानमुपसंक्रम्य इमाल्लोकात्कामात्री कामरूप्यनुसंचरन्। एतत्साम गायन्नास्ते।
सः =वह (परमात्मा); यः =जो; अयम् =यह; पुरुषे =इस मनुष्यमें है; च =तथा; यः =जो; असौ =वह; आदित्ये च =सूर्यमें भी है; सः =वह (दोनोंका अन्तर्यामी); एकः =एक ही है; यः =जो (मनुष्य); एवंवित् =इस प्रकार तत्त्वसे जाननेवाला है; सः =वह; अस्मात् =इस; लोकात् =लोक (शरीर) से; प्रेत्य =उत्क्रमण करके; एतम् =इस; अन्नमयम् =अन्नमय; आत्मानम् =आत्माको; उपसंक्रम्य =प्राप्त होकर; एतम् =इस; प्राणमयम् =प्राणमय; आत्मानम् =आत्माको; उपसंक्रम्य =प्राप्त होकर; एतम् =इस; मनोमयम् =मनोमय; आत्मानम् =आत्माको; उपसंक्रम्य =प्राप्त होकर; एतम् =इस; विज्ञानमयम् =विज्ञानमय; आत्मानम् =आत्माको; उपसंक्रम्य =प्राप्त होकर; एतम् =इस; आनन्दमयम् =आनन्दमय; आत्मानम् =आत्माको; उपसंक्रम्य =प्राप्त होकर; कामात्री =इच्छानुसार भोगवाला; (और) कामरूपी =इच्छानुसार रूपवाला हो जाता है; (तथा) इमान् =इन; लोकान् अनुसंचरन् =सब लोकोंमें विचरता हुआ; एतत् =इस (आगे बताये हुए); साम गायन् =साम (समतायुक्त उद्धारों) का गायन करता; आस्ते =रहता है।
व्याख्या —वे परमात्मा, जिनका वर्णन पहले सबकी उत्पत्ति, स्थिति और प्रलयका कारण कहकर किया जा चुका है और जो परमानन्दस्वरूप हैं, वे इस